Subhash Bhadu Rawla
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जय भारत प्रिय साथियों
"मन मेला तन उजला, बगुला कपटी अंग । तासे तो कागा भला, तन मन एक ही रंग ॥"
भावार्थ: जिस मनुष्य का मन कपट और मैल से भरा हो, लेकिन बाहर से वह बहुत साफ़-सुथरा (तन उजला) रहता है, उसका स्वभाव बगुले जैसा होता है जो कपटी (धोखेबाज) होता है। इससे तो कौआ ही कहीं ज़्यादा भला है, क्योंकि कम से कम उसका तन और मन एक ही रंग (काला) के तो होते हैं।गहरा संदेशबाहरी दिखावा (बगुला): बगुला पानी में बहुत शांत और सफेद दिखाई देता है, जिसे देखकर लगता है कि वह बहुत साधु-स्वभाव का है। परंतु उसका असली उद्देश्य केवल मछलियों को फंसाना और उन्हें मारना होता है। यह पाखंड का प्रतीक है।सच्चाई (कौआ): कौआ रंग से काला और देखने में भले ही कठोर लगता है, लेकिन उसके मन और शरीर में कोई भेद नहीं होता। वह जो बाहर से है, वही अंदर से है।
कबीर दर्शन: इंसान को कपटी या धोखेबाज नहीं होना चाहिए. यदि व्यक्ति का अंतर्मन (दिल) साफ़ नहीं है, तो शरीर को साफ रखने या माला फेरने का कोई लाभ नहीं है। हमारी कथनी और करनी एक समान होनी चाहिए।
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Dainik Bhaskar
"मेरे जीवन के सभी छोटे-बड़े भाइयों को ब्रदर्स डे की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आप सब मेरे लिए शक्ति, सहारा और प्रेरणा हो।
आपकी मुस्कान मेरी खुशी है, आपका साथ मेरी ताक़त है।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आप सबका जीवन सदा खुशियों से भरा रहे,
और भाईचारे का यह बंधन यूँ ही अटूट बना रहे।
आप सबको ढेर सारा प्यार।
हैप्पी ब्रदर्स डे!"
जय भारत प्रिय साथियों
“खामोश जहर: चिट्टा”
हनुमानगढ़ और गंगानगर के गांवों में आज एक खामोश तबाही फैल रही है। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं है, न ही कोई बाहरी हमला—यह धीरे-धीरे पनपा हुआ जहर है, जिसने 18 से 25 साल के युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
हर कुछ महीनों में किसी न किसी घर से एक चीख उठती है—
“हमारा बच्चा चला गया…”
और फिर गांव कुछ दिनों तक शोक में डूबता है… उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है… अगली खबर आने तक।
लेकिन अब सवाल बदलना होगा—
क्या यह सिर्फ उन बच्चों की गलती है?
या फिर हम सब इसमें बराबर के जिम्मेदार हैं?
सच्चाई कड़वी है—
नशा कभी अचानक नहीं आता…
वह धीरे-धीरे घर में, आदतों में, और सोच में जगह बनाता है।
शुरुआत होती है—
जिज्ञासा से…
दोस्तों के दबाव से…
या फिर अंदर के दर्द और तनाव से।
लेकिन असली जड़ क्या है?
“खालीपन…”
वह खालीपन…
जिसे परिवार भर सकता था—
लेकिन नहीं भर पाया।
माता-पिता अक्सर कहते हैं—
“हमें पता ही नहीं चला…”
पर क्या सच में ऐसा होता है?
क्या देर रात तक बाहर रहना नजर नहीं आया?
क्या अचानक गुस्सा, चिड़चिड़ापन, आंखों में सुस्ती, पैसों की बढ़ती मांग—ये सब संकेत नहीं थे?
संकेत हमेशा होते हैं…
हम ही उन्हें अनदेखा कर देते हैं।
क्यों?
क्योंकि हम सोच लेते हैं—
“हमारा बच्चा ऐसा नहीं कर सकता…”
या फिर हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि
हम अपने ही बच्चों से दूर हो जाते हैं।
आज का माता-पिता अपने बच्चों को सब कुछ देना चाहता है—
अच्छे कपड़े…
महंगा मोबाइल…
बाइक…
लेकिन वह सबसे जरूरी चीज देना भूल जाता है—
अपना समय… और अपना विश्वास।
जब घर में बातचीत खत्म हो जाती है,
तो बच्चा बाहर जवाब ढूंढता है।
और बाहर उसे क्या मिलता है?
