Vandana love dwivedi
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कभी-कभी मन चिल्लाना चाहता है
खूब तेज़, पूरी आवाज़ में.....!!
कभी खुशी या कभी दर्द में ....
जब सँभाल न पाओ तो चिल्लाओ
हाँ,....
देखो तो कितना सुकून मिलता है ....!!
कुछ गुबार निकल जाता है
तो हल्कापन महसूस होता है ...!
पर नहीं .....
मत चीखो,
मत दर्शाओ
कितना भी दर्द हो,
टीस या चुभन हो,
संस्कार तुम्हारा हाथ पकड़ कर खींच लेता है
नहीं प्रदर्शित करो अपनी खुशी को
मर्यादा नाम का गहना
ताला बनकर होठों पर लटक जाता है
न न आँसुओं की तो इजाजत ही नहीं है .....
भावनाओं का समन्दर ..
उमड़े तो उमड़े...
झूठी मुस्कान ओढ़,
चेहरे पर मुखौटे लगा
साड़ी का पल्लू ठूँस और ... !!
चल अपने कर्तव्य पथ पर ....
जो तूने तय ही नहीं किया था .....?
..........है न.....?
वन्दना ।
समय के थपेड़ों ने उसे क्या से क्या बना दिया
एक चुलबुली सी लड़की को एक संगीन औरत बना दिया
बात बात पर ठहाके लगाने वाली अब मंद मंद मुसकाती है
शोर शराबा करने वाली , अब धीरे से कुछ कह जाती है
कभी किसी की परवाह न करने वाली अब सलीक़े से पेश आती है
साड़ी के पल्लू से वो ख़ुद को थोड़ा और छुपाती है
मस्ती मज़ाक पसंद वो बाला अब दोस्तों से नहीं मिलने के बहाने बनती है
जिम्मेदारियों का नाम ले कर महफ़िलों से कतराती है
कभी पैसों की परवाह न करने वाली अब कम में काम चलiती है
सेहत के नाम पर मीलों पैदल चलकर रिक्शे के पैसे बचाती है
बिंदास जीने वाली को अब दुनियादारी समझ आयी है
ज़िन्दगी जद्दोज़हद में वो अब ज़िद पर जो अड़ आयी है
दिनभर करती मेहनत फिर चार पैसे वो कमाती है
रात अकेली जाग तकिये में आँसू बहाती है
छोड़ा लोगों ने साथ है उसका , इसमें उसका भी है कुछ दोष
धोखा दे कर गया कोई अपना तब आया है उसको होश
इंद्रधनुष के सपने देख ऊँची ली थी इसने उड़ान
पंख कोई ऐसे क़तरेगा नहीं रहा था इसको भान
पर टूटी नहीं है अभी भी वो , जला रक्खी है उम्मीद की शमा
एक दिन फिर वो उड़ेगी और छुएगी अपना आसमां - मूलभूत रचना।, वंदना लव।
*😔
*बेटियां चावल उछाल विदा हो जाती हैं,*
ये भी किसी तुलसी पूजा से कम नहीं होती..
😔*
बेटियाँ चावल उछाल
बिना पलटे,
महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं ।
छोड़ जाती है बुक शेल्फ में,
कवर पर अपना नाम लिखी किताबें ।
दीवार पर टंगी खूबसूरत आइल पेंटिंग के
एक कोने पर लिखा अपना नाम ।
खामोशी से नर्म एहसासों की निशानियां,
छोड़ जाती है ......
*बेटियाँ विदा हो जाती हैं ।*
रसोई में नए फैशन की क्राकरी खरीद,
अपने पसंद की सलीके से बैठक सजा,
अलमारियों में आउट डेटेड ड्रेस छोड़,
तमाम नयी खरीदादारी सूटकेस में ले,
मन आँगन की तुलसी में दबा जाती हैं ...
*बेटियाँ विदा हो जाती हैं।*
सूने सूने कमरों में उनका स्पर्श,
पूजा घर की रंगोली में उंगलियों की महक,
बिरहन दीवारों पर बचपन की निशानियाँ,
घर आँगन पनीली आँखों में भर,
महावर लगे पैरों से दहलीज़ लांघ जाती है...
*बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं ।*
एल्बम में अपनी मुस्कुराती तस्वीरें ,
कुछ धूल लगे मैडल और कप ,
आँगन में गेंदे की क्यारियाँ उसकी निशानी,
गुड़ियों को पहनाकर एक साड़ी पुरानी,
उदास खिलौने आले में औंधे मुँह लुढ़के,
घर भर में वीरानी घोल जाती हैं ....
*बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं ।*
उनके कुछ पुराने कपड़े
उच्च शिक्षा की कुछ पुरानी पुस्तकें
चुनरी दुपट्टे में करीने से
बांध कर रखे गए
धार्मिक ग्रंथ
बची खुची जूनी पुरानी
स्टेशनरी
उन दिनों की नसीहत
पापा समय से नहा लेना
खाना खा लेना
ठीक उसी वक्त अब भी कानों में उनकी कही बातें गूंज जाती हैं
*बेटियां चावल उछाल विदा हो जाती हैं ।*
टी वी पर शादी की सी डी देखते देखते,
पापा हट जाते जब जब विदाई आती है।
सारा बचपन अपने तकिये के अंदर दबा,
जिम्मेदारी की चुनर ओढ़ चली जाती हैं ।
**बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे विदा हो जाती हैं ।**
.....बस यही एक ऐसा पौधा है ..
जो बीस पच्चीस साल का होकर भी
दूसरे आंगन में जा के
फिर उस आंगन का होकर
खुशबू, छांव, फल, सकून और हरियाली देता है ...
ये तुलसी से कम योग्य नहीं ...
ये भी पूजने योग्य है ...
06/10/2022
हर कोई एकदूसरे को कह रहा है तुम मेरी दुनिया हो, मेरी कायनात हो...
कोई मुझे भी अपना जिला या तहसील बना लो..!!!
😣😣
होइ है वही जो राम रच राखा,
को करी तर्क बढ़ाए साखा।
॥ राम सिया राम सिया राम…॥
🙏
हम तो भई जैसे है वैसे रहेंगे ...अब कोई खुश हो या ख़फ़ा हम नहीं बदलेंगे अपनी अदा ....
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