Vaidya Dr. Ajay Gupta

Vaidya Dr. Ajay Gupta

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Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.

Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU

30/08/2026

बहुत से लोगों की FibroScan रिपोर्ट में Grade 4 या Liver Cirrhosis लिखा आता है, और रिपोर्ट देखते ही सबसे पहला सवाल यही होता है — क्या यह पूरी तरह से ठीक हो सकता है? कितना समय लगेगा और कितना पैसा लगेगा?
यह बहुत महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न है, और किसी भी सवाल का जवाब देना आसान नही है। और ऐसे प्रश्न पूछना उचित भी नही है। यदि चिकित्सक सही बात बताएगा तो आप निराश हो जाएंगे और उम्मीद छोड़ देंगे, उम्मीद छोड़ देंगे तो ठीक होना और मुश्किल हो जाएगा।
क्या यह पूरी तरह से ठीक हो सकता है? और यदि मान लीजिये इसका जवाब है- नहीं, तो क्या मरीज को उसकी हालत पर छोड़ दिया जाए मRने के लिए या कोशिश की जाए कुछ बेहतर करने के लिये।
किसी भी स्थिति में मरीज को ऐसे ही नही छोड़ा जा सकता। बहुत से ऐसे रोग होते है जिनमे पूर्ण स्वस्थ होना संभव नही होता फिर भी उनका इलाज इसलिए किया जाता है जिससे उनकी बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सके, उनकी उम्र कुछ और बढ़ायी जा सके। आज का पोस्ट सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, पूरी पोस्ट पढ़िए और अधिक से अधिक शेयर कीजिये। जागरूकता और सही जानकारी ही सबसे बढ़िया इलाज है।

तो चलिए सबसे पहले बीमारी की गंभीरता को समझते है-

🔥 Grade 4 / Cirrhosis का मतलब क्या है?
FibroScan में Grade 4 आमतौर पर advanced fibrosis या cirrhosis की ओर संकेत करता है। इसका मतलब यह नहीं कि लिवर तुरंत काम करना बंद कर देगा, बल्कि यह बताता है कि लिवर पर पुराना नुकसान काफी बढ़ चुका है।

🍁 क्या यह पूरी तरह ठीक हो सकता है?
सीधा उत्तर है: हर मरीज में पूरी तरह normal होना संभव नहीं होता, लेकिन बहुत मामलों में बीमारी को रोका जा सकता है, सुधारा जा सकता है, और कुछ हद तक fibrosis reverse भी हो सकता है। लेकिन बहुत से सोशल मीडिया पर इंफ्लुएंसर और फर्जी चिकित्सक है जो 100% ठीक होने की गारंटी देकर आपको गुमराह करते है, आपके समय और धन की बर्बादी करते है। इसलिए किसी फर्जी चिकित्सक के चक्कर में बिना पड़े किसी योग्य डिग्री वाले आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लीजिये।

आपका लिवर कितना ठीक हो पायेगा यह निर्भर करता है:
• कारण क्या है? (Alcohol, Fatty liver, Hepatitis B/C, Autoimmune disease आदि)
• Cirrhosis compensated है या decompensated?
• Ascites, jaundice, bleeding, encephalopathy है या नहीं
• मरीज ने समय पर इलाज शुरू किया या नहीं
• जीवनशैली में बदलाव किया या नहीं

🤔 अगर कारण हट जाए तो क्या सुधार होता है?
हाँ, कई मरीजों में अच्छा सुधार देखा जाता है:
• Alcohol बंद करने पर लिवर काफी recover कर सकता है
• Hepatitis B/C का इलाज होने पर fibrosis कम हो सकता है
• Fatty liver + diabetes + obesity control करने पर stiffness कम हो सकती है
• Weight loss, exercise, diet से progression रुक सकता है

🤔 क्या FibroScan रिपोर्ट अंतिम सत्य है?
नहीं। FibroScan बहुत उपयोगी test है, लेकिन कभी-कभी:
• सूजन
• हाल की शराब सेवन
• obesity
• congestion
• fasting न होना
इन कारणों से reading ज्यादा आ सकती है। इसलिए केवल FibroScan देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। साथ में LFT, CBC, INR, Ultrasound, Platelet count, clinical symptoms भी देखे जाते हैं।

Grade 4 = अंत नहीं है। बहुत से लोग वर्षों तक controlled जीवन जीते हैं, यदि कारण पकड़ा जाए और समय पर इलाज हो। घबराने के बजाय सही staging, सही कारण, और सही management जरूरी है।

इस स्थिति में भी आयुर्वेद बढिया काम करता है। भले ही आप पूर्ण स्वस्थ ना हो पाए लेकिन इससे आपको बेहतर लाभ मिलेगा, आपके कॉम्प्लिकेशन को कम करेगा और निश्चित ही आपके जीवन को कई वर्षों तक बढ़ाएगा।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 082993 082993 02319
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

30/08/2026

कही पर भूकंप, कही पर जल प्रलय, कही पर सुनामी, और कही पर महामारी? आजकल विश्व के अलग अलग देशों में संकट दिख रहा है उसकी कल्पना क्या हजारों वर्ष पहले की गई थी?

क्या आचार्य चरक ने महामारी, पर्यावरणीय संकट और Climate Change की एक समग्र अवधारणा प्रस्तुत की थी?