गलत दोस्त…
गलत रास्ता…
और अंत में—
नशा… जो धीरे-धीरे उसे खत्म कर देता है।
समाज भी कहीं पीछे नहीं है।
गांव में सब जानते हैं कि कौन बच्चा किस रास्ते पर जा रहा है—
लेकिन कोई बोलता नहीं।
क्यों?
“हमें क्या लेना-देना…”
यही सोच आज सबसे बड़ा जहर बन चुकी है।
याद रखिए—
जब एक बच्चा बर्बाद होता है,
तो सिर्फ एक घर नहीं टूटता…
पूरा समाज हार जाता है।
अब समय है खुद से सवाल पूछने का—
क्या हम अपने बच्चों को सच में जानते हैं?
क्या हम उनसे खुलकर बात करते हैं?
क्या हम उनके दोस्त हैं… या सिर्फ आदेश देने वाले?
समाधान दूर नहीं है—
बस शुरुआत करनी होगी।
माता-पिता को अपने बच्चों के साथ बैठना होगा…
उनकी बात सुननी होगी…
बिना डांटे, बिना जज किए उन्हें समझना होगा।
उन्हें यह भरोसा देना होगा कि—
“गलती होने पर भी घर तुम्हारे साथ है… तुम्हारे खिलाफ नहीं।”
समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
अगर कोई बच्चा गलत रास्ते पर जा रहा है,
तो उसे रोकना “दखल” नहीं…
“मानवता” है।
जरूरत है—
गांव स्तर पर नशा मुक्ति बैठकें
स्कूलों में जागरूकता अभियान
युवाओं के लिए खेल और रोजगार के अवसर
और सबसे जरूरी—एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी
यह लड़ाई सिर्फ नशे के खिलाफ नहीं है…
यह लड़ाई उस चुप्पी के खिलाफ है,
जो हमें अंदर से खोखला कर रही है।
अगर आज भी हम नहीं जागे—
तो आने वाला समय बहुत डरावना होगा।
गांवों में सिर्फ बुजुर्ग रह जाएंगे…
और दीवारों पर टंगी तस्वीरें—
उन युवाओं की, जो कभी सपने देखते थे।
यह सिर्फ एक लेख नहीं…
एक चेतावनी है।
अब भी समय है—
अपने बच्चों को समझो…
उनसे जुड़ो…
वरना कल… सिर्फ पछतावा बचेगा।
15/04/2026
जय भारत प्रिय साथियों 🙏
स्वस्थ जीवन सुखी जीवन
तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट छुड़ाने के कुछ घरेलू उपाय
बच्चों को व्यसनों से दूर रखें
दो चम्मच अजवायन, दो छोटी इलायची, दो गिलास पानी में डालकर उबालें जब एक गिलास पानी रह जाए तो उतार लें। इस का को दिन में 3 बार लें (स्वाद अनुसार नमक या गुड डाल सकते हैं)। इससे तम्बाकू छोड़ने में मदद मिलेगी। पानी अधिक पिएं तथा पैदल चलना, व्यायाम करना और टहलना अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
मुनक्का 100 ग्राम, छोटी इलायची, काली मिर्च, दाल चीनी 10-10 ग्राम लेकर पीस लें। इसमें काला नमक, नींबू रस मिलाकर गोली बना लें। अगर गोली ना बनें तो थोड़ा सा सौंफ पाउडर मिलाकर गोलियां बनाएं। इन गोलियों को बीड़ी की तलब लगने पर मुंह में रखें - धीरे-धीरे चबाएं। बीड़ी छोड़ने में मदद मिलेगी।
100 ग्राम सौंफ भून लें, उसमें 5 ग्राम लौंग (फूल तोड़ कर) मिलाएं। इसमें स्वादानुसार मिश्री मिलाएं तथा एक डिब्बी में भरकर रखें। जब भी तम्बाकू, बीड़ी या सिगरेट की तलब लगे, तो इसे मुंह में रखकर चूनें।
सौंफ, तिल, अजवायन बराबर मात्रा में लेकर हल्का भून लें। अब इसमें नमक तथा नींबू रस डालें। मुंह में रखकर चबाएं, जिससे सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू छोड़ने में मदद मिलेगी।
मुंह में लौंग सौंफ, इलायची या मूखा आंवला रखने से भी बीड़ी और सिगरेट की तलब नहीं रहेगी।
अदरक के टुकड़े काट लें। उस में काला नमक और नीबू लगाकर सुखाएं। 3-4 पीस मुंह में रख कर धीरे धीरे चूनें। इस से नशे की तलब समाप्त हो जाएगी।
