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HINDUSTAN DEFENCE ACADEMY हूँ भूख मरूं‚ हूँ प्यास मरूं‚ मेवाड़ धरा आजाद रह्वै।
हूँ घोर उजाड़ां मैं भटकूँ‚ पण मन में माँ री याद रह्वै।।
12/11/2025
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योग : जंबूद्वीप में छेद को बांसुरी बताने का खेल
त्रिभुवन
कुछ लोग आपको योग के नाम पर बेवकूफ़ बना रहे हैं।
सबसे पहली बात तो यही है कि क्या आज वाकई योग दिवस है?
और जिसे योग कहा जा रहा है क्या वह योग है?
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आप महर्षि पतंजलि मुनि के "योगदर्शन" को पढ़ेंगे तो जान जाएंगे कि योग क्या है? पूरी दुनिया में योग के नाम पर भ्रम फैलाए जा रहे हैं।
भ्रम फैलाना और उससे फ़ायदा उठाना राजनेताओं का धर्म है; लेकिन हैरानी है कि भ्रम फैलाने में ज्ञान के वे केंद्र भी शामिल हैं, जिनका काम अज्ञान, विभ्रम, झूठ और कपोल-कल्पनाओं को दूर करना है।
भारतीय दर्शन के एक विनम्र विद्यार्थी के नाते मैं कुछ तथ्यात्मक बातें आपसे इस मौके पर साझा करना चाहता हूं।
हालांकि यह तय कि बहुत से लोग इसे अनावश्यक और सिर्फ़ आलोचना का विषय समझेंगे।
लेकिन अगर कोई एक पत्ते को पेड़, एक पन्ने को पुस्तक, पत्थर को पहाड़ और एक छेद को बांसुरी कहने लगे तो आप उसे क्या कहेंगे? योग के नाम पर यही हो रहा है।
अज्ञान किस तरह हमारे सिर चढ़कर बोलता है, उसका उदाहरण आज का दिन है।
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कथित योग गुरुओं ने सिर्फ़ आसनों को ही योग का नाम दे दिया है।
आसन सिखाने वाला हर व्यक्ति अपने आपको योग गुरु या योगी घोषित कर रहा है। यह न केवल ग़लत है; यह झूठ और पाखंड है।
यह भारतीय मनीषा की मानव-समाज को सबसे बड़ी देन का उपहास और अवमूल्यन है और यह नाक़ाबिले-बर्दाश्त भी है।
यह योगदर्शन के प्रवर्तक महर्षि पतंजलि की शिक्षाओं के साथ बहुत बड़ा धोखा है।
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योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि सहित आठ अंगों की एक व्यापक प्रक्रिया को योग कहा है।
वे योग दर्शन के साधन पाद अध्याय दो में कहते हैं : यमनियमआसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो$ष्टावंगानि।।29/80
योग का मतलब उष्ट्रासन या पद्मासन भर नहीं है।
न ही आंखें मींचकर उन पर हाथ रख लेना और लंबी-लंबी श्वासें लेना-छोड़ना है, जैसा कि अज्ञान का एक सामूहिक वैश्विक प्रदर्शन इन दिनों हो रहा है।
योग के आठ अंगों की व्याख्या भौत्तिक विज्ञान के किसी गहन अध्याय का सा मामला है।
योग में हर चीज़ की एक परिभाषा है और उसे मनमर्जी से नहीं बदला जा सकता। योग के आठ सोपान जैसे मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के आठ सोपान हैं।
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योग में निष्णात व्यक्ति न सांप्रदायिक हो सकता, न जातिवादी, न राष्ट्रवादी।
वह इस समग्र भूलोक से अपने आपको जोड़ता है। पूरी सृष्टि को अपने भीतर देखता है और सृष्टि के इस बिंदु में अपना स्पंदन देखता है।
आइए, योग के आठों सोपानों को समझने की कोशिश करें।
1. यम क्या है?
योग का पहला चरण यम हैं। यम जाति, देश, काल और समय से परे हैं। यह सार्वभौम महाव्रत है।
यम यानी आप जीवन में मन, वचन और कर्म से कभी भी हिंसा न करने का संकल्प लेंगे।
सत्य ही बोलेंगे।
अस्तेय यानी चोरी, भ्रष्टाचार या अनैतिकता से कतई दूर रहेंगे।
ब्रह्चर्य का पूर्ण पालन करेंगे और अपरिग्रह को अपने जीवन में उतारेंगे। पतंजलि कहते हैं : अहिंसासत्यास्तेयब्रह्चर्यापरिग्रहा यमा:।।30/80
आप स्वयं तय करें कि क्या आपको योग का दावा करने वाले किसी कथित योग गुरु ये नियम बताया क्या?
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2. नियम क्या है?
योग का दूसरा चरण है नियम।
आप नियमों का पालन करेंगे। यह नियम वह नियम (रूल) नहीं है, जो हम रोज़ घर-दफ़्तर में सुनते हैं। इसके मूल में यम शब्द है। यह जीवन में व्यापक शुचिता के लिए कहता है। शुचित और शौच का पालन करेंगे यानी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से पवित्र रहेंगे।
ये शौच वो शौच नहीं है; जिसका अभिप्राय मल से लिया जाता है।
इस शब्द के साथ भारतीयों ने जो दुर्दशा की है, उसकी पीड़ा कोई उल्लेख नहीं है। ऐसा ही एक शब्द आम के लिए संपूर्ण संस्कृत के काव्य साहित्य में कालिदास जैसे कवियों ने जाने कितनी ही बार किया; लेकिन दुष्टों ने इसे इतना अश्लील बना दिया कि इसे लिखा ही नहीं जा सकता। इस शब्दों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जो बताती है कि श्रेष्ठतम को घृणित बना देने की कला में जैसे हम भारतीय निष्णात हैं, वैसा तो कोई नहीं।
शौच यानी पवित्रता। तन की, मन की और बुद्धि की। हृदय की, मस्तिष्क की और आत्मा की। सब कुछ निर्मल।
शौच सिर्फ़ पवित्रता नहीं है। इसके भी अंग हैं : संतोष, तप, स्वाध्याय और प्रणिधान।
यहां संतोष का अर्थ न्यूनतम साधनों और संसाधनों में जीवन यापन है, न कि जो मिल गया उस पर संतोष कर लेना।
तप यानी अपने देश और काल में जो सबसे न्यूनतम सुविधाओं के साथ जीवन यापन कर रहा है, आप सदैव उसके स्तर पर रहने का अभ्यास करें। इसी तरह स्वाध्याय और प्रणिधान के अर्थ हैं।
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3. आसन क्या है?
और आसन ये उलटे-सीधे क्रियाकलाप नहीं हैं। ये बैठने, उठने या स्वस्थ रहने वाले फ़िज़ियोथेरिक क्रियाएं भर नहीं हैं।
योग दर्शन कहता है : स्थिरसुखमासनम्।।
यानी जिसके स्थिर होने पर सुख का अनुभव होता है यही आसन है।
पद्मासन ही नहीं, वीरासन, भद्रासन, दंडासन और स्वस्तिकासन में दिन भर रहना भी आसन है।
आजकल जिन फ़िज़ियोथेरेपिक क्रियाओं को करवाने वाले योग गुरु कहलाते हैं और अज्ञानी लोग जिन क्रियाओं को सीखने के लिए इन कथित योग गुरुओं को पैसा देते हैं और आजकल विश्वविद्यालय जिन बातों को सिखाने के लिए डिग्रियां दे रहे हैं, वे अपने बेहतरीन रूप में अभी कुछ दशक पहले तक भारतीय जीवन का अभिन्न अंग थीं।
भारतीय लोगों का एक वर्ग जो योग के एक खंड में निहाल हो रहा है, वह पाकिस्तानी हिस्से वाले कश्मीर के संबंध में किसी ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करने को तो राजद्रोह मानने लगता है; लेकिन योग की उन अखंड क्रियाओं को छोड़ देने में अपनी आधुनिकता समझता है, जिसने उसे रोगी और मनोरोगी बना डाला है, जो हमारे जीवन का हिस्सा थीं।
इस प्रकृति के उन शत्रुओं को हमने शासन और प्रशासन में बिठा रखा है और उन्हें क़ामयाबी का प्रतीक मानते हैं, जिन्होंने वृक्षों का विनाश कर दिया, सड़कों को पैदल चलने वालों की अमानवीय उपेक्षा करके सिर्फ़ बेतहाशा दौड़ते वाहनों के लिए आरक्षित कर दिया, जिन्होंने भारत की समृद्धतम प्राकृतिक सौंदर्य को विनाश में बदल दिया।
गांधी ने हिन्द स्वराज में 1909 में उन चीज़ों को मनुष्य को बीमार प्राणी में बदल देने वाला बताया था, जिन्हें हमारे शासकों ने आधुनिक मानकर देश का सब कुछ लुटा दिया था।
गांधी जी ने इस अद्भुत पुस्तक में स्वराज, आधुनिक सभ्यता और मैकेनाइजेशन पर ऐसे विचार दिए हैं, जो एकबारगी पचते नहीं; लेकिन वे जो आशंकाएं बता रहे हैं, वह तबाही के रूप में आज हमारे सामने जीवंत है।
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4. प्राणायाम क्या है?
प्राणायाम कुंभक और रेचक ही नहीं है। यह प्राणों पर नियंत्रण की क्रिया है और इसके लिए आपको पर्वतों, नदियों, झीलों, पक्षी कलरव और न जाने कैसे-कैसे प्रकृति की रक्षा करनी होगी।
प्राणायाम सांसों को ऊपर नीचे करना या एक समय कपाल-भाति करना भर नहीं है।
कपालभाति सांसें ऊपर-नीचे करना नहीं है। योगदर्शन के जानकारों का कहना है कि कपालभाति की नहीं जाती है। वह स्वत: होती है। कपाल भाति वह प्रक्रिया है, जिसमें सांसों का तीव्र आंदोलन एक-दो या तीन मिनट के लिए होता है। जैसे आप दौड़कर आते हैं तो ऐसा होता है। लेकिन अगर कोई योग गुरु है, वह प्राणायाम करता है तो निर्भीकता उसकी स्वत: परिणति है।
योग बेचने या पैसा कमाने की वस्तु नहीं है; क्योंकि जहाँ धन है, वहाँ योग-सुयोग नहीं, सिर्फ़ अभियोग होता है। वह जीवन को निर्मल बनाने और उसमें लबालब मनुष्यता भर देने वाला एक सुमार्ग है।
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5. प्रत्याहार क्या है?
मुनि पतंजलि कहते हैं : योग का पांचवां अंग प्रत्याहार है। प्रत्याहार यानी समस्त अंग-प्रत्यंग में ज्ञानवृत्तियों को चेतनशीलता से नहलाना और उनमें ज्ञानवृत्तियां जगाना।
यह बहुत लंबी व्याख्या है, जिसे यहां मुझ अल्पज्ञ व्यक्ति, जो भारतीय योगशास्त्र के बारे में बहुत उथली सी जानकारियां रखता है, बता पाना नामुमकिन है। इसे योगदर्शन का कोई योग्य विद्वान् ही बता सकता है। लेकिन जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ : प्रत्याहार का अर्थ है, पीछे खींच ले जाना। इसका अर्थ गहन है। जीवन में हर चीज़ आगे चलती है। यहीं से शरीर के भीतर दुर्घटनाएं घटित होने लगती हैं। यहीं मन और आत्मा के मार्गों पर रक्तपात होता है। मनुष्य शिशु होता है। मन की निर्मलता चरम पर होती है। शिशु किसी साधु से भी निर्मल होता है। उसके लिए राष्ट्र, समाज, जाति, काला-सफेद, जीवन-मरण, ज्ञान-अज्ञान कुछ नहीं होता। तो अगर आप जवान हैं तो शिशु रहिए, आप वृद्ध हैं तो जवान रहिए और अगर आप मर गए हैं तो जीवित रहिए। अपने आपको पीछे खींच लें। प्रत्याहार करें। ऐसे काम करें कि मर जाएं तो जीवित की तरह प्रकाशमान रहें।
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6. धारणा क्या है?
योग के छहवें चरण पर मुनि पतंजलि कहते हैं : धारणासु च योग्यता मनस:।। 53/104 यानी मुनष्य को धारणाओं के अनुष्ठान करने होते हैं।
ये कोई कर्मकांड नहीं है। यह शुद्ध रूप से मानसिक क्रियाकलाप है। यह वह धारणा नहीं है, जिसे पर्सेप्शन कहा जाता है।
धारणा एक तरह से ध्यान की ओर जाते समय राह का वह आवश्यक बिंदु है, जो आपको एक्ट ऑव हॉल्डिंग सिखाता है, एक्ट ऑव बियरिंग की डिमांड करता है, जो आपको एक्ट ऑव वियरिंग, सपोर्टिंग, मेंटेनिंग, रिटेनिंग और कीपिंग बैक की प्रक्रिया सिखाता है और बताता है कि किस तरह आपको अपनी आत्मा में केवल बेहतरीन स्मृतियों को ही निवास करने देना है और किस तरह आपको ऐसी स्मृतियों को तत्काल तिरोहित कर देना है, जो आपकी आत्मा को घृणा का कुंड बना दें।
भारतीय मनीषियों ने अगर इतिहास नहीं लिखा तो इसीलिए कि इतिहास आपके लिए घृणाएं समेटकर रखता है।
अगर हम भारतीय दर्शन के अनुसार धारणा के इस रूप को देखें तो आज भारत के एक बड़े वर्ग में घृणा, हिंसा और अमानुषिकता की पदचाप देखते हैं तो वह योग के इस दर्शन के माध्यम से बहुत सुस्पष्ट होकर सामने आती है।
योगदर्शन कहता है कि धारणा उस अवस्था में आ जाना है, जिसमें आप शांत, स्थिर, निर्विकार और न्यायपूर्ण हो जाते हैं। आप शत्रु और मित्र के भाव से परे की अवस्था में चले जाते हैं। वह अवस्था, जो आपको ध्यान में ले जाती है।
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7. ध्यान क्या है?
आचार्य पतंजलि का कहना है : तत्र प्रत्ययैकतानताध्यानम्। 2/108
यानी अपनी स्वयं की काया और चित्त के साथ साथ समूचे देश और काल को ध्यानस्थ कर देने की यह मुद्रा सातवां योगांग है।
ध्यान अटेंशन या कंसीड्रेशन नहीं है। यह मेडिटेशन भी नहीं है। यह हमारे अंत:करण की वह चेतन अवस्था है, जिसमें आप इतने चैतन्य हो जाते हैं कि जो घटित हो रहा है, उसे आप स्वत: समझने लगते हैं और उसके लिए न किसी से आपको कहना पड़ता है और न किसी को आपसे कहने की ज़रूरत होती है। सब कुछ स्वत: अनुकूल और प्रफुल्लित कर देने वाला घटता है। यह नदी और जल के रिश्ते जैसा संबंध है। यह चाँद और रात के से रिश्ते की अवस्था है। ध्यान वह बिंदु है, जहाँ आपके भीतर गहरे अंधेरे से एक नई सुबह निकलती है।
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8. समाधि क्या है?
और आठवां योगांग समाधि है : तदेवार्थमात्रनिर्भाससं स्वरूपशून्यमिव समाधि।।
लेकिन यह समाधि भी वह समाधि नहीं है, जो प्रचारित की जाती है। कई बार समाधि दे दी है, कई बार ले ली जाती है।
यह ईश्वर के ध्यान मग्न होने का दिखावा करने वाली अवस्था भी नहीं है।
यह उन योगियों का छलावा भी नहीं है, जो कहते थे कि इससे चार सिद्धियां प्राप्त होती हैं, जिन्हें संप्रज्ञात, सवितर्क, सविचार और सानंद कहते हैं।
समाधि के नाम पर भारतीय जीवन में चालाक और छलिये लोगों ने कितनी ही आधि और व्याधि पैदा कर रखी हैं।
समाधि सहज जीवन जीने की वह सूक्ष्म और सतत क्रिया है, जिसके बिना योग कभी पूरा नहीं होता।
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समाधि यानी पूरे वातावरण को चैतन्य से परिपूर्ण करके त्रयमेकत्र संयमों का पालन, प्रज्ञालोक में अवतरण और भूमि विनियोग के निर्वैचार्य से परिपूर्ण होना। समाधि वह अवस्था है, जो समाधान तलाश कर लाती है, न कि नए व्यवधान पैदा करती है।
घर में, परिवार में, नगर में, राज्य में, देश और दुनिया में, जीवन के किसी भी क्षेत्र में और इस समूचे ब्रह्मांड में जो व्यवधान पैदा कर रहा है, वह योग का शत्रु और जो समाधान है, वह समाधि है।
समाधि समय से जुड़ी है। आज हम देखते हैं कि हमारे चारों तरफ हिंसा और उत्तेजना का एक रेगिस्तान फैला हुआ है। चारों तरफ तरह-तरह की मृगतृष्णाओं और मरीचिकाओं का घटाटोप है।
जितने भी रोशनी के खंभे हैं, सब अंधेरे उलीच रहे हैं। भले वे जातियां हों, सड़कें हों, संप्रदाय हों, धर्म हों, देश हों, अदालतें हों, मीडिया हो, राजनीति हो, व्यापार हो। अब राह निकलने का नहीं, रोकने का नाम है।
आप बताइए कि सड़क जो चलने के लिए होती है, कोई पैदल चल सकता है उस पर?
कुत्सिक भोगों में डूबे हुए लोग योग के नियंता हो गए हैं। संकटों का समाधान निकालने के बजाय विपदा में बदल डालने वाले अपनी षड्यंत्रों को समाधि प्रचारित कर रहे हैं।
जो अतीत और वर्तमान को बिगाड़ रहे हैं और भविष्य की बर्बादियां लिख रहे हैं, वे अपने योगी होने के दावे कर रहे हैं।
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भारतीय मनीषा कहती है, रमता जोगी, बहता पानी, निर्मला। यानी जोगी रमता और पानी बहता ही निर्मल होता है।
अब जोगी ठिकानेदार हो गया है और योग उसका बंधक। अब पानी बोतलों में बिक रहा है और पानी के कारोबारी हमेशा मुनाफ़े में रहें इसलिए जलस्रोत दूषित हो रहे हैं।
धर्म त्रस्त को सुकून देने का नाम है। लेकिन अब सुकून में बैठे लोगों को त्रस्त कर देने को धर्म कहा जाता है।
कुछ साल पहले उस समय के एक श्रेष्ठ योग गुरु जयपुर में एक सुनाम न्यायाधीश के आवास पर बता रहे थे कि आजकल योग वे लोग सबसे अधिक करते हैं, जिनसे समाज को खतरा है और जो समाज के लिए जरूरी हैं, वे योग से भागते हैं। वे बता रहे थे कि योग आजकल भोग का नाम है और रात को अच्छी तरह भोगा जा सके, इसलिए ऐसे लोग नियमित रूप से योग करते हैं। इसमें आश्चर्य की बात नहीं।
हर युग में अच्छी चीज़ें बुरे लोगों के हाथ लगती रही हैं। योग ने भारतीय मनुष्य के हृदय को कभी ऐसा बनाया था कि वह सुदूर किसी व्यक्ति की वेदना को निहारता था तो दु:ख से उसके नेत्र नक्षत्रों को निहारने लगते थे और आज ऐसा समय है कि दुष्ट नक्षत्रों को निहारते हुए वेदनाओं को उतारने में लगे रहते हैं और उसे योग कहते हैं।
