Best Home Remedies

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Free tips of home made remedies for your best health.

08/06/2021

सनातन धर्म की एक एक परंपरा शुद्ध विज्ञान है...🚩🚩🙏

घर से निकलते वक्त दही-शक्कर खाना क्यों लाभकारी होता है?

पचास बार सुना होगा "दही शक्कर खाकर जाना सफ़लता मिलेगी"
क्रांतिकारी सेक्युलरों ने इसे पाखंड कह दिया कभी मीठी दही से भी सफलता मिलती है भला

जी हां
दही में यदि शक्कर डालकर जाने से पहले खाया जाता है तो हर कार्य में सफलता मिलने के चांस बहुत ज्यादा बढ जाते हैं
दही में मौजूद प्रोटीन के अलावा कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, विटामिन B6 और विटामिन B12 जैसे पोषक तत्व भी होते हैं,
जो शरीर में एनर्जी लेवल बरकरार रखते हैं।
शक्कर खाने से शरीर को ग्लूकोज मिलता है,
जो शरीर के लिए बहुत जरूरी है।
और सब से बड़ी बात दही में मौजूद होता है
"गुड बैक्टीरिया"
जो शक्कर डालने से गुणात्मक रूप में बढता है
जो आपके
शरीर में डोपामिन हार्मोन्स का स्तर ऊंचा कर देता है
और आप प्रसन्नता और उल्लास में रहते हैं
तथा विटामिन B6 and B12 स्मृति को मजबूत रखता है।
इससे भी बड़ी बात
जब आपके शरीर में सकारात्मक सूक्ष्म जीवों (गुड बैक्टीरिया )का समूह जब प्रवेश करता है तो
आपका आभामंडल "ऑरा" सकारात्मक ऊर्जा से भर उठता है।
ये शरीर सूक्ष्म जीवों का बना छोटा ब्रह्मांड ही तो है।
स्ट्रेस अनिश्चितता भय समाप्त हो पूरी ऊर्जा काम पर लगेगी।
सारा खेल ऊर्जा का ही तो है दोस्त
जिस काम में जितनी ऊर्जा सकारात्मकता प्रसन्नता लगेगी
उसकी सफलता के उतने ही अधिक परिणाम होंगें।

05/06/2021

#कमर दर्द , सरवाइकल और चारपाई. #हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे।
सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है , लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।
जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।
दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें , सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की जोली का था , लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नही होता है। दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है।
डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है , उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं , वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है। खटिये को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं।
अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है ।
गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है ।
बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शारीर का Acupressure होता रहता है ।
गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनद ही और है। ताज़ी हवा , बदलता मोसम , तारों की छाव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।
सस्ते प्लास्टिक की रस्सी और पट्टी आ गयी है , लेकिन वह सही नही है। स्वदेशी चारपाई के बदले हजारों रुपये की दवा और डॉक्टर का खर्च बचाया जा सकता है।l
अगर दाब या कांस की बुनी हुई हो तो सर्वोत्तम होती है।

19/05/2021

#छोटी_मगर_काम_की_बात

एक बोतल में भर कर आधा लीटर पानी में एक चम्मच हल्दी एक चम्मच सेंधा नमक मिला कर अपने वाश बेसिन के स्टैंड पर रख लें। दिन में दो चार बार जब भी हाथ धोए, विशेष कर कुछ खाने पीने के बाद (जल के अलावा) एक घूंट मुंह में भर कर पहले दस बीस सेकंड उसे कुल्ले की तरह मुंह में चलाएं ताकि आपके दांतों मसूड़ों के प्रत्येक कोने दरार तक पहुंच जाए। फिर मुंह ऊंचा कर कुछ देर उसका गरारा करें और थूक दें। आपके गले का तो संक्रमण के खिलाफ पुख्ता बीमा हो गया साथ ही दांतों की सेहत के लिए ये लाजवाब है। सोते समय इसे अवश्य करें। नाक के संक्रमण की सुरक्षा का अलग उपाय जो करें सो करें पर नाक से संक्रमण नीचे जाएगा तो रास्ता तो यही गला ही है।
हां, मंहगी दवा और महंगी डाक्टर की फीस का शौक हो तो ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं। इस प्रयोग में दिन में दस बार गरारे करे तो नुकसान रत्ती भर ना होने की आश्वस्ति और लाभ मिलना आपकी जीवनशैली और दिन चर्या पर निर्भर।
( हर बार गरारा करने से पहले बोतल को अच्छी तरह हिलाएं ताकि पेंदे में जमा हल्दी सक्रिय हो जाए।)
सौजन्य:- बृजगोपाल जी
गुरु चेला के सहयोग से प्रस्तुत।

02/05/2021

प्राचीन भारत के महान रणनीतिकार #आचार्य_चाणक्य अपने साथ एक दण्ड लेकर चला करते थे। कहा जाता है कि आचार्य चाणक्य अपने दण्ड में #गुडूची छुपाकर रखते थे ताकि संकट के समय उनकी प्राण रक्षा हो सके। आयुर्वेद की संहिताओं मे दण्ड को भय का नष्ट करने वाला बताया गया है (सु.चि. 24.78, च.सू.5.102) भयघ्नं दण्डधारणम्। लेकिन हम डंडे की बात कभी बाद में करेंगे, आज की चर्चा उस गुडूची पर है जिसे आचार्य चाणक्य अपने डंडे में सदैव रखते थे और जिनका मानना था कि औषधियों में गुडूची सर्वश्रेष्ठ है (बृ.चा.9.4): सर्वौषधीनां अमृता प्रधाना। गुडूची को आब-ए-हयात नाम से भी जाना जाता है।आम बोलचाल में इसे #गिलोय भी कहा जाता है

आइये, सबसे पहले आयुर्वेद की संहिताओं में उपलब्ध जानकारी की बात करते हैं। उम्र को रोके रहने वाले या वयःस्थापक द्रव्यों में गुडूची शामिल है। इस वर्ग की अन्य प्रजातियाँ #हरीतकी, #आँवला, #रास्ना, #अपराजिता, #जीवन्ती, #अतिरसा #शतावरी, #मंडूकपर्णी, #शालपर्णी, व #पुनर्नवा हैं (च.सू.4.18): अमृताऽभयाधात्रीमुक्ताश्वेताजीवन्त्यतिरसामण्डूकपर्णीस्थिरापुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति। इसके अतिरिक्त एकल या अकेली गुडूची का भी अनेक बीमारियों के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है। आचार्य भावमिश्र ने स्पष्ट किया है कि (भा.प्र.पू.ख. गुडुच्यादिवर्ग 6.8-10): गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी। संग्राहिणी कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी।। दोष त्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम्। कामला कुष्ठवातास्त्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत।। प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।

आयुर्वेद की प्रमुख संहिताओं में 178 ऐसे जीवनदायी योग हैं जिनमें गुडूची प्रमुखता से प्रयुक्त होती है और शायद ही ऐसा कोई रोग हो जो इन योगों से न संभलता हो। गुडूची के मिश्रण वाले योगों का उपयोग #टाइफाइड, नर्वस सिस्टम के रोग, तमाम तरह के टॉक्सिक और सेप्टिक बुखार, वातज, पित्तज और कफज ज्वर, रक्तस्राव, गठिया, गाउट, रूमेटिज्म, ऐसे बुखार जिनमें प्राय रक्त स्राव हो जाता है, उल्टी, जलन, दाह, मोटापा, अम्ल और पित्त बढ़ने के कारण होने वाली उल्टियां, चमड़ी के अनेक तरह के रोग, अल्सर, शोथ, मलेरिया, यूरिनरी ट्रैक्ट से जुड़े रोग, फाइलेरियासिस, एंजाइना और वातज शूल, पित्तश्लेष्मिक ज्वर, वृष्य और वाजीकरण, याददाश्त बढ़ाना, आंखों और आंख से जुड़े तमाम रोग, उम्र बढ़ने को रोकना, बालों का पकना रोकना, बौद्धिक क्षमता बढ़ाना, शरीर का नवीनीकरण करना, फिस्टुला इन एनो सहित गुदा के तमाम रोग, अनेक प्रकार के कुष्ठ, ज्वाइंडिस, राइनाइटिस, साइनस, स्प्लीन का बढ़ना, जोड़ों का दर्द, ट्यूमर, एनीमिया, प्लीहा का बढ़ना, अग्नि को सम करना, बलवृद्धि, मनोविभ्रम की स्थिति ठीक करना, मिर्गी, तमाम वात विकार, जननांगों से जुड़ी हुई समस्यायें, सर्वाइकल लिम्फोडिनोमा, योनि-रोग ठीक करना, दीर्घायु-प्राप्ति, शरीर को कांतिवान बनाना, सियाटिका सहित कमर, पैरों और जांघों का दर्द, डिसपेप्सिया, सिरदर्द, माइग्रेन, दांत का दर्द जैसे अनेक रोगों को ठीक करने में होता है।

आयुर्वेद की #एंटीवायरल औषधियां, जिनमें गुडूची भी शामिल है, पर इन वाइवो, इन वाइट्रो, और क्लिनिकल अध्ययन हो चुके हैं। ये तमाम प्रकार के वायरल रोगों से बचे रहने के लिये मददगार हैं। कालमेघ, चिरायता, तुलसी, शुंठी, वासा, शिग्रू या सहजन, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची, हरिद्रा, यष्टिमधु, बिभीतकी, आमलकी, अश्वगंधा, हरीतकी, मुस्ता, पाठा, पुनर्नवा, लहसुन, शरपुन्खा, कुटज, शल्लकी, #पुदीना, #त्रिकटु, #त्रिफला आदि शोध में एंटीवायरल सिद्ध हो चुके हैं| इसके साथ ही संहिताओं, साइंस और अनुभव को साथ लेकर आधुनिक वैज्ञानिक विधियों से निर्मित जेवीएन-7 (अग्नि सम रखने हेतु) जेरलाइफ-एम व जेरलाइफ-डब्ल्यू (व्याधिक्षमत्व बढ़ने हेतु), कोल्डकैल, एलेरकैल, त्विषामृत (हेतु-विपरीत एंटीवायरल) जैसी डबल-स्टैंडर्डाइज़्ड मल्टीस्पेक्ट्रम आयुर्वेदिक रसायन व औषधियाँ वायरल संक्रमण से बचाव और उपचार दोनों ही उत्तम परिणाम देती हैं। इन तमाम योगों में भी गुडूची प्रमुखता से प्रयुक्त होती है। लेकिन यहाँ सेल्फ-मेडिकेशन बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिये। केवल वैद्यों की सलाह से ही औषधि लेना उपयुक्त और सुरक्षित होता है।