एक पुराना पीपल का पेड़ जिसकी पूजा ना होती हो ढूंढ लें। पेड़ से विनम्र प्रार्थना करें कि उसकी छाल किसी के भलाई हेतु ली जा रही है। फिर छाल उतार लें, वहां पर मिट्टी या गोबर का लेप कर दें। छाल को छाया में सुखा लें और बारीक पीस लें। अब इसमें बराबर मात्रा में बड़ी इलायची के दाने तथा अजवायन पीस कर मिला दें। इसमें थोड़ा गुड़ मिला कर गोलियां बना लें। प्रतिदिन सुबह-शाम 1-2 गोली चू में। किसी भी नशे की तलब (तम्बाकू, शराब, गांजा, हेरोइन, सिगरेट) छूट जाएगी।
🚩 भारतीय नव वर्ष के शुभ अवसर पर रावला में भक्ति और श्रद्धा के साथ सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया गया।
🙏 संकटमोचन हनुमान जी की कृपा सभी पर बनी रहे और हर घर में सुख, शांति और समृद्धि आए।
✨ ऐसे धार्मिक आयोजनों से समाज में सकारात्मक ऊर्जा और एकता का संचार होता है।
🚩 जय श्री राम | जय बजरंगबली
#भारतीयनववर्ष #सुंदरकांड #हनुमानजी #जयश्रीराम #बजरंगबली #धर्म #भक्ति
जय भारत प्रिय साथियों
एक गुरु ने दुखी शिष्य से एक मुट्ठी नमक पानी के गिलास में डालने को कहा। शिष्य ने पिया और कहा, "बहुत खारा है।" फिर गुरु ने उतना ही नमक एक विशाल झील में डलवाया। अब पानी का स्वाद पूछा, तो शिष्य बोला, "मीठा है।" गुरु बोले, "जीवन के दुख नमक की तरह हैं; अपनी सोच का दायरा बढ़ाओ, दुख छोटा हो जाएगा।"
शिक्षाःहृदय जितना बड़ा होगा, जीवन की मुश्किलें उतनी ही कम प्रभाव डालेंगी।
जय भारत प्रिय साथियों
With Rajasthan Patrika
04/02/2026
कोच मुकेश कंबोज के प्रेरणादायी नेतृत्व में भारतीय महिला शूटिंग टीम ने शूटिंग वर्ल्ड कप में नेपाल को पराजित कर स्वर्ण पदक जीतकर पूरे देश को गर्व से भर दिया है। 🏅🎯🇮🇳
यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, अनुशासन और समर्पण का शानदार परिणाम है। 👏🔥
कोच मुकेश कंबोज द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ी आज न केवल राष्ट्रीय मंच पर देश का मान बढ़ा रहे हैं, बल्कि भारतीय सेना, शारीरिक शिक्षा अध्यापक और विभिन्न राजकीय सेवाओं में भी अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दे रहे हैं — यह अपने आप में गर्व की बात है। 🤝💫
उनकी सतत साधना, उत्कृष्ट प्रशिक्षण पद्धति और खिलाड़ियों पर विश्वास का ही नतीजा है कि उन्हें शूटिंग वर्ल्ड कप में भारतीय महिला टीम का कोच बनने का गौरव मिला। 🎯💪
इस जिम्मेदारी को उन्होंने पूरे जुनून और निष्ठा के साथ निभाते हुए टीम को स्वर्णिम सफलता दिलाई है। 👑🎉
यह उपलब्धि कोच मुकेश कंबोज जी की दूरदृष्टि, नेतृत्व क्षमता और प्रशिक्षण कौशल का जीवंत प्रमाण है।
पूरे देश को आप पर गर्व है! 🇮🇳👏🔥
हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ! 🌟
Rajasthan Patrika Dainik Bhaskar Facebook
Subhash Bhadu
जय हिन्द जय भारत प्रिय साथियों 🙏🇮🇳
पर्यावरण विषय पर लगभग हर शहर, कॉलेज और कार्यक्रम में एक ही वाक्य बार-बार दिखाई देता है—
“धरती बचाओ” या “पृथ्वी बचाओ।”
लेकिन जितनी बार मैं यह वाक्य सुनता हूँ, उतनी ही बार मुझे लगता है कि इसमें एक बुनियादी भूल छिपी हुई है।
