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कटु सत्य
#प्रेमानंदमहाराज
#प्रेमानंदमहाराजजी
गंदा है पर धंधा है ये।
18/11/2022
"रेजांगला दिवस की स्मृति में"
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यादवों की प्रकृति प्रारम्भ से ही पराक्रमी एवं स्वतंत्रता प्रिय रही है। यूरोपीय इतिहास में जो स्थान ग्रीक व रोमन लोगों का रहा है, वही भारतीय इतिहास में यादवों का है। आजादी के आन्दोलन से लेकर आजादी पश्चात तक के सैन्य व असैन्य युद्धों में यादवों ने अपने शौर्य की गाथा रची और उनमें से अनेकों मातृभूमि की बलिवेदी पर शहीद हो गये। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरूद्ध सर्वप्रथम 1739 में कट्टलापुरम् (तमिलनाडु) के यादव राजा अजगमुत्थु कोणें ने विद्रोह का झण्डा उठाया और प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के गौरव के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में यादवों ने प्रमुख भूमिका निभाई। बिहार में कुँवर सिंह की सेना का नेतृत्व रणजीत सिंह यादव ने किया। रेवाड़ी (हरियाणा) के राव रामलाल ने 10 मई 1857 को दिल्ली पर धावा बोलने वाले क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया एवं लाल किले के किलेदार मिस्टर डगलस को गोली मारकर क्रान्तिकारियों व बहादुर शाह जफर के मध्य सम्पर्क सूत्र की भूमिका निभाई। 1857 की क्रांति की चिंगारी प्रस्फुटित होने के साथ ही रेवाड़ी के राजा राव तुलाराम भी बिना कोई समय गंवाए तुरन्त हरकत में आ गये। उन्होंने रेवाड़ी में अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान कर्मचारियों को बेदखल कर स्थानीय प्रशासन अपने नियन्त्रण में ले लिया तथा दिल्ली के शहंशाह बहादुर शाह ज़फर के आदेश से अपने शासन की उद्घोषणा कर दी। 18 नवम्बर 1857 को राव तुलाराम ने नारनौर (हरियाणा) में जनरल गेरार्ड और उसकी सेना को जमकर टक्कर दी। इसी युद्ध के दौरान राव कृष्ण गोपाल ने गेरार्ड के हाथी पर अपने घोड़े से आक्रमण कर गेरार्ड का सिर तलवार से काटकर अलग कर दिया। अंग्रेजों ने जब स्वतंत्रता आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया तो राव तुलाराम ने रूस आदि देशों की मदद लेकर आन्दोलन को गति प्रदान की। अंततः 2 सितम्बर 1863 को इस अप्रतिम वीर का काबुल में देहाँत हो गया। वीर-शिरोमणि यदुवंशी राव तुलाराम के काबुल में निधन होने के बाद वहीं उनकी समाधि बनी। जिस पर आज भी काबुल जाने वाले भारतीय यात्री बडी श्रद्वा से सिर झुकाते हैं और उनके प्रति आदर व्यक्त करते हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राव तुलाराम के अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 23 सितम्बर 2001 को उन पर एक डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है।
चौरी-चौरा काण्ड से भला कौन अनजान होगा। इस काण्ड के बाद ही महात्मा गाँंधी ने असहयोग आन्दोलन वापस लेने की घोषणा की थी। कम ही लोग जानते होंगे कि अंग्रेजी जुल्म से आजिज आकर गोरखपुर में चौरी-चौरा थाने में आग लगाने वालों का नेतृत्व भगवान अहीर ने किया था। इसी प्रकार भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान गाजीपुर के थाना सादात के पास स्थित मालगोदाम से अनाज छीनकर गरीबों में बांँटने वाले दल का नेतृत्व करने वाले अलगू यादव अंग्रेज दरोगा की गोलियों के शिकार हुये और बाद में उस दरोगा को घोड़े से गिराकर बद्री यादव, बदन सिंह इत्यादि यादवों ने मार गिराया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जब ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा‘ का नारा दिया तो तमाम पराक्रमी यादव उनकी आई0एन0एस0 सेना में शामिल होने के लिए तत्पर हो उठे। रेवाड़ी के राव तेज सिंह तो नेताजी