Astrologer Avinash mishra
ज्योतिष एक दर्पण है।
इसमें आगे आने वाली समस्याओं का समाधान किया जाता है।
28/06/2025
28/09/2023
*जन्मदिन के अवसर पर,नवग्रहों का पूजन अवश्य ही करवाना चाहिए।।*
*********************
*शिवपुराण के "विद्येश्वर संहिता" के, 14 वें अध्याय के, 40 वें, 42 वें और 43 वें श्लोक में,सूत जी ने, शौनक आदि ऋषियों को, जन्मनक्षत्र के आने पर, वर्ष में,एकबार सभी को, नवग्रहों के पूजन का फल तथा विधान बताते हुए कहा कि -*
*शुभादावशुभान्ते च जन्मर्क्षेषु गृहे गृही।*
*आरोग्यादिसमृद्ध्यर्थमादित्यादीन् ग्रहान् यजेत्।।*
*तस्माद् वै देवयजनं सर्वाभीष्टफलप्रदम्।।40।।*
गृहस्थ को ही गृही शब्द से कहा जाता है। प्रत्येक गृहस्थ स्त्री पुरुषों को, अपनी पारिवारिक शान्ति के लिए,तथा आरोग्य के लिए, और समृद्धि के लिए,अपने जन्मनक्षत्र के दिन,आदित्य अर्थात रवि आदि नवग्रहों का पूजन अवश्य ही करना चाहिए।
क्यों कि - देवताओं का पूजन करने से सभी प्रकार की कामनाएं पूर्ण होतीं हैं। देवताओं का पूजन,अभीष्टफल को देनेवाला है।
*शुभादावशुभान्ते च जन्मर्क्षेषु गृहे गृही।।*
*शुभ कार्यों के आदि में* *,तथा अशुभ अर्थात आपत्ति* *काल की समाप्ति होने पर, अथवा आपत्तिकाल की निवृत्ति के लिए भी,तथा जन्मनक्षत्र आने पर, गृहस्थों को, नवग्रहों का पूजन अवश्य ही करना चाहिए।*
गृहस्थ आश्रम में,माता पिता,पति पत्नी,तथा पुत्र पुत्री होते हैं। इन सभी के अपने अपने भाग्य तथा अपने अपने कर्म होते हैं।
पूर्वजन्म के कर्मों का फल भी सभी को पृथक पृथक भोगना पड़ता है। कोई भी स्त्री पुरुष,किसी के कर्मों का फल नहीं भोगते हैं।
इसीलिए एक ही स्थान में रहते हुए भी,कुछ स्त्री पुरुषों का जीवन जन्म से ही रोगी के रूप में,विकलांग के रूप में,तथा मंदबुद्धि के रूप में, और असफलता के रूप में ही व्यतीत होता है।
एक ही माता पिता से जन्म लेने वाले पुत्र पुत्री में से , कुछ तो अपने वंश की गौरव वृद्धि करानेवाले होते हैं, और कोई कोई पुत्र पुत्री, अपने वंश को कलंकित करनेवाले होते हैं।
सभी स्त्री पुरुषों का मन,तन और बुद्धि पृथक पृथक ही हैं।
*सभी के जीवन में कुछ शुभ भी होता है, और कुछ अशुभ ही होता है।*
देवताओं के पूजन से,अशुभ फल को भोगने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।
*जन्मर्क्षेषु गृहे गृही।*
इसीलिए प्रत्येक *गृही अर्थात गृहस्थ को,जन्मर्क्ष,ऋक्ष अर्थात नक्षत्र।* किसी किसी स्त्री पुरुष का जन्म,अशुभ नक्षत्र में जन्म होता,किसी स्त्री पुरुष का जन्म,शुभ नक्षत्र में जन्म होता है।
*जिस नक्षत्र में जन्म होता है,वह नक्षत्र, प्रत्येक महीने में,एकबार अवश्य ही आता है।*
यदि किसी गृहस्थ के घर में, कोई न कोई रोगग्रस्त रहता हो तो, रोगग्रस्त स्त्री पुरुषों के नक्षत्र के आने पर, सूर्य आदि नवग्रहों का पूजन अवश्य ही करना चाहिए।
*वर्ष में एक बार अवश्य ही,अपने जन्मनक्षत्र के दिन, नवग्रहों का पूजन करने से, दुखों के कारणों का विनाश होता है।*
जन्मदिन मनाना है तो,उस दिन, नवग्रहों का पूजन करवा कर, मार्कण्डेय ऋषि के सहित हनुमान आदि सप्तचिरंजीवों का पूजन करवाना चाहिए।
*आरोग्यादिसमृद्ध्यर्थमादित्यादीन् ग्रहान् यजेत्।*
*आरोग्य अर्थात स्वास्थ्य लाभ के लिए,* समृद्धि वृद्धि के लिए आदित्य आदि ग्रहों का पूजन अवश्य ही करवाना चाहिए।