चरक संहिता के विमानस्थान में वर्णित “जनपदोद्ध्वंसनीय विमान” आज के समय में केवल एक ऐतिहासिक या शास्त्रीय विषय नहीं रह गया है। जब हम दुनिया में बढ़ती महामारियों, नए संक्रामक रोगों, जलवायु परिवर्तन, असामान्य मौसम, वायु एवं जल प्रदूषण, बाढ़, सूखा और मानव–पशु–पर्यावरण के बदलते संबंधों को देखते हैं, तो चरकाचार्य का यह वर्णन असाधारण रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है।

चरक का जनपदोद्ध्वंस सिद्धान्त आधुनिक epidemiology, microbiology या germ theory से काफी मिलता जुलता है। और यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इसमें population health, environmental determinants और सामूहिक रोग-प्रसार को समझने वाला एक अत्यंत विकसित समग्र दृष्टिकोण मिलता है।

जनपदोद्ध्वंस क्या है?
चरकाचार्य के सामने अग्निवेश का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है—
जब दो मनुष्यों की प्रकृति, आहार, शरीर, बल, सात्म्य, सत्त्व और आयु अलग-अलग हैं, तो एक ही समय में एक ही प्रकार का रोग उन्हें कैसे प्रभावित कर सकता है?
यह प्रश्न मूलतः आज के epidemiology के एक केंद्रीय प्रश्न जैसा है:
एक population में अलग-अलग individual characteristics के बावजूद एक ही समय में बड़ी संख्या में लोग किसी disease या health emergency से क्यों प्रभावित होते हैं?

चरकाचार्य इसका उत्तर व्यक्ति में नहीं, बल्कि उन साझा environmental factors में खोजते हैं जो सभी लोगों को समान रूप से प्रभावित करते हैं।
वे चार भाव बताते हैं—
1. वायु,
2. जल,
3. देश और
4. काल।

जब ये विकृत होते हैं तो जनपदोद्ध्वंस, अर्थात् बड़ी जनसंख्या में रोग और मृत्यु की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
1. “वायु” — आज का Air Pollution और Environmental Exposure
चरकाचार्य ने विकृत वायु के अनेक लक्षण बताए हैं—अत्यधिक वेग, अत्यधिक शीत या उष्ण स्पर्श, रूक्षता, दुर्गन्ध, धूल, धुआँ, बालू के कण तथा अन्य अशुद्धियों से युक्त वायु।
यदि हम इसे आधुनिक environmental health के संदर्भ में देखें तो इसमें एक महत्वपूर्ण conceptual parallel दिखाई देता है।
आज दुनिया में air pollution एक प्रमुख public-health problem है। Particulate matter, smoke और अन्य air pollutants respiratory तथा cardiovascular diseases सहित अनेक health outcomes को प्रभावित करते हैं।
अर्थात्—
वायु की विकृति → व्यापक population exposure → सामूहिक स्वास्थ्य-हानि
चरक की भाषा में यह विकृत वायु है।
आधुनिक विज्ञान इसे pollutant exposure, particulate matter, toxic gases और environmental air quality के माध्यम से मापता है।
दोनों की भाषा अलग है, लेकिन “साझा पर्यावरणीय exposure से बड़ी जनसंख्या का प्रभावित होना” एक महत्वपूर्ण समानता है।

2. “जल” — Water Quality और Water-borne Diseases
चरकाचार्य ने दूषित जल के कई संकेत बताए हैं—
गन्ध में परिवर्तन
वर्ण में परिवर्तन
रस में परिवर्तन
स्पर्श में परिवर्तन
जलाशय का सूखना
जलचर प्राणियों की मृत्यु
जल का अरुचिकर होना
आधुनिक public health में सुरक्षित drinking water को infectious disease prevention का मूल आधार माना जाता है।
Contaminated water के माध्यम से अनेक diseases फैल सकती हैं, जैसे—
Cholera
Typhoid
Hepatitis A
Hepatitis E
अनेक diarrhoeal infections
इसलिए चरक का “विकृत जल” आधुनिक water-quality और water-borne disease epidemiology के साथ अत्यंत उपयोगी comparative framework प्रदान करता है।

3. “देश” — केवल भूमि नहीं, पूरा Ecosystem
जनपदोद्ध्वंसनीय विमान का शायद सबसे आधुनिक दिखाई देने वाला भाग है—विकृत देश।
चरकाचार्य केवल मिट्टी या भौगोलिक क्षेत्र की बात नहीं करते। वे एक पूरे ecological system में परिवर्तन के संकेत बताते हैं।
वे वर्णन करते हैं—
अत्यधिक सड़न
मच्छर और मक्खियों की वृद्धि
मृत पशु-पक्षियों की अधिकता
असामान्य पशु व्यवहार
फसल का नष्ट होना
धुआँ
जलाशयों का परिवर्तन
पर्यावरण में असामान्य गतिविधियाँ
आज हम इसे ecosystem health और One Health के संदर्भ में पढ़ सकते हैं।
आधुनिक One Health दृष्टिकोण मानव स्वास्थ्य को अकेले नहीं देखता, बल्कि:
Human + Animal + Plant + Ecosystem
को एक दूसरे से जुड़ा हुआ मानता है।
WHO का One Health framework⁠
यहीं आचार्य चरक की अवधारणा अत्यंत रोचक हो जाती है।

4. “काल” — सबसे अधिक व्यापक अवधारणा
चरकाचार्य कहते हैं कि जिस ऋतु में जो लक्षण होने चाहिए, उनसे विपरीत, अधिक अथवा कम लक्षण दिखाई दें तो वह विकृत काल है।
आज हम इसे broadly इन phenomena से जोड़कर देख सकते हैं—
Heat waves
Unseasonal rainfall
Extreme cold
Drought
Floods
Changing humidity
Changing vector ecology
Seasonal disease patterns में बदलाव

WHO के अनुसार climate change heatwaves, floods और storms जैसे extreme weather events के माध्यम से health को प्रभावित कर रहा है तथा food-, water- और vector-borne diseases तथा zoonoses के जोखिम को भी प्रभावित कर रहा है।
इसलिए चरक का काल-विकार आज के climate-health relationship के साथ एक महत्वपूर्ण conceptual comparison प्रस्तुत करता है।

आज का Dengue—चरक के सिद्धान्त को समझने का एक अच्छा उदाहरण
Dengue इस तुलना का एक बहुत अच्छा उदाहरण है।
2024 में WHO को दुनिया के छहों regions से लगभग 14.43 million dengue cases report हुए, और dengue transmission अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचा। WHO ने इसके साथ बढ़ते तापमान और urban environments में Aedes mosquitoes की बढ़ती उपस्थिति को भी महत्वपूर्ण context के रूप में वर्णित किया है।