यह मान लेना कि मनुष्य धरती को बचा सकता है, हमारे अहंकार का परिचायक है। चार–साढ़े चार अरब वर्ष पुरानी यह पृथ्वी आग, बर्फ, भूकंप, उल्कापात और असंख्य प्रजातियों के विलुप्त होने जैसी घटनाएँ झेल चुकी है। मनुष्य तो उसके इतिहास में एक क्षण भर की उपस्थिति है। हम इस धरती पर एक अणु तक नहीं बना सकते, रेत का एक कण भी स्वयं उत्पन्न नहीं कर सकते, फिर भी यह भ्रम पाल लेते हैं कि हम धरती को बचा लेंगे।
सच्चाई यह है कि धरती या प्रकृति को हमारी ज़रूरत नहीं है, हमें प्रकृति की ज़रूरत है।
यदि मनुष्य कल समाप्त हो जाए, तो जंगल फिर उग आएँगे, नदियाँ साफ हो जाएँगी, समुद्र स्वयं को संतुलित कर लेंगे और जीव-जंतु फिर फैल जाएँगे। प्रकृति चलती रहेगी।
लेकिन यदि जलवायु पूरी तरह बिगड़ जाए, हवा-पानी-मिट्टी जहरीली हो जाए, तो मनुष्य प्रजाति का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।
भारतीय दर्शन यह सत्य बहुत पहले से कहता आया है। पंचतत्व के अनुसार हमारा शरीर भी उसी मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से बना है, जिनसे पूरी प्रकृति बनी है। बाहर की हवा ही हमारे फेफड़ों में जाती है, बाहर का पानी ही हमारे रक्त और द्रवों में बदलता है, और मिट्टी ही भोजन बनकर हमारे भीतर प्रवेश करती है। हम प्रकृति से अलग नहीं हैं, हम उसी का हिस्सा हैं।
लेकिन आधुनिक जीवन में हमारा हर उपभोग—चाहे वह वाहन चलाना हो, बिजली का उपयोग हो, कोई वस्तु खरीदना हो या मोबाइल पर एक संदेश भेजना हो—किसी न किसी रूप में हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित करता है। इसका अर्थ यह है कि हम वास्तव में प्रकृति को नहीं, खुद को दूषित कर रहे हैं।
कभी-कभी आधुनिक मनुष्य की समझ पर सच में संदेह होने लगता है। हम उसी हवा को कैसे खराब कर सकते हैं जिसमें हमें सांस लेनी है? उसी पानी को कैसे गंदा कर सकते हैं जिसे हमें पीना है? क्या यही बुद्धिमत्ता है?
इतिहास हमें जलवायु परिवर्तन के परिणाम का स्पष्ट उदाहरण देता है। कभी इस धरती पर डायनोसौर राज करते थे—शक्तिशाली, विशाल और सर्वव्यापी। लेकिन जलवायु बदली और वे विलुप्त हो गए। धरती बची रही। जीवन चलता रहा। केवल एक प्रजाति समाप्त हुई।
फर्क यह है कि उस समय जलवायु परिवर्तन के लिए डायनोसौर जिम्मेदार नहीं थे, जबकि आज का जलवायु परिवर्तन मनुष्य द्वारा पैदा किया गया है—और बहुत तेज़ी से।
हम जीवाश्म ईंधन जला रहे हैं, जंगल काट रहे हैं और वातावरण में बेहिसाब कार्बन भर रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, मौसम असंतुलित हो रहा है और आपदाएँ बढ़ रही हैं। यह संकेत धरती के मरने का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि मानव सभ्यता स्वयं अपने विनाश की ओर बढ़ रही है।
इसलिए अगली बार जब आप “धरती बचाओ” कहें, तो एक पल रुककर सोचिए। धरती को बचाने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत है अपने जीने के तरीके को बदलकर खुद को बचाने की।
आधुनिक दुनिया एक खतरनाक भ्रम पर टिकी है कि सीमित धरती पर असीमित उपभोग संभव है। जब हमारी आय सीमित होती है तो हमारे खर्चे भी सीमित होते हैं। उसी तरह, जब हमारी धरती सीमित है, तो हमारी ज़रूरतें भी सीमित क्यों न हों?
क्योंकि
धरती वारिस नहीं मांगती,
ज़िम्मेदार इंसान मांगती है।
“धरती बचाओ” नहीं,
“अपना भविष्य बचाओ।”