suraj ji ayodhya
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01/04/2026
आज से माँ पीतांबरा के दरबार मे 5 दिवसीय कार्यक्रम प्रारम्भ.गोडा में
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शौच के नियम :
1.मल त्याग करते समय शीघ्रता से श्वास ग्रहण नहीं करनी चाहिये।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म. 26/26)
2. किसी जलाशय से बारह अथवा सोलह हाथ की दूरी पर मूत्र-त्याग ओर उससे चार गुणा अधिक दूरी पर ही मल-त्याग करना चाहिये।अर्थात इन जल स्रोतों से यथा संभव दूरी पर मल मूत्र का त्याग करें
(धर्मसिंधु 3 पू.आहिन्क)
3. किसी भी वृक्ष की छाया में मल-मूत्र का त्याग कभी न करें। परन्तु अपनी छाया भूमि पर पड़ रही हो तो उसमें मूत्र-त्याग कर सकते हैं।
(आपस्तम्बधर्मसूत्र 1/11/30/16-17)
4. मल-मूत्र का त्याग करते समय ग्रहों, नक्षत्रों, सूर्य, चन्द्र और आकाश की ओर नहीं देखना चाहिये। अपने मल-मूत्र की ओर भी नहीं देखना चाहिये।
(देवीभागवत 11/2/15, कूर्मपुराण उ.13/42)
5. पेड़ की छाया में, कुएँ के पास, नदी या जलाशय में अथवा उनके तट पर, गौशाला में, जोते हुए खेत में, हरी-भरी घास में, पुराने (टूटे-फूटे) देवालय में, चौराहे में, श्मशान में, गोबर पर, जल के भीतर, मार्ग पर, वृक्ष की जड़ के पास, लोगों के घरों के आस-पास, खम्भे के पास, पुल पर, खेल-कूद के मैदान में, मंच (मचान) के नीचे, भस्म (राख) पर, देव मंदिर में या उसके पास, अग्नि या उसके निकट, पर्वत की चोटी पर, बाँबीपर, गड्ढे में, भूसी में, कपाल (ठीकरे या खप्पर) में, बिल में, अंगार (कोयले) पर, और लकड़ी पर मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म. 26/19-24, गरूड़पुराण, आचार. 96/38)
6. अग्नि, सूर्य, गौ, ब्राह्मण, गुरू, स्त्री,(अर्थात किसी भी व्यक्ति ) चन्द्रमा, आती हुई वायु, जल और देवालय-इनकी ओर मुख करके (इनके सम्मुख) मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये।
7. जो स्त्री-पुरूष सूर्य, या वायु की ओर मुख करके पेशाब करते हैं, उनकी गर्भ में आयी हुई सन्तान गिर जाती है।
(महाभारत, अनु. 125/64-65)
8. सामने देवताओं का और दाहिने पितरों का निवास रहता हैं, अत: मुख नीचे करके कुल्ले को अपनी बायीं ओर ही फेंकना चाहिये।
(व्याघ्रपादस्मृति 200)
9. दूधवाले तथा काँटेवाले वृक्ष दातुन के लिये पवित्र माने गये हैं।
(लघुहारितस्मृति 4/9)
10. अपामार्ग, बेल, आक, नीम, खैर, गूलर, करंज, अर्जुन, आम, साल, महुआ, कदम्ब, बेर, कनेर, बबूल आदि वृक्षों की दातुन करनी चाहिये। परन्तु पलाश, लिसोड़ा, कपास, धव, कुश, काश, कचनार, तेंदू, शमी, रीठा, बहेड़ा,सहिजन, सेमल आदि वृक्षों की दातुन नहीं करनी चