Dr. Pradeep Kumar Yadav

Dr. Pradeep Kumar Yadav

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01/11/2022

जो कुयें में होगा वही तो बाल्टी में आयेगा.


किसी गाँव में एक किसान रहता था,
जो दूध से दही और मक्खन बनाकर
बेचने का काम करता था.

एक दिन उसकी बीवी ने ...
उसे मक्खन तैयार करके दिया.
वो उसे बेचने के लिए
अपने गाँव से शहर पहुँचा.

मक्खन गोल पेड़ों की शक्ल में था,
और ... हर पेड़े का वज़न
एक किलो था.

शहर में किसान ने वो मक्खन ...
हमेशा की तरह
एक दुकानदार को बेचा
और दुकानदार से चाय-पत्ती,
चीनी, तेल, साबुन वगैरह खरीदकर
वापस अपने गाँव को रवाना हो गया.

किसान के जाने के बाद ~
दुकानदार ने मक्खन को
फ्रिज़र में रखना शुरू किया.
तभी उसे खयाल आया कि ...
क्यूँ ना एक पेड़े का
वज़न किया जाए.

वज़न करने पर पेड़ा
900 gm. का था.
हैरत और निराशा से उसने
सारे पेड़े तौल डाले, मगर ...
किसान के लाए हुए सभी पेड़े
900-900 gm.के ही निकले.

अगले हफ्ते वो किसान
हमेशा की तरह मक्खन लेकर
जैसे ही दुकानदार की
दहलीज़ पर चढ़ा... दुकानदार ने
किसान से चिल्लाते हुए कहा ~
दफा हो जा !
किसी बेईमान और धोखेबाज़
शख्स से कारोबार करना ...
पर मुझसे नहीं.
900 gm. मक्खन को
एक किलो कहकर
बेचने वाले शख्स की ...
मैं शक्ल भी देखना
नहीं चाहता.

किसान ने बड़ी ही विनम्रता से
दुकानदार से कहा ~ मेरे भाई !
मुझसे नाराज ना हो.
हम तो गरीब और बेचारे लोग है.
माल तोलने के लिए (वजन)
बाट खरीदने की हैसियत
हमारी कहाँ !

आपसे जो एक किलो
चीनी लेकर जाता हूँ, उसी को
तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर
दूसरे पलड़े में उतने ही वज़न का
मक्खन तौलकर ले आता हूँ.
दुकानदार निरुत्तर था.

•┈┈┈•✦✿✦•┈┈┈•

जो हम दूसरों को देंगे, वही तो
~ लौट कर आयेगा ~
चाहे वो इज्ज़त हो, सम्मान हो
~ या फिर धोखा.
इन प्रेरक अहसासों का असर होना चाहिये.

Photos from Dr. Pradeep Kumar Yadav's post 23/10/2022

आप सभी को सपरिवार दीपावली की अनंत शुभकामनाएं।

22/10/2022

वीडियो के लिए नीले लिंक पर क्लिक करें
https://youtu.be/E6lXn2nbT-c

16/09/2022

प्रिय साथियों
मैं आप सभी को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने मुझे अपने व्यस्त जीवन से बधाई देने के लिए समय दिया। आप सब के शब्दों ने मेरे दिल को उज्जवल कर दिया और इन सभी संदेशों ने मेरे जन्मदिन को और भी विशेष दिन बना दिया। आप के प्यार भरे प्यार के लिए आप सभी को हृदय की गहराइयों से आभार।
किसी कारणवश संपर्क न हो पाया हो या कॉल व मेसेज का जवाब नहीं दे पाया हो तो उसके लिए क्षमा।
आपका स्नेह व आशीर्वाद ही मेरी ऊर्जा और प्रेरणा का स्रोत है।
आप सभी का स्नेह,सहयोग,शुभाशीष इसी तरह निरंतर मुझे मिलता रहेगा। इसी आशा और आकांक्षा के साथ पुनः आप सभी का आभार।
सदैव आपके स्नेहाशीष की आकांक्षा में:
डॉ.प्रदीप यादव

24/07/2022
08/07/2022

. ▪️ सत्कर्म करें, अहंकार नहीं ▪️

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे. रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु: एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ?
श्री कृष्ण ने कहा: अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।
तब अर्जुन ने कहा: कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं?
यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले: कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।
श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया।
इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।
अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया। उसने सभी गाँव वालों को बुलाया।
उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।
गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।
लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे। उनमे अब तक अहंकार आ चुका था।
गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे।
जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।
उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।
प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।
उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।
कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।
उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा: यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।
ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।
यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया?
श्री कृष्ण ने अर्जुन को शिक्षाप्रद भाव से जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है।
उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था..
दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए।
वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।
यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।
इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
कथासार: दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है।
यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं, तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए, ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, न कि हमारा अहंकार।
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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08/07/2022

रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।

माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!

कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥

मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए,आप किसी और से बुलवा लो।

अब बारी आई लक्षमण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

ये जो खड़ा है ना , वो हनुमानजी का लक्ष्मण है। मै कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं!

अब बारी आई भरत जी की, अरे! भरत जी तो इतना रोए, कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो!

और दूसरी बात ये कि...!