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योग दया, करुणा और विनम्रता की उपासना का पथ है।
घृणाओं और हिंसक प्रवृत्तियों के दमन की राह है।
योग रक्त-पिपासा की कल्पना तक से मुक्ति का नाम है।
हिंसा, युद्ध, बर्बरता और भीषण अशांति रचने के दु:स्वप्नों से दूरी बनाने का नाम योग है।
सामाजिक विषमताओं के उन्मूलन करने के राजपथ का नाम योग है। योग दान देने, बांट कर खाने, संचित नहीं करने और विशाल हृदयता का नाम है।
योग काया के भीतरी ही नहीं, अपने आसपास के समस्त द्वद्वों को मिटाने का नाम है। योग इस काया को ही नहीं, इस समूची धरती को ब्रह्मपुरी बनाने का नाम है। योग वह क्रिया है, जब आप किसी को कष्ट में देखें तो आपके प्राण बिलख-बिलख कर रोएं। आप जब किसी निरीह पर अत्याचार देखें तो आपके भीतर क्रंदन होने लगे।
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योग वह अवस्था है, जब सारे हृदयों की वेदना आपकी वेदना बन जाए। लेकिन किसी के जीवन में काल के निर्मम आघात बुनने वाले भले शीषार्सन करें या पवनमुक्तासन, वे इस देश की योग परंपरा की आभा और उसके आलोक को क्षति पहुँचाएंगे।
योग जाग जाना है। ऐसा जाग जाना, जिसमें आपको किसी की सिसकी का स्वर घनी रात में भी सुनाई दे। योग जागने की वह अवस्था तो नहीं ही है, जो आपको मनुष्यातद्वेषी बना दे।
योग शीतकाल में छिटकती गरमी उजली धूप है, योग ग्रीष्मकाल में नई निकली कोंपलों से निर्मित घनीभूत छाया की मधुर सांत्वना है।
योग अतीत की घृणाओं में डूबी भयावह जड़ता नहीं है। योग शुचितापूर्ण अदम्य शक्ति देने की राह है। योग हमारे पुरखों के सुनहले ज्ञान पुंज को छोड़कर बटोर लाए गए कूड़े-कर्कट से भरे कनस्तरों का नाम नहीं है।
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योग वह पतली असिधार है, जो अंधेरे को चीरती हुई अज्ञान, कुतर्क, अविवेक और अवैज्ञानिकता को दूर कर पूरे युग की देह को रोमांचित कर डालती है।
⧪⧪
18/05/2024
वर्ष 1999 में मेरा गांव पहली बार डामर सड़क से जुड़ा था। इससे पहले हमारे गांव में भीनमाल की ओर से आने वाली बस व अन्य साधन को धुंबड़िया नदी व बागोड़ा से भुंडवा तक के कच्चे रास्ते में अनेकों बार मिट्टी में धंसना पड़ता था। उन दिनों आवागमन का प्रमुख साधन बस ही हुआ करता था। लोगों के पास बहुत कम साधन हुआ करते थे। पूरे गांव में गिने चुने लोगों के पास चारपहिया वाहन हुआ करता था। उन दिनों हम देखते थे की बस के अंदर दो हेल्पर बैठा करते थे जिनके हाथ में फावड़ा और लोहे की चौड़ी चैनल हुआ करती थी। जिस भी जगह बस नदी या कच्चे रास्ते की रेत में धंस जाती थी वहां पर वो हेल्पर नीचे उतर कर फावड़े से टायर के आगे और पीछे की रेत निकाल कर वहां सणीया या बूड़ा फंसा कर बस में बैठे जवान सवारियों को नीचे उतारकर बस को धक्का दिलवाते थे। बस के रेत से बाहर निकलते ही बस में बैठी सवारियां उन हेल्पर को यथा संभव एक–एक या दो रूपये का यथासंभव आर्थिक सहयोग करती थी। इस तरह रेत में ज्यादा धंसने पर लोहे की चौड़ी चैनल की मदद लेकर बस को बाहर निकाला जाता था। जिस भी स्टेशन पर बस रुकती थी वहां सर्वप्रथम यात्री बस में आकर अपने जेब से रुमाल या अन्य कोई सामग्री रख देता था उससे वो सीट उसकी उस समय से आरक्षित समझी जाती थी ! सीट पर रूमाल रख आदमी मजे से नीचे उतरकर बस स्टैंड से घरेलू सामग्री और अन्य जरूरत की