*यथाशक्त्यनुसारेण कर्तव्यं सर्वदा नरै:।*
*सप्तस्वपि च वारेषु नरै:शुभफलेप्सुभि:।।42।।*
यदि अपने मानवजीवन को रोग,हानि,आदि दुखों से रहित,सुखमय,जीवन व्यतीत करना है तो,प्रत्येक स्त्री पुरुष को,यावज्जीवन,सर्वदा ही, रविवार सोमवार आदि सातों वारों का, यथाशक्ति पूजन करते, करवाते रहना चाहिए।
*यथाशक्त्यनुसारेण कर्तव्यं सर्वदा नरै:।।*
*प्रत्येक स्त्री पुरुष को,यावज्जीवन,सर्वदा ही, यथाशक्ति देवपूजन करते रहना चाहिए।*
*सर्वदा अर्थात सदा ही,* देवपूजन करते रहना चाहिए। जिन गृहस्थों के घर में,कभी भी, देवपूजन नहीं होता है,उनके बालकों ने,अपने घर में कभी भी देवपूजन होते ही नहीं देखा है तो,भाग्य से जितना सुख प्राप्त होना होगा,उतना ही सुख प्राप्त होगा। भाग्य से प्राप्त सुख के समाप्त होते ही, दुखों का क्रम प्रारम्भ हो जाता है।
विविध प्रकार के प्रयास करने पर भी,जब हानि का, और रोगों का नाश नहीं होता है तो,जिन बालकों ने,अपने घरों में देवपूजन होते नहीं देखा है,उनकी बुद्धि में,वह उपाय भी नहीं आएगा कि - किसी विद्वान ब्राह्मण से इन दुखों का निराकरण पू़छने जाएं। ऐसी स्थिति में, देवपूजनहीन गृहस्थ की संतानें,आजीवन दुख ही दुख भोगते रहते हैं।
जिन गृहस्थों के घर में, ब्राह्मणों का आवागमन होता रहता है, देवपूजन, अतिथिपूजन,आदि सत्कर्म होते रहते हैं तो, बालकों को भी, आपत्तिकाल में एक उपाय प्राप्त हो जाता है।
यथाशक्ति का तात्पर्य यह है कि - देवपूजन में,धन का व्यय तो होता ही है। यदि व्यय करने के लिए,धन का अभाव है तो, पारिवारिक जनों को एकत्रित नहीं करना चाहिए। बन्धु बान्धवों को एकत्रित नहीं करना चाहिए।
पूजा में इतने अधिक धन का व्यय नहीं होता है, जितना अधिक धन का व्यय, बन्धु बान्धवों के भोजन आदि में होता है।
इसीलिए,यदि धनाभाव हो तो, एकमात्र विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर,उनसे विधिवत देवपूजन करवा कर उनको ही भोजन करवा कर, दक्षिणा देकर,अपने सत्कर्म को पूर्ण कर सकते हैं।
*सप्तस्वपि च वारेषु नरै शुभफलेप्सुभि:।*
*शुभफलेप्सु अर्थात शुभ फल की प्राप्ति की ईप्सा अर्थात इच्छा है तो, प्रत्येक गृहस्थ को,यथाशक्ति देवपूजन करते रहना चाहिए।*
शुभफल की इच्छा तो सभी को होती है, किन्तु सत्कर्म नहीं करना चाहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि - यदि देवपूजन अतिथिपूजन आदि सत्कर्म नहीं किया तो,शुभफल की इच्छा तो रहेगी, किन्तु शुभफल की प्राप्ति नहीं होगी।
*बिना कर्म किए तो,कोई भी फल प्राप्त नहीं होता है,यही इस संसार का अकाट्य सिद्धान्त है।*
दुखदायी कर्म का फल,कभी भी सुखदायी नहीं होता है,ये भी इस संसार का दूसरा अकाट्य सिद्धान्त है।
*यदि कुछ भी नहीं* *करेंगे अर्थात,* *न शुभ कर्म करेंगे, और न ही अशुभ कर्म करेंगे तो,न करने का दुखरूप फल तो अवश्य ही प्राप्त होगा, ये इस संसार का तीसरा अकाट्य सिद्धान्त है।*
इन तीनों सिद्धान्तों के उदाहरण भी आपको अपने सम्बन्धियों में देखने को मिल जाएंगे। अपने आस पास भी देखने को मिल जाएंगे।
यदि उदाहरण नहीं समझ में आते हैं तो, स्वयं ही अच्छा बुरा करके देख लीजिए। अथवा कुछ भी मत करिए तो दुख मिलता है कि- सुख मिलता है,यही देख लीजिए। आप स्वयं ही इन तीनों प्रकार के कर्मों के उदाहरण बन जाएंगे।
यदि किसी के धन नहीं है तो,उसे क्या करना चाहिए?