अब इसे आधुनिक epidemiological chain में देखें:
Temperature + rainfall + humidity + water storage + urbanisation

Aedes mosquito ecology

Dengue virus transmission

Large population affected

चरक की conceptual language में:
काल + जल + देश की विकृति

जनपद में रोग-वृद्धि
यहाँ environmental determinants के माध्यम से population disease को समझने की समान दिशा स्पष्ट है।

चरक का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—“सभी लोग एक साथ क्यों बीमार पड़ते हैं?”
यहाँ जनपदोद्ध्वंसनीय विमान का वास्तविक महत्व सामने आता है।
चरकाचार्य यह नहीं कहते कि सभी मनुष्य समान हैं। वे स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि मनुष्यों में अंतर है—
प्रकृति अलग, आहार अलग, देह अलग, बल अलग, सात्म्य अलग, सत्त्व अलग और आयु अलग।
फिर भी एक सामूहिक रोग-प्रकोप संभव है।
क्यों?
क्योंकि कुछ factors shared determinants हैं।
यही आज के public health की मूल अवधारणा है।
एक व्यक्ति की individual susceptibility अलग हो सकती है, लेकिन यदि पूरी population किसी common hazard के संपर्क में आती है तो population-level disease burden उत्पन्न हो सकता है।

“प्रज्ञापराध” को आधुनिक भाषा में कैसे समझें?
चरकाचार्य environmental disruption के मूल में अधर्म और उसके मूल में प्रज्ञापराध की चर्चा करते हैं।
इसे आधुनिक विज्ञान में सीधे “धार्मिक पाप” के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इसके बजाय इसे एक broader conceptual category के रूप में देखा जा सकता है—

गलत मानवीय निर्णय + असंतुलित व्यवहार + सामाजिक विफलता + पर्यावरण का अनुचित दोहन + governance failure

आज climate change के संदर्भ में भी मानव गतिविधियाँ environmental change की प्रमुख drivers में हैं।
WHO climate change को health के लिए एक व्यापक risk multiplier मानता है, जो extreme weather, food insecurity, environmental degradation तथा infectious diseases के जोखिमों को बढ़ा सकता है।

इस दृष्टि से चरक का संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है:
स्वास्थ्य केवल औषधि से सुरक्षित नहीं किया जा सकता; स्वस्थ समाज के लिए स्वस्थ पर्यावरण और स्वस्थ आचरण भी आवश्यक हैं।
1. “रोगी को बचाओ” से आगे—“जनपद को बचाओ”
आधुनिक चिकित्सा में हम अक्सर clinical medicine और public health को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में पढ़ते हैं।
लेकिन जनपदोद्ध्वंसनीय विमान का दृष्टिकोण अधिक व्यापक है।
जब environmental determinants बिगड़ते हैं तो केवल individual treatment पर्याप्त नहीं है।
हमें simultaneously काम करना होगा—

आज के Climate Change के युग में “जनपदोद्ध्वंस” को फिर पढ़ने की आवश्यकता
WHO के अनुसार climate change पहले से ही heatwaves, storms, floods, food-system disruption, zoonoses तथा food-, water- और vector-borne diseases के माध्यम से मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

2026 में WHO ने extreme heat को भी एक गंभीर public-health challenge के रूप में रेखांकित किया है।

इसलिए यदि आज चरक के जनपदोद्ध्वंस सिद्धान्त को पढ़ा जाए तो उसे केवल “महामारी” तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
इसे एक व्यापक framework के रूप में देखा जा सकता है:
Environmental disturbance
→ Climate disturbance
→ Water/air/ecosystem disturbance
→ Food and vector ecology changes
→ Human vulnerability
→ Population-level disease
यह आधुनिक Climate Health + Environmental Health + One Health + Public Health के intersection पर आ जाता है।

चरक से आधुनिक चिकित्सा क्या सीख सकती है?
जनपदोद्ध्वंसनीय विमान का सबसे बड़ा संदेश शायद यह है कि—
रोग केवल शरीर में उत्पन्न नहीं होता।
उसके पीछे हो सकते हैं—
Environment + Climate + Water + Air + Food + Animals + Human behaviour + Society + Governance
और इसलिए health protection भी केवल hospital में नहीं होती।
वह होती है—
घर में, समाज में, खेत में, जलाशय में, शहर की planning में, environmental policy में और health system की preparedness में।
निष्कर्ष
आज दुनिया अनेक प्रकार की health emergencies का सामना कर रही है। 2026 में WHO की health-emergency response में दर्जनों गंभीर emergencies शामिल हैं; Ebola, mpox और अन्य outbreaks के साथ-साथ climate-related health threats भी वैश्विक health agenda का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

चरकाचार्य का मूल प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
जब अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग प्रकृति, आहार, बल और आयु वाले हैं, तो एक ही समय में पूरा जनपद कैसे प्रभावित हो जाता है?
उनका उत्तर है—
क्योंकि कुछ determinants व्यक्ति के नहीं, पूरे समाज के होते हैं।
वायु, जल, देश और काल जब सामूहिक रूप से विकृत होते हैं, तो रोग का प्रभाव भी व्यक्तिगत सीमा से निकलकर population level तक पहुँच सकता है।
आधुनिक विज्ञान इसे environmental health, epidemiology, climate-health, One Health और public health preparedness की भाषा में समझता है।

और शायद इस अध्याय का सबसे आधुनिक संदेश यही है—
“महामारी का उपचार केवल रोगी का उपचार नहीं है; महामारी की जड़ में उपस्थित पर्यावरण, समाज और व्यवहार को समझना और सुधारना भी चिकित्सा का ही एक हिस्सा है।”

यहाँ पर चरक संहिता का मूल पाठ भी दे रहे है जो आप सभी जानकारी के लिए पढ़ सकते है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
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==== चरक संहिता का मूल पाठ =====

अब हम जनपदोद्ध्वंसनीय नामक विमान की व्याख्या करेंगे। ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा है।

आत्रेय का अग्निवेश को उपदेश- पन्जाब प्रदेश के जनपद मण्डल की काम्पिल्य नामक राजधानी में जहाँ उच्चकुल के द्विजातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का निवास था, वहाँ भगवान् पुनर्वसु आत्रेय अपने शिष्य-गण से घिरे हुए आषाढ़ के महीने में गङ्गा के तट पर स्थित वनों में घूमने की दृष्टि से विचरण करते हुए अपने शिष्य अग्निवेश से बोले ।

जनपदोद्ध्वंसप्रकरण
(Chapter of Epidemic Fall-down)
जनपदोद्ध्वंस का पूर्वरूप:- हे सौम्य (अग्निवेश)! अस्वाभाविक रूप में स्थित नक्षत्र (अश्विनी आदि २७), ग्रहगण, चन्द्र, सूर्य, वायु, अग्नि तथा दिशाओं विदिशाओं के ऋतुविकार (जिस ऋतु में जो होता है वह न होकर दूसरे लक्षणों का होना उस ऋतु का विकार है। जैसे गर्मी में शीत का होना, आदि।) को करने वाले भाव देखे जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में शीघ्र ही भूमि भी ठीक-ठीक रस, वीर्य, विपाक, प्रभावों की उत्पत्ति ओषधियों में भी नहीं कर पायेगी। ओषधियों के प्रभावहीन हो जाने से रोगों की वृद्धि होना सुनिश्चित है।

अतः हे सौम्य ! जनपद के विनाश होने और भूमि के नीरस होने से पहले जब तक ये चिकित्सोपयोगी ओषधियाँ रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव से रहित नहीं हो जातीं तब तक तुम लोग इनको उखाड़ लो। हम इनके रस, वीर्य, विपाक, प्रभावों का उन पर प्रयोग करेंगे जो हमसे चिकित्सा कराना चाहेंगे । हे सौन्य! भली भांति उखाड़ कर रखी हुई ओषधियों पर, उचित रूप से उनका निर्माण कर लेने पर और उनसे ठीक-ठीक चिकित्सा करने पर जनपद का विनाश करने वाले रोगों का कोई भय नहीं होता है।

अग्निवेश का प्रश्न-
इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय पुनर्वसु से अग्निवेश ने कहा- भगवन् ! ओषधियाँ उखाड़ ली गयी हैं, उनका ठीक प्रकार से निर्माण कर लिया गया है और उनका ठीक ढंग से प्रयोग भी करा दिया है। परन्तु यह समझ में नहीं आया कि एक ही जनपदोद्ध्वंस नामक रोग से एक साथ भिन्न-भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्व (मन) तथा आयु वाले मनुष्यों की मृत्यु कैसे हो जाती है?

भगवान् आत्रेय का उत्तर-
उससे भगवान् आत्रेय ने कहा- हे अग्निवेश! इस प्रकार असमान प्रकृति, आहार आदि भार्यों वाले भी मनुष्यों के जो और भाव समान हैं उनके एक ही समय में विकृत होने से. समान लक्षण वाले रोग उत्पन्न होकर जनपद का विनाश कर डालते हैं। वे ये भाव हैं, जो जनपदों में सामान्य रूप से होते हैं। यथा- वायु, जल, देश और काल ।

1. विकृत वात के लक्षण - वहाँ (उक्त प्रकरण में इस प्रकार की (विकृत) वायु को अस्वास्थ्यकर (रोगकारक) समझना चाहिये। जैसे ऋतु के स्वभाव से विषम अर्थात् अत्यन्त रुक-एक कर वहने वाली या अधिक वेग से बहने वाली, अत्यन्त कर्कश, अधिक शीत्तस्पर्श वाली, अधिक उष्णस्पर्श वाली, अत्यन्त रूक्ष, अधिक नमी से युक्त (प्रायः ऐसी हवा विना वर्षा के वस्त्र आदि पदार्थों को गीला कर देती है।) अति भयंकर शब्द वाली, भिन्न-भिन्न दिशाओं से आकर परस्पर टकराने वाली, अप्रिय गन्ध, भाप, बालू के कणों, धूलि तथा धुआँ से दूषित (मलिन) वायु को बिकृत समझें ।

2. विकृत जल के लक्षण - अत्यन्त विकृत गन्ध, वर्णं, रस तथा स्पर्श युक्त और जो क्लिनता युक्त हो, जिसे जलचर पक्षियों ने छोड़ दिया हो, जो जलाशय सूख गया हो अथवा जिस जलाशय में रहने वाले प्राणी (मछली आदि) मर या घट गये हों, जो जल पीने में स्वाद न लगता हो, उस जल को दूषित समझें ।

3. विकृत देश के लक्षण - जिस देश के प्राकृतिक वर्णं, गन्ध, रसं तथा स्पर्श विकार युक्त हो गये हों और अधिक मात्रा में जहाँ विलन्नता (सड़न) पैदा हो गयी हो, सांप, व्याल (बिगड़ैल हाथी, खल, श्वापद तथा हिंसक प्राणी), मच्छर, टिड्डी, मक्खी, चूदे, उल्लू, श्मशान (मुर्दा जलानेको भूमि) में रहने वाले पक्षी गीथ, सियार आदि से घिरा हुआ, जहाँ तृण, अर्थात् घास-फूस बहुत हो गया हो, ऐसे बगीचे वाला, विस्तृत (चारों ओर फैली हुई) लताओं से घिरा हुआ जैसा इसके पहले कभी नहीं देखा गया हो, जहाँ फसलें अपने आप सूख तथा नष्ट हो गयी द्दों, जहाँ हवा के साथ, धुआँ उड़ रहा हो, जहाँ चिड़ियाँ निरन्तर चहचहाती हों, कुत्ते निरन्तर भुंकते हों, भांति-भांति के मृग-पश्चिसमूह दुःखी होकर इधर-उधर भाग रहे हों, जिस जनपद के लोगों ने धर्म कार्य, सत्यभाषण, लज्जा, शील, सदाचार, और सद्‌गुणों को छोड़ दिया हो या ये आचार जिनके नष्ट हो गये हों। जहाँ के जलाशय क्षुब्ध (Agitated और बड़ी-बड़ी लहरों से युक्त हों, जहाँ निरन्तर उल्कापात, बिजली का गिरना, भूकम्प तथा रोने-चिल्लाने के-से भयंकर शब्द सुनायी पड़ रहे हों, जहाँ रूखे, ताम्रवर्ण, अरुणवर्ण (Brown), सफेद, वादलों से घिरे सूर्य, चन्द्रमा तथा तारे दिखायी दें, बार-बार घबड़ाये हुए तथा डर कर दौड़ते भागते हुए जैसे, भय से रोते हुए जैसे, अन्धकार से घिरे हुए की भांति दिखायी देने बाले, गुह्यकों (देवयोनि विशेष) से आक्रान्त जैसे, रोने, चिल्लाने के-से शब्द जहाँ सुनायी पढ़ें उस देश को विकृत समझें ।

4. विकृत काल के लक्षण - जिस ऋतु में जो लक्षण होने चाहिये उनसे विपरीत लक्षणों, अधिक लक्षणों तथा हीन (कम) लक्षणों से युक्त काल को अहितकर समझना चाहिये ।

तनपदोद्ध्वंस के लक्षण -
इन पूर्वोक्त दोषों से युक्त चार भावों (वायु, जल, देश, काल) को कुशल चिकित्सक जनपदों का विनाशकारक कहते हैं। इनके विपरीत लक्षणों वाले उक्त भाव प्राणिमात्र के हितकारक होते हैं।

चिकित्सा-सूत्र- जनपदों का विनाश करने वाले इन (उपर्युक्त) भावों के विकृत हो जाने पर उचित औषधों के उपचार से रोगों से मुक्ति मिलती है।

देश आदि की उत्तरोत्तर प्रधानता विकार को प्राप्त देश, काल, वायु तथा जल में उत्तरोत्तर सहेतुक श्रेष्ठता का निर्देश आगे किया जायगा। अर्थवित् (तत्वार्थ को जानने वाला) चिकित्सक जिनका कोई प्रतीकार नहीं किया जा सकता ऐसे उक्त भावों को वायु से जल, जल से देश और देश से भी काल को स्वभाव से ही अधिक बलवान् समझें ।

वक्तव्य- वायु के प्रकोप से बचने के लिये शुद्ध वायु वाले स्थान में जाकर निवास किया जा सकता है, उससे जल की समस्या कठिन है। यदि जल का प्रयोजन अन्य किसी तरल पदार्थ से पूरा कर भी लिया जाय तो देश का प्रकोप उससे भी कठिन है। यदि मनुष्य दूषित देश का त्याग भी कर दें तो काल (समय) का कैसे कर पायेगा।

संक्षिप्त चिकित्सा-
जनपदोद्ध्वंस की स्थिति में रसायनों का विधिवत् उपयोग करना कराना उचित होता है, जनपदोद्ध्वंस होने के पहले संगृहीत या उखाड़ी गयी ओषधियां शरीररक्षा के लिये उत्तम होती है, सत्य-भाषण, प्राणियों में दया, दान, बलिकर्म, देवता पूजन, सदवृत का आचरण, शान्ति, अपनी सब प्रकार से सुरक्षा कल्याणकारक जनपदों में जाकर निवास करना अर्थात् जहाँ वायु आदि विकृत न हुए हों वहाँ जाकर रहना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और बहाचारियों, महर्षियों, जितेन्द्रियों की सेवा करना, धर्मशास्त्र की कथा सुनना, सुनाना, वृद्ध पुरुषों द्वारा प्रशंसित धार्मिक तथा सत्व प्रकृति वाले पुरुषों के साथ सहवास करना, उस भयंकर समय में जिसकी मृत्यु होना निश्चित नहीं है, उसके लिये उक्त आयु-रक्षाकारक औषधों को कहा गया है।

अग्निवेश का प्रश्न-
जनपद के उद्ध्वंस (विनाश) में इस प्रकार के कारणों को सुनकर फिर भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा- भगवन् ! इन वायु आदि के विकृत होने का मूल कारण क्या है? जिसके कारण इनमें विपरीत गुण उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे वे विकृति को प्राप्त होकर जनपदों का नाश कर डालते हैं।

भगवान् आत्रेय का उत्तर-
भगवान् आत्रेय ने उससे कहा- हे अग्निवेश! वायु आदि सभी में जो विकृति आती है, उसका मूल कारण है अधर्म, अथवा उस अधर्म का मूल होता है पूर्वजन्म कृत असत (शास्त्र-विरुद्ध) कर्म, अधर्म और असत् (बुरे) कर्मों का मूल (उत्पत्ति कारण) प्रज्ञापराध होता है। जैसे- देश, नगर, निगम तथा जनपद के प्रधान पुरुष (गुरु, ब्राह्मण, पुरोहित, शासक, मुखिया अथवा उच्च अधिकारी) जब धर्ममार्ग का परित्याग करके अधर्म से प्रजा के साथ व्यवहार करते हैं, तब उन-उन के आश्रय में रहने वाले तथा उनके आश्रितों के आश्रय में रहने वाले नगरवासी तथा जनपद के निवासी एवं व्यापार द्वारा अपनी आजीविका चलाने वाले उस अधर्म को चारों ओर बढ़ा देते हैं। तब वह अधर्म हठात् (जबरदस्ती) धर्म को ढक (छिपा) देता है। तदनन्तर उन अधर्मियों को देवता भी छोड़ देते हैं। उन अधर्मियों, अधर्म-प्रधानों और देवताओं द्वारा परित्यक्त मानवों की निवास भूमियों की सीमा में ऋतुएँ विकृत हो जाती हैं अर्थात् उनका नैसर्गिक प्रभाव समाप्त हो जाता है। उसके कारण समय पर इन्द्र पानी नहीं बरसाते, अथवा विकार युक्त (कम-ज्यादा) बरसाते है, ठीक ढंग से हवा नहीं बहती, पृथिवी विकृत हो जाती है, जलाशयों में पानी सूख जाते हैं, ओषधियों अपने स्वभाव (स्वाभाविक गुण, वीर्य, विकार आदि) को छोड़कर विकार युक्त हो जाती हैं, तदनन्तर स्पृश्य (छूने योग्य) तथा अभ्यवहार्य (खाने योग्य) वस्तुओं के दोष से जनपदों का विनाश हो जाता है।