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।
अधम कवन जग मोहि समाना॥

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।
सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।

अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए, जिन्होंने ने माता सीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो! किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।

अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार!
माता सीता ने कहा,"प्रभु! आप तो तीनों लोकों ये स्वामी है, और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते है।और आप खुद भी कहते हो कि...

प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु!"

राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो

सनमुख होइ न सकत मन मोरा!

देवी! हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।

पहले हनुमान विवाह करें,
लंकेश हरें इनकी जब नारी।

मुदरी लै रघुनाथ चलै,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।

अायि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।

तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।

देवी! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!"

"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"

मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें।"

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए,सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।
रामजी ने हनुमान जी से कहा,"सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद,अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?"

हनुमानजी बोले! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!

"तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"

तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो..?"
सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं। रामजी ने कहा,"ठीक है, मांग लो, सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।"

हनुमानजी ने कहा," प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमे राजमद की शंका हो, "

"तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए...?"

हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए," प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।"

हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।
नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।

जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, "लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा!"

"और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं उसे सब सुनो!"रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले...!

"हे! भरत भैया' कपि से उऋण हम नाही".....

हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, हनुमानजी से उऋण नही हो सकते।"

जय श्री हनुमान जी महाराज की जय हो,जय हो!!!!

रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयो Ajay Kumar Rajpoot

Photos from Dr. Pradeep Kumar Yadav's post 01/07/2022

महिलाओं की रामबाण औषधि

29/06/2022

गरीब की बेटी
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1. वो बेटी, जो एक बड़ी उम्र तक घर के बाहर शौच जाने के लिए अभिशप्त थी.. अब वो भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

2. वो लड़की, जो पढ़ना सिर्फ इसलिए चाहती थी कि परिवार के लिए रोटी कमा सके.. वो अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

3. वो महिला, जो बिना वेतन के शिक्षक के तौर पर काम कर रही थी.. वो अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

4. वो महिला, जिसे जब ये लगा कि पढ़ने-लिखने के बाद आदिवासी महिलाएं उससे थोड़ा दूर हो गई हैं तो वो खुद सबके घर जा कर 'खाने को दे' कह के बैठने लगीं.. वो अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

5. वो महिला, जिसने अपने पति और दो बेटों की मौत के दर्द को झेला और आखिरी बेटे के मौत के बाद तो ऐसे डिप्रेशन में गईं कि लोग कहने लगे कि अब ये नहीं बच पाएंगी.. वो अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

6. जिस गाँव में कहा जाता था राजनीति बहुत खराब चीज है और महिलाएं को तो इससे बहुत दूर रहना चाहिए, उसी गाँव की महिला अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही है।

7. वो महिला, जिन्होंने अपना पहला काउंसिल का चुनाव जीतने के बाद जीत का इतना ईमानदार कारण बताया कि 'वो क्लास में अपना सब्जेक्ट ऐसा पढ़ाती थीं कि बच्चों को उस सब्जेक्ट में किसी दूसरे से ट्यूशन लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी और उनके 70 नम्बर तक आते थे इसीलिए क्षेत्र के सारे लोग और सभी अभिवावक उन्हें बहुत लगाव करते थे'.. वो महिला अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

8. वो महिला, जो अपनी बातों में मासूमियत को जिन्दा रखते हुए अपनी सबसे बड़ी सफलता इस बात को माना कि 'राजनीति में आने के बाद मुझे वो औरतें भी पहचानने लगी जो पहले नहीं पहचानती थी'.. वो अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

9. वो महिला, जो 2009 में चुनाव हारने के बाद फिर से गाँव में जा कर रहने लगी और जब वापस लौटी तो अपनी आँखों को दान करने की घोषणा की.. वो अब भारत की 'राष्ट्रपति' बनने जा रही हैं।

10. वो महिला, जो ये मानती हैं कि 'Life is not bed of roses. जीवन कठिनाइयों के बीच ही रहेगा, हमें ही आगे बढ़ना होगा। कोई push करके कभी हमें आगे नहीं बढ़ा पायेगा'.. वो अब भारत की #राष्ट्रपति बनने जा रही हैं।

दशकों-दशक से ठीक कपड़ों और खाने तक से दूर रहने वाले समुदाय को देश के सबसे बड़े 'भवन' तक पहुँचा कर भारत ने विश्व को फिर से दिखा दिया है कि यहाँ रंग, जाति, भाषा, वेष, धर्म, संप्रदाय का कोई भेद नहीं चलता।

जिनके प्रयासों से उनके गाँव से जुड़े अधिकतर गाँवों में आज लड़कियों के स्कूल जाने का प्रतिशत लड़कों से ज्यादा हो गया है, ऐसी #द्रौपदी मुर्मू जी का हार्दिक स्वागत है 🙏🏻

'राष्ट्रपति भवन' अब वास्तविकता में 'कनक भवन' बन रहा है 🙂

*👍🏽 ओम शांति* 😊

25/06/2022

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।
वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।
उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।

उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था।

मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ?

क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ?

हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा,शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा।और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया।

हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।अन्तत: यश, अपयश ,हार ,जीत, जीवन,मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

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