इसके अलावा अनेक शोध और भी हैं जिनमें गुडूची को उपयोगी पाया गया है। कुछ उदाहरण देखते हैं। कम मात्रा में भी दारू पीने से पुरुषों में सेक्स हार्मोन को होने वाले नुकसान को रोकने में आयुर्वेदिक औषधि गुडूची सहायक है। दारू पीने से बर्बाद मेटाबोलिज्म को ठीक करने में गुडूची सहायक हो सकती है। यकृत को भी ठीक करती है। लेकिन इस जानकारी का उपयोग पियक्कड़ हो जाने के लिये न करें। गुडूची द्वारा बीटा-सेल्स के रिजेनेरेशन की संभावना भी पायी है। डायबिटीज के उपचार की दिशा में एक और प्रमाण यह है कि गुडूची पैन्क्रेआटिक बीटा सेल्स का संरक्षण कर ग्लूकोज चयापचय को नियंत्रित करती है। शुंठी व गुडूची के संयोजन से बना योग 16 प्रकार के जींस व 27 प्रकार के कैन्सर्स को विनियमित करता है। कंकालीय-मांसपेशी से संबंधित विकार आज एक बड़ी समस्या है जो केचेक्सिया, सारकोपीनिया व इम्मोबिलाइजेशन के कारण उत्पन्न होती है। इस समस्या को हल करने में गुडूची उपयोगी पायी गयी है।बच्चों को रोज रोज के इन्फेक्शन से छुटकारा मिल सकता है क्योंकि गुडूची बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। क्लिनिकल ट्रायल में आमलकी व गुडूची मुख-कैंसर के उपचार में लाभकारी पायी गयीं हैं। गुडूची में क्लिनिकल ट्रायल से यह भी ज्ञात होता है कि यह एलर्जिक रायनाइटिस, जुकाम, बुखार ठीक करने और व्याधिक्षमत्व बढ़ाने में उपयोगी है।

दरअसल, उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि गुडूची के बारे में उपलब्ध प्रमाणों को तीन तरह से देखा जा सकता है| एक तरफ स्थानीय आदिवासियों द्वारा स्थानीय ज्ञान का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार के रोगों के विरुद्ध गुडुची का प्रयोग पूरे देश में वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। दूसरी तरफ आयुर्वेद की संहिताओं में गुडूची को विभिन्न रोगों के विरुद्ध प्रभावी होने की जानकारी अंकित है।इसके साथ ही आधुनिक वैज्ञानिक शोध की विधियों - इन वाइट्रो, इन वाइवो एवं क्लिनिकल ट्रायल्स में भी गुडूची की विभिन्न रोगों के विरुद्ध क्रियात्मकता सिद्ध हुई है।

यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि इतना सब कुछ उपलब्ध होते हुये भी गुडूची जिन रोगों में उपयोगी है उनके लिये इसे निर्विवाद औषधि मानने में क्या समस्यायें हैं? दरअसल, आधुनिक वैज्ञानिक शोध की विधियां केवल रेंडमाइज्ड ट्रायल्स को ही गोल्ड क्लास शोध का दर्जा देती हैं। त्रुटिवश आयुर्वेद के लिये भी यह धारणा बन गयी है कि क्लिनिकल ट्रायल्स के बिना आयुर्वेद की किसी औषधि को रोगों के विरुद्ध एक प्रभावी और उपयोगी औषधि के रूप में मान्यता नहीं मिल सकती। लेकिन कटु सत्य यह है कि आधुनिक वैज्ञानिक शोध की विधियां जिनमें रेंडमाइज्ड क्लीनिकल ट्रायल शामिल हैं, आयुर्वेद की समग्रता को साथ लेकर नहीं किये जाते| उदाहरण के लिये, आयुर्वेद में केवल औषधि महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि निदानपरिवर्जन, पथ्य-अपथ्य, व्यक्ति की प्रकृति आदि अनेक महत्वपूर्ण कारक हैं जिन्हें देखते हुए किसी औषधि विशेष की, किसी व्यक्ति विशेष में, किसी रोग विशेष के विरुद्ध प्रभाविता आंकी जा सकती है। इस प्रकार के क्लिनिकल ट्रायल्स को ही आयुर्वेद के लिये उपयोगी माना जा सकता है| होल-सिस्टम क्लिनिकल ट्रायल के बिना आयुर्वेद की किसी औषधि की प्रभाविता जांचना और परखना संभव नहीं है।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यदि ज्ञान के उत्पादन की सभी विधियां एक ही दिशा में संकेत करती हैं तो ऐसे प्रमाण को आप निर्विवाद प्रमाण मान सकते हैं, जब तक कि ऐसे प्रमाण के विरुद्ध कोई अन्य अध्ययन ऐसे प्रमाण को रद्द न करता हो। यहां पर पारंपरिक वनस्पति विज्ञान, आयुर्वेद, वैद्यों के अनुभव और आधुनिक शोध को साथ में देखने पर गुडूची को उपयोगी औषधि मानने के उचित, पर्याप्त और निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध हैं।