अधर्ममूलक जनपदोद्ध्वंस-
शस्त्र द्वारा जनपदोद्ध्वंस का भी कारण अधर्म ही होता है। जिनका लोम, क्रोथ, मोह और अभिमान अधिक बढ़ जाता है, वे दुर्बलों का अपमान कर अपने भाई-बन्धुओं तथा दूसरों के विनाश के लिये शस्त्र द्वारा परस्पर आक्रमण करते हैं अथवा दूसरों द्वारा स्वयं आक्रान्त होते हैं।

Ministry of Ayush, Government of India Sanjay Mishra Shashank Mishra Aaj Tak Dainik Bhaskar Sushil Singh Modassir Khan Mod Rais

29/08/2026

Ulcerative Colitis एक ऐसी बीमारी है जिसमें बड़ी आंत (Colon) और मलाशय (Re**um) की अंदरूनी परत में लगातार सूजन (Inflammation) और घाव (Ulcers) बनने लगते हैं। यह एक प्रकार की Inflammatory Bowel Disease (IBD) है। इसमें रोग लंबे समय तक चलता है और कभी लक्षण बढ़ जाते हैं तो कभी कम हो जाते हैं।

👉 यह बीमारी कैसे समझें?
सामान्य भाषा में कहें तो बड़ी आंत की भीतरी सतह “छिल” जाती है और उसमें सूजन आ जाती है। इसके कारण बार-बार दस्त, पेट दर्द और मल में खून आने जैसी समस्याएँ होती हैं।

👉 मुख्य लक्षण
• बार-बार पतले दस्त आना
• मल में खून या म्यूकस (चिकनाहट) आना
• पेट में मरोड़ या दर्द
• बार-बार शौच की इच्छा होना
• कमजोरी और थकान
• वजन कम होना
• भूख कम लगना
• कभी-कभी बुखार
गंभीर मामलों में शरीर में खून की कमी, डिहाइड्रेशन और कमजोरी बहुत बढ़ सकती है।

👉 इसके कारण क्या माने जाते हैं?
सटीक कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन कई बातें जुड़ी मानी जाती हैं:
• शरीर की Immunity का आंत पर गलत हमला
• Genetic tendency (परिवार में इतिहास)
• तनाव और खराब जीवनशैली
• अत्यधिक Processed food
• धूम्रपान छोड़ने के बाद कुछ लोगों में जोखिम बढ़ना
• आंत के Microbiome में गड़बड़ी

👉 कौन-कौन सी जांच होती हैं?
• Colonoscopy
• Biopsy
• Stool examination
• CBC और Inflammatory markers
• CRP, ESR
• कभी-कभी CT scan या MRI

👉 क्या यह पूरी तरह ठीक हो सकती है?
यह बीमारी अक्सर Chronic होती है, यानी लंबे समय तक चल सकती है। लेकिन सही इलाज, खान-पान और जीवनशैली से इसे काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है और मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।

👉 एलोपैथी में उपचार
• Anti-inflammatory medicines
• Steroids
• Immunosuppressive drugs
• Biologics
• गंभीर मामलों में Surgery

👉 आयुर्वेद की दृष्टि से
आयुर्वेद में इसे सीधे इसी नाम से नहीं बताया गया, लेकिन इसके लक्षण Grahani Roga, Raktatisara और पित्तप्रधान आंत्र विकारों से मिलते हैं।
आयुर्वेद में अग्नि सुधार, आहार नियंत्रण, तनाव कम करना और आंत को शांत करने वाली औषधियों पर ध्यान दिया जाता है। जैसे:
• बेल
• मुस्ता
• नागकेसर
• यष्टिमधु
• शतावरी
• तक्र (Buttermilk therapy)
लेकिन बिना विशेषज्ञ सलाह के दवाएँ नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि हर मरीज की अवस्था अलग होती है।

👉 किन बातों का ध्यान रखें?
• बहुत मसालेदार और जंक फूड कम करें
• पर्याप्त पानी पिएँ
• तनाव कम करें
• धूम्रपान और शराब से बचें
• डॉक्टर की दवा अचानक बंद न करें
• बार-बार खून आने पर तुरंत जांच कराएँ
यदि लंबे समय से खून वाले दस्त, पेट दर्द या वजन कम हो रहा हो तो Gastroenterologist से जांच जरूर करानी चाहिए।

👉 Crohn’s Disease और इसमे क्या अंतर है ?
ये दोनों ही आंतों में होने वाली सूजन संबंधी बीमारियाँ हैं, जिन्हें IBD (Inflammatory Bowel Disease) कहा जाता है, लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर होता है। Ulcerative Colitis मुख्यतः बड़ी आंत (Colon) और Re**um तक सीमित रहती है तथा इसमें आंत की केवल अंदरूनी परत में सूजन और घाव बनते हैं। इसलिए मरीजों में बार-बार खून वाले दस्त, म्यूकस और शौच की तीव्र इच्छा अधिक देखने को मिलती है।

इसके विपरीत Crohn’s Disease पाचन तंत्र के किसी भी भाग—मुंह से लेकर गुदा तक—को प्रभावित कर सकती है और इसमें सूजन आंत की पूरी मोटाई तक पहुंच जाती है। इसी कारण Crohn’s में आंत सिकुड़ना, Fistula, Abscess और आंत में रुकावट जैसी जटिलताएँ अधिक हो सकती हैं।

Crohn’s Disease में पेट दर्द, वजन कम होना, कमजोरी, पोषण की कमी और लंबे समय तक दस्त अधिक सामान्य होते हैं, जबकि Ulcerative Colitis में रक्तयुक्त दस्त प्रमुख लक्षण माना जाता है।