सामग्री खरीद लाता था! तब तक यदि बस पूरी भर भी जाती थी तो भी उस रूमाल को हटाकर बैठने की कोई हिम्मत नही करता था, इसे चाहे उन दिनों का अनुशासन समझे या सिस्टम । आजकल बस स्टेंड पर बस के रुकते ही सवारियों द्वारा पानी की बोतल खरीदी जाती है उन दिनों बस स्टैंड पर पानी की बोतल बहुत कम उपलब्ध होती थी। उस समय बस से उतरकर प्याऊ से पानी पी आते थे या खरीदने के नाम पर ५०पैसे या १रूपये की कुल्फी खरीदी जाती थी या १रूपये का पानी का पाउच ! उन दिनों ड्राईवर के पास वाली कैबिन सीट पर बैठना शान समझा जाता था, शेष लोग मन ही मन कैबिन में बैठे आदमी के बारे में सोचते थे कि ये आदमी ठरके वाला हैं। कंडक्टर भी कई बार उस कैबिन में बैठे आदमी का टिकट नहीं लेता था इससे उस आदमी के ठरके में और वृद्धि हो जाती थी। तब कंडक्टर का अपना अलग ही रुतबा हुआ करता था, उसके हाथ में पैसों की गड्डी देख हमारे बालमन में बार–बार ख्याल आता कि काश! बड़े होकर कंडक्टर बन जाए। उन दिनों यातायात के साधन कम होने के कारण प्रत्येक बस ठसाठस भरी होती थी, उस ठसाठस बस का सबसे रोमांचक सीन होता था बस के अंदर की सवारियों का भाड़ा लेकर कंडक्टर का चलती बस से खिड़की में होकर अचानक बस की छत पर चले जाना/प्रकट होना ! हम बच्चों के लिए वो सीन किसी फिल्म के दृश्य से कम नहीं होता था। आज यह तस्वीर सामने आई तो ढ़ाई दशक पुरानी यादें ताजा हो उठी।
क्या आप भी इस तरह की यात्रा के अनुभव से गुजरे है ? यदि हां !
तो अपने अनुभव अवश्य शेयर करें ☺️
08/01/2024
15 किलो दूध, 6 किलो गाजर ,एक किलो काजू,एक किलो देशी घी ,एक किलो बादाम ,एक किलो खोवा और डेढ़ किलो चीनी जब जाके तैयार हुवा है ये गाजर का हलवा😍🥰😘
12/12/2023
01/11/2023
आज के छात्रों को शायद नहीं पता होगा कि भारतीय भाषाओं की वर्णमाला वैज्ञानिकता से भरी है वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक हैं और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है..इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं हैं...जैसे-
◆ क ख ग घ ङ - पाँच के इस समूह को 'कण्ठव्य' या 'कंठ्य' कहा जाता है, क्योंकि इस का उच्चारण करते समय कंठ से ध्वनि निकलती है। उच्चारण का प्रयास करें।
◆ च छ ज झ ञ - इन पाँचों को "तालव्य" कहा जाता है, क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ तालु से स्पर्श होती है। उच्चारण का प्रयास करें।
◆ ट ठ ड ढ ण - इन पाँचों को मूर्धन्य या मूर्धव्य कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ मूर्धन्य (ऊपर उठी हुई) महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।
◆ त थ द ध न - पाँच के इस समूह को दन्त्य या दंतव्य कहा जाता है, क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ दांतों को छूती है। उच्चारण का प्रयास करें।
◆ प फ ब भ म - पाँच के इस समूह को कहा जाता है ओष्ठव्य या ओष्ठ्य। क्योंकि दोनों होठ इस उच्चारण के लिए मिलते हैं। उच्चारण का प्रयास करें।
◆ क्या दुनिया की किसी भी अन्य भाषा में ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है? हमें अपनी भारतीय भाषा के लिए गर्व की आवश्यकता है। लेकिन साथ ही हमें यह भी बताना चाहिए कि दुनिया को क्यों और कैसे बताएँ दूसरों को भेजे और हमारी भाषा का गौरव बढ़ाएँ....
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