ऐसा नहीं है कि जिन औषधीय पौधों में विभिन्न स्तरों पर आधुनिक वैज्ञानिक शोध हो चुकी है वे अंततः क्लिनिकल ट्रायल में भी उस रोग के विरुद्ध उपयोगी पाये जायेंगे। एलोपैथी की दवाओं समेत किसी भी औषधि के लिये ऐसी कोई सुनिश्चितता विज्ञान में उपलब्ध नहीं है। परन्तु उन औषधीय पौधों में जिनमें आयुर्वेद की संहिताओं में स्पष्ट जानकारी अंकित हैं वे वस्तुतः दीर्घकाल तक आयुर्वेद आचार्यों के अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर ही अंकित की गयी है| पिछले 5000 वर्षों के दौरान अलग-अलग काल में लिखी गई संहितायें जब एक ही दिशा में संकेत करती हैं तो यह माना जा सकता है कि जिन विद्वानों ने उन्हें लिखा उन्होंने अपने अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर उसका पुनः परीक्षण और पुनः पुष्टि की। इसलिये आधुनिक वैज्ञानिक शोध अपनी जगह ठीक है और वह चलना भी चाहिये लेकिन 2000 साल तक निरंतर उपयोग के द्वारा उत्पन्न अनुभवजन्य ज्ञान को आज सिर्फ इस आधार पर नहीं नकारा जा सकता कि उनमें तथाकथित क्लिनिकल ट्रायल्स उपलब्ध नहीं हैं।

अंत में यही कहना है कि ऐसे उपयोगी पौधे को हमारे आसपास अवश्य लगना चाहिये। पौधे उगाने की सबसे अनुपजाऊ जगह मानव का दिमाग है। इंसान के माथे में पौधा लगाना बहुत कठिन है, मिट्टी में लगाना तो आसान है। आप भी आगे आइये और गुडूची सहित अपने लिये उपयोगी औषधीय पौधों का अधिक से अधिक रोपण कीजिये।जरूरत पड़ने पर दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा।

गुरु चेला के द्वारा संचालित पृष्ट से प्राप्त।

10/03/2020

ʙᴀsɪʟ | ʙᴀsɪʟ ʜᴇᴀʟᴛʜ ʙᴇɴᴇғɪᴛs|
BASIL

The herb Basil is used in cooking universally, and also for medicinal purposes. It’s a great herb and everyone should consider using it in their diet.

Jews believe (an enduring belief) that eating basil provides strength when fasting. It is used as tonic for the skin, a treatment for all kinds of colds, bronchitis, and coughs. It is used to treat gas attacks, flu, gout, muscle aches, rheumatism, insect bites, and sinusitis. An infusion of the green herb in boiling water is good for all obstructions of the internal organs, arrests vomiting and nausea. It is often used as an insect repellent.

In West Africa it is used to reduce fevers and the Japanese use it as a cold remedy. As basil is both aromatic and carminative, it is used for mild nervous disorders and even for the alleviation of fibromyalgia (wandering body pains). It is said, the dried leaves used as a s***f, can cure nervous headaches. In traditional Ayurvedic medicine, a variety of Indian basil has been used to treat many common ailments, and naturopathic physicians may prescribe it in the treatment of diabetes, respiratory disorders, impotence, allergies and infertility.

Basil is also known to have extremely powerful antioxidant properties, especially when it is used in the form of an extract or oil. The natural

Nutritional Value (100 gms) Calorie 23 Protein 3.15 g Carbohydrate 2.65 g Fat 0.64 g Fiber 1.6 g

antioxidants found in basil can protect the body against damage from free radicals, thereby preventing cellular ageing, common skin ailments, and even most forms of cancer. Antioxidants are an important part of maintaining a healthy diet and lifestyle, and basil may be a safe and effective source of these potent, life-giving compounds.