के दाहिने हाथ रहे जिन्होंने 28 अंग्रेजों को कुल्हाड़ी से काटकर यादवी पराक्रम का परिचय दिया था। आई0एन0ए0 के सर्वोच्च सैनिक सम्मान ‘शहीद-ए-भारत‘ से नायक मौलड़ सिंह यादव को, ‘शेर-ए-हिन्द‘ सम्मान हरीसिंह यादव को तथा ‘सरदार-ए-जंग‘ सम्मान से कर्नल राम स्वरूप यादव को सम्मानित किया गया था। नेता जी के व्यक्तिगत सहयोगी रहे कैप्टन उदय सिंह यादव, आजादी के पश्चात दिल्ली में असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर बने एवं कई बार गणतंत्र परेड में पुलिस बल का नेतृत्व किया।
आजादी के बाद का इतिहास भी यादव सैन्य अधिकारियों तथा सैनिकों की वीरता एवं शहादत से भरा पड़ा है। फिर चाहे वह सन् 1947-48 का कबाइली युद्ध, 1955 का गोवा मुक्ति युद्ध, 1962 का भारत-चीन युद्ध हो अथवा 1965 व 1971 का भारत-पाक युद्ध सभी मे यादवों ने बेमिसाल बहादुरी का परिचय दिया है। भारत-चीन युद्ध के दौरान 18,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित चिशूल चौकी की रक्षा में तैनात कुमायूं रेजीमेन्ट की 120 यादवों की टुकड़ी ने मेजर शैतान सिंह यादव के नेतृत्व में चीनियों के छक्के छुडा़ डाले थे। गौरतलब है कि चिशूल के उस युद्व में 114 यादव जवान शहीद हुए थे। चिशूल की हवाई पट्टी के पास एक द्वार पर लिखा शब्द ‘वीर अहीर‘ यादवों के गौरव में वृद्धि करता है। 1971 के युद्ध में प्रथम शहीद बी0एस0एफ0 कमाण्डर सुखबीर सिंह यादव की वीरता को कौन भुला पायेगा। मातादीन यादव (जार्ज क्रास मेडल), नामदेव यादव (विक्टोरिया क्रास विजेता), राव उमराव सिंह(द्वितीय विश्व युद्ध में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु विक्टोरिया क्रास), हवलदार सिंह यादव (विक्टोरिया क्रास विजेता), प्राणसुख यादव (आंग्ल सिख युद्ध में सैन्य कमाण्डर), मेजर शैतान सिंह भाटी यादव (मरणोपरान्त परमवीर चक्र), कैप्टन राजकुमार यादव (वीर चक्र, 1962 का युद्ध), बभ्रुबाहन यादव (महावीर चक्र, 1971 का युद्ध), ब्रिगेडियर राय सिंह यादव (महावीर चक्र), चमन सिंह यादव (महावीर चक्र विजेता), ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव (1999 में कारगिल युद्ध में उत्कृष्टम प्रदर्शन के चलते सबसे कम उम्र में 19 वर्ष की आयु में सर्वोच्च सैन्य पदक परमवीर चक्र विजेता) जैसे न जाने कितने यादव जांबाजों की सूची शौर्य-पराक्रम से भरी पड़ी है। कारगिल युद्ध के दौरान अकेले 91 यादव जवान शहादत को प्राप्त हुए। गाजियाबाद के कोतवाल रहे ध्रुवलाल यादव ने कुख्यात आतंकी मसूद अजहर को नवम्बर 1994 में सहारनपुर से गिरफ्तार कर कई अमेरिकी व ब्रिटिश बंधकों को मुक्त कराया था। उन्हें तीन बार राष्ट्रपति पुरस्कार (एक बार मरणोपरान्त) मिला। ब्रिगेडियर वीरेन्द्र सिंह यादव ने नामीबिया में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूर्व सांसद चैधरी हरमोहन सिंह यादव को 1984 के दंगों में सिखों की हिफाजत हेतु असैनिक क्षेत्र के सम्मान ‘शौर्य चक्र‘ (1991) से सम्मानित किया जा चुका है। संसद हमले में मरणोपरान्त अशोक चक्र से नवाजे गये जगदीश प्रसाद यादव, विजय बहादुर सिंह यादव, अक्षरधाम मंदिर पर हमले के दौरान कमाण्डो सुरेश यादव, मुंबई हमले के दौरान आर0पी0एफ0 के जिल्लू यादव तथा होटल ताज आपरेशन के जाँबाज गौरी शंकर यादव की वीरता तो यदुवंशियों का सीना गर्व से चौडा कर देती है। वाकई यादव इतिहास तमाम जांबाजों की बेजोड़ वीरता से भरा पड़ा है।
आइए! रेजांगला दिवस के पावन ऐतिहासिक अवसर पर अपने बलिदानी वीरों को नमन करते हुए संघर्ष और शहादत की इस परम्परा को बनाए रखने का संकल्प लेते हैं।
जय यादव --- जय माधव
भीष्मपालसिंह यादव
संस्थापक- "सजग समाज"
01/11/2022
एक युग का अन्त 🙏🙏
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