Colonoscopy में भी दोनों का पैटर्न अलग दिखता है; Ulcerative Colitis में सूजन लगातार होती है, जबकि Crohn’s में बीच-बीच में स्वस्थ भाग छोड़कर सूजन दिखाई देती है, जिसे “Skip lesions” कहा जाता है। Smoking भी दोनों रोगों में अलग प्रभाव डालती है—Crohn’s Disease में धूम्रपान बीमारी को अधिक गंभीर बना सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से दोनों रोगों के लक्षण , और से मिलते-जुलते माने जा सकते हैं, जहाँ अग्नि विकृति, पाचन तंत्र की सूजन और अनुचित आहार-विहार को महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। सही उपचार, नियंत्रित भोजन, तनाव कम करना और नियमित चिकित्सकीय निगरानी दोनों ही रोगों में अत्यंत आवश्यक है।

👉 आयुर्वेदिक उपचार:-
Ulcerative Colitis और Crohn's Disease जैसी आंत्र सूजन संबंधी बीमारियों में आयुर्वेद का उद्देश्य केवल दस्त रोकना नहीं होता, बल्कि पाचन अग्नि को संतुलित करना, आंतों की सूजन कम करना, शरीर की दुर्बलता घटाना और पुनः पाचन शक्ति को सुधारना होता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह स्थिति प्रायः Grahani Roga, Atisara तथा Raktatisara से संबंधित मानी जा सकती है।
उपचार में सबसे पहले आहार-विहार सुधार पर जोर दिया जाता है। बहुत तीखा, मसालेदार, तला हुआ, पैकेट फूड, अत्यधिक चाय-कॉफी और शराब से बचने की सलाह दी जाती है। हल्का, सुपाच्य और ताजा भोजन जैसे मूंग की खिचड़ी, पुराना चावल, बेल का सेवन, दही से बना पतला तक्र (Buttermilk), अनार, इसबगोल और पर्याप्त जल लाभकारी माने जाते हैं। कई मरीजों में तनाव बढ़ने से लक्षण बढ़ते हैं, इसलिए योग, ध्यान और पर्याप्त नींद भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
औषधियों में बेल, मुस्ता, नागकेसर, कुटज, यष्टिमधु, शतावरी, लोध्र, मोचरस तथा प्रवाल पिष्टी जैसी दवाएँ विभिन्न अवस्थाओं में उपयोग की जाती हैं। विशेषकर Kutajghan Vati को अतिसार और आंतों की सूजन में उपयोग किया जाता है। रक्तयुक्त दस्त में नागकेसर और लोध्र जैसी औषधियाँ सहायक मानी जाती हैं, जबकि यष्टिमधु और शतावरी आंतों की जलन कम करने और healing में मदद कर सकती हैं।
हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गंभीर Ulcerative Colitis या Crohn’s Disease में स्वयं दवा लेना खतरनाक हो सकता है। अत्यधिक रक्तस्राव, तेज बुखार, वजन तेजी से घटना, डिहाइड्रेशन या आंत में जटिलताओं की स्थिति में तुरंत Gastroenterologist और अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक दोनों की निगरानी आवश्यक होती है। कई मामलों में आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का संतुलित समन्वय बेहतर परिणाम दे सकता है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 082993 02319
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

27/08/2026

बारिश का मौसम आते ही अस्पतालों और क्लीनिकों की OPD में बुखार, सर्दी-जुकाम, खांसी, सिरदर्द, बदन दर्द और कमजोरी की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। इन दिनों उत्तर प्रदेश में भी seasonal और viral fever के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों को सतर्क रहने तथा बुखार वाले मरीजों की आवश्यक जांच समय पर कराने के निर्देश दिए हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—हर बुखार वायरल फीवर नहीं होता।

बारिश के मौसम में कई प्रकार के संक्रमण एक साथ बढ़ सकते हैं। इनमें सामान्य viral infections के अलावा Influenza/H1N1, Dengue, Malaria, Chikungunya, Typhoid, Leptospirosis और Scrub Typhus जैसी बीमारियां भी शामिल हैं।

आखिर बारिश में बुखार इतना क्यों बढ़ जाता है?

बारिश के बाद वातावरण में नमी बढ़ जाती है, तापमान में उतार-चढ़ाव होता है और कई जगहों पर पानी जमा हो जाता है। यही परिस्थितियां विभिन्न संक्रमणों के फैलने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती हैं।

✨ 1. मौसम में बदलाव और respiratory viruses
बारिश के बाद humidity बढ़ने तथा लोगों के बंद या भीड़भाड़ वाले स्थानों में अधिक समय बिताने से respiratory infections के transmission की संभावना बढ़ सकती है।

इस समय दिल्ली-NCR में Influenza का विशेष रूप से उल्लेखनीय surge देखा जा रहा है। 20 अगस्त तक दिल्ली में 2,392 Influenza-A cases, जिनमें 1,777 H1N1 cases रिपोर्ट किए गए थे। बाद की रिपोर्टों में H1N1 के मामलों में और वृद्धि दर्ज हुई है।

H1N1 को आम बोलचाल में Swine Flu कहा जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर बुखार या हर खांसी H1N1 है।

✨2. जमा पानी और मच्छरों की बढ़ती संख्या
बारिश के बाद गमलों, कूलर, टायर, छतों, खाली प्लॉट और नालियों में पानी जमा होने लगता है।

यही पानी Aedes mosquito के breeding के लिए उपयुक्त स्थान बन सकता है। परिणामस्वरूप Dengue और Chikungunya का खतरा बढ़ जाता है।

लखनऊ में हाल की रिपोर्टों में monsoon के साथ dengue और अन्य mosquito-borne तथा water-borne infections में वृद्धि की जानकारी सामने आई है।

✨ 3. दूषित पानी और भोजन
बारिश और जलभराव के दौरान drinking water contamination का खतरा बढ़ सकता है। दूषित पानी या भोजन से Typhoid तथा अन्य gastrointestinal infections हो सकते हैं।

इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में Leptospirosis और Scrub Typhus जैसी infections भी सामने आ सकती हैं। लखनऊ के अस्पतालों में monsoon-related illnesses के साथ dengue, leptospirosis और scrub typhus की भी रिपोर्टिंग हुई है।

“वायरल फीवर” में कौन-कौन से लक्षण होते हैं?