Basil is not only a herb that does you good, it also tastes good, so make sure you get plenty in your diet.

Recipe : Tulsi Ka Kadha

Nutritional Value (approx.) Energy Protein Carbohydrate Fat

35 2 g 11 g 1 g

Ingredients :-

 Water – 1 glass

 Basil Leaves – 10-12 pieces

 Ginger, grated – ½ inch

 Cinnamon – 1 inch

 Clove -2

 Cardamom, slightly crushed – 2

 Bay leaf – 1

 Honey or Jaggery – to taste

Method :-

◊ Mix all the ingredients together and boil till the mixture reduces to half.

◊ Strain and drink it warm.

~ ~ ~ ~ ~

13/02/2020

स्वस्थ रखता है।
*अखरोट*

अगर आप रोजाना चार अखरोट खाते हैं, तो आप कई बीमारियों से बच सकते हैं।

दुनिया के 11 देशों के 55 विश्वविद्यालयों द्वारा किए गए अध्ययन और मनुष्यों पर किए गए परीक्षणों से साबित हुआ है कि अखरोट खाना शरीर के फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और मैग्नीशियम, असंतृप्त वसा, फास्फोरस और ओमेगा -3 अल्फा लिनोलेनिक एसिड के लिए आवश्यक है। (एएलए), खनिजों की पर्याप्त आपूर्ति है। अध्ययन के अनुसार, रोजाना चार अखरोट खाने से कैंसर, मोटापा, मधुमेह की बीमारी से दूर रहने में मदद मिलती है और वजन को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है।

कैलिफोर्निया वालनट कमीशन हेल्थ रिसर्च के निदेशक कैरोल बर्ग स्लोअन ने कहा, "अखरोट पोषण सामग्री ऊर्जा केंद्र हैं और स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त हैं। उन्होंने कहा, 'पेड़ों से निकले 93 प्रकार के नट्स में से केवल एक अखरोट पौधे से पर्याप्त मात्रा में ALA की आपूर्ति करता है। जो शरीर के लिए आवश्यक फैटी एसिड है। ' उन्होंने कहा, 'भारत में बड़ी आबादी शाकाहारी और ओमेगा -3 है और प्रोटीन की कमी से जूझ रही है। ऐसे में अगर वे कुछ अखरोट खाते हैं या उन्हें अपने आहार में शामिल करते हैं तो यह बहुत ही स्वस्थ विचार होगा।
स्लोन ने कहा, "सभी प्रकार के नट्स को आहार में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि वे मोनोसैचुरेटेड फैटी एसिड होते हैं। इसके साथ ही अखरोट में ओमेगा -3 फैटी एसिड होते हैं जो हृदय को स्वस्थ रखते हैं। लगभग 30 ग्राम अखरोट में 2.5 ग्राम एएलए होता है, जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, लेकिन शरीर में उत्पन्न नहीं होता है। ’’ उन्होंने कहा कि अखरोट वजन, मधुमेह, स्तन, मलाशय, प्रोस्टेट कैंसर और हृदय रोग के जोखिम के नियंत्रण में है।
अखरोट खाने से संज्ञानात्मक क्षमताओं, प्रजनन स्वास्थ्य और जीवन शैली से संबंधित अन्य बीमारियों को दूर रखने में भी मदद मिलती है। स्लोन ने कहा कि खाने का संबंध मानव प्रजनन क्षमता से है लेकिन ज्यादातर समय, ध्यान महिलाओं के भोजन पर होता है, और पुरुषों के भोजन पर ध्यान नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा, 'यह पाया गया है कि नियमित अखरोट खाने से पुरुषों की प्रजनन क्षमता में सुधार होता है।'

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08/02/2020

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