*दरिद्रस्तपसा देवान् यजेदाढ्यो धनेन हि।*
*पुनश्चैवंविधं धर्मं कुरुते श्रद्धया सह।।43।।*
अपने धर्म का त्याग तो कभी भी नहीं करना चाहिए।
*दरिद्रस्तपसा देवान् यजेद्।*
यदि किसी गृहस्थ स्त्री पुरुषों के देवपूजन के लिए पर्याप्त धन नहीं है, दरिद्रता है तो,धनभाव को देखते हुए,उसे अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
*जिस दिन उसके जन्म का नक्षत्र आए तो,वह तप अर्थात तपस्या करे। तप अर्थात उपवास करे। देवमंदिरों में दर्शन कर आए। भगवान से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहे कि -*
*हे नाथ! मेरे अपने ही पूर्वजन्म के कर्मों के कारण ही इस दरिद्रता रूप दुख को भोग रहा हूं। इस जन्म में भी कोई ऐसी विद्या प्राप्त नहीं कर पाया कि, जिससे धन एकत्रित कर सकता।*
अब आप ही अनुग्रह करें। कृपा करें। मेरे सभी प्रकार के कष्ट हरें।
*इस प्रकार से सूर्य आदि नवग्रहों सहित सभी देवों से प्रार्थना करे तो, उसकी दरिद्रता अवश्य ही दूर हो जाएगी,तथा शरीर भी निरोग रहेगा। ग्रहों की तथा देवों की कृपा प्राप्त होगी।*
*आढ्यो धनेन हि।*
यदि कोई गृहस्थ,धनवान है। नवग्रहों सहित देवताओं का पूजन कराने में समर्थ है। ब्राह्मण को दक्षिणा देने में समर्थ है। ब्राह्मण भोजन कराने में समर्थ है तो उसे पर्याप्त धन से अपने धर्म की रक्षा करना चाहिए।
*पुनश्चैवंविधं धर्मं कुरुते श्रद्धया सह।।*
*इस प्रकार से धर्म के लिए श्रद्धा के साथ,धन का उपयोग अवश्य ही करना चाहिए।*
*गृहस्थ का परमफल संतान है। संतानों का सुख ही माता पिता का सुख है। इसीलिए आत्मसुख के लिए, शास्त्रों में कहे गए गृहस्थ धर्म का आजीवन पालन करना चाहिए।*
*आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम।* *28-9-2023*
27/09/2023
श्राद्ध किस किस तिथि को करना है इसका विवरण , पंचांग में प्रत्येक तारीख में श्राद्ध तिथि का वर्णन है, जैसे , कि २९ तारीख, को ( प्रतिपदा श्राद्ध)
३० तारीख को अपराह्न ०१!५८ ( द्वितीया श्राद्ध)
०१ तारीख को मध्याह्न १२!१० ( त्रतीया श्राद्ध)
२ अक्टूबर को चतुर्थी श्राद्ध
३ अक्टूबर को पंचमी श्राद्ध
४अक्टुबर को षष्ठी श्राद्ध
५ अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध
६ अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध
७ अक्टूबर को नवमी श्राद्ध ( सौभाग्यवती स्त्रीणाम श्राद्ध
८ अक्टूबर को अविधवा नवमी
९ अक्टूबर को दशमी श्राद्ध
१० अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध
११अक्टूबर को संन्यासी एवं यती एवं द्वादशी श्राद्ध
१२ अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध
१३ अक्टूबर को शस्त्र द्वारा एवं अज्ञात मरण वाले प्राणियों का चतुर्दशी श्राद्ध
१४ अक्टूबर को पितृ विसर्जन
श्री मार्तंड ज्योतिष केंद्र श्री रामकृष्ण ज्योतिष केंद्र Jay mhakal avinash mishra Manu Mishra @फ़ॉलोअर्स
12/06/2023
शुभकर्तरी योग-शुभग्रह दूसरे एवं बारहवें स्थित हों तो जातक बहुत धन पाकर प्रसन्नता सहित अनेक तरह के भोग भोगता है।
💐लक्ष्मी योग--लग्नेश बली हो और नवमेश उच्च या स्वराशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तो यह योग होता है। अथवा लग्नेश एवं नवमेश की युति या परस्पर स्थान परिवर्तन हो तो भी यह योग होता है।
,💐महाधन योग-दशमेश एवं एकादशेश की युति दसवें भाव में हो तो यह योग होता है। यदि यह योग कुंडली में हो तो जातक योगकारक ग्रहों की दशान्तर्दशा में धन एवं सभी भौतिक सुख साधनों को पाता है।
💐अति धनलाभ योग--लग्नेश दूसरे स्थित हो, धनेश ग्याहरवें स्थित हो और एकादशेश लग्न में स्थित हो तो जातक कम प्रयासों में आसानी से बहुत धन अर्जित करता है।
जय माता दी 🙏
जय श्री राम🙏
15/01/2023
https://youtube.com/.avinashmishrashastri9496
चैनल को अधिक से अधिक subscribe करें और लाभ पायें ।
pt.Avinash mishra shastri - YouTube ज्योतिष कर्मकांड का विवेचन जिसके द्वारा मानव को सही दिशा और दशा का ज्ञान होता है।पुजा पाठ कर्मकांड यज्ञ जन्म पत्र....
07/01/2023
jay sri ram🥰🙏
05/01/2023
पाँच प्रकार के यज्ञ 🙏