सामान्य viral infection में निम्न लक्षण हो सकते हैं:

- बुखार
- ठंड लगना
- सिरदर्द
- बदन और मांसपेशियों में दर्द
- कमजोरी और थकान
- गले में खराश
- नाक बहना या बंद होना
- खांसी
- कभी-कभी दस्त या उल्टी

लेकिन इन लक्षणों के आधार पर अकेले यह तय नहीं किया जा सकता कि बीमारी केवल सामान्य viral fever है।

कब Dengue का शक करना चाहिए?

यदि बुखार के साथ:

- तेज बदन दर्द
- सिरदर्द या आंखों के पीछे दर्द
- nausea/vomiting
- rash
- अत्यधिक कमजोरी
- पेट दर्द
- bleeding या bleeding tendency

जैसे लक्षण हों, तो dengue सहित अन्य causes की clinical evaluation आवश्यक हो सकती है।

Platelet count अकेले dengue का diagnosis नहीं करता। उचित समय पर NS1 antigen या IgM जैसे tests, clinical findings और CBC आदि को मिलाकर diagnosis किया जाता है।

👉 कब Malaria की जांच जरूरी हो सकती है?
बार-बार ठंड लगकर बुखार आना, sweating, headache और कमजोरी malaria में देखी जा सकती है, लेकिन malaria का presentation हमेशा textbook जैसा नहीं होता।

इसलिए endemic या risk area में fever होने पर clinician को malaria की संभावना भी ध्यान में रखनी चाहिए।

कब Influenza/H1N1 की संभावना बढ़ती है?

यदि बुखार के साथ:

- अचानक तेज कमजोरी
- dry cough
- sore throat
- headache
- body ache
- chills

जैसे respiratory symptoms हों, तो influenza differential diagnosis में आ सकता है।

विशेषकर बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं तथा chronic diseases वाले मरीजों में respiratory infection को हल्के में नहीं लेना चाहिए। दिल्ली में हालिया H1N1 surge के कारण स्वास्थ्य अधिकारियों ने भी preventive measures और timely medical consultation पर जोर दिया है।

👉 सबसे बड़ी गलती—हर बुखार में खुद से Antibiotic लेना

बुखार आया और बिना जांच के antibiotic शुरू कर दी—यह बहुत आम गलती है।

अधिकांश uncomplicated viral infections में antibiotic की आवश्यकता नहीं होती। Antibiotic केवल bacterial infection की उचित clinical संभावना या पुष्टि होने पर चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दी जानी चाहिए।

इसी तरह steroid या कई प्रकार की combination medicines भी बिना चिकित्सकीय सलाह के लेना उचित नहीं है।

👉 बुखार में कौन-कौन सी जांच आवश्यक हो सकती है?

हर मरीज को हर जांच की जरूरत नहीं होती। जांच मरीज के लक्षण, बीमारी की अवधि और स्थानीय epidemiology के अनुसार तय होती है।

स्थिति के अनुसार डॉक्टर निम्न में से कुछ जांच लिख सकते हैं:

Basic investigations

- CBC
- Urine routine
- LFT
- KFT

Specific infections के लिए

- Dengue NS1/IgM
- Malaria antigen/smear
- Influenza testing
- Typhoid evaluation
- Leptospira testing
- Scrub typhus testing

महत्वपूर्ण: केवल “fever panel” करा लेना diagnosis का विकल्प नहीं है। Test का चयन clinical assessment के आधार पर होना चाहिए।

👉 कब तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए?

बुखार के साथ निम्न में से कोई लक्षण हो तो delay नहीं करना चाहिए:

- सांस लेने में कठिनाई
- oxygen saturation कम होना
- लगातार उल्टी
- तेज पेट दर्द
- bleeding
- बहुत ज्यादा कमजोरी या बेहोशी
- confusion या altered sensorium
- urine बहुत कम होना
- तेज dehydration
- लगातार बढ़ता हुआ बुखार
- बुजुर्ग, गर्भवती महिला, छोटे बच्चे या गंभीर chronic disease वाले मरीज में fever

👉 घर पर क्या सावधानी रखें?
बारिश के मौसम में infection prevention सबसे प्रभावी उपायों में से एक है।

मच्छरों से बचें

- घर के आसपास पानी जमा न होने दें।
- कूलर और पानी के containers नियमित रूप से साफ करें।
- mosquito repellent और आवश्यकता अनुसार mosquito net का प्रयोग करें।

Respiratory infection से बचें

- भीड़भाड़ में mask का उपयोग करें, विशेषकर जब आसपास flu-like illness हो।
- हाथों की नियमित सफाई करें।
- खांसते या छींकते समय mouth और nose ढकें।
- बीमार होने पर दूसरों के बहुत करीब जाने से बचें।

Food और water safety

- साफ और सुरक्षित पानी पिएं।
- खुले में रखा भोजन न खाएं।
- फल-सब्जियों को अच्छी तरह धोकर इस्तेमाल करें।

बारिश के मौसम में बुखार को सिर्फ “मौसमी वायरल” मानकर नजरअंदाज न करें।
एक ही समय में अलग-अलग infections circulation में हो सकते हैं। इसलिए लक्षण + clinical examination + उचित समय पर targeted investigation के आधार पर diagnosis करना सबसे सुरक्षित तरीका है।
बुखार आने पर खुद से antibiotic, steroid या कई दवाओं का combination शुरू करने के बजाय चिकित्सक से परामर्श लें।
सावधानी रखें, पानी और भोजन की स्वच्छता बनाए रखें, मच्छरों से बचें और बुखार को हल्के में न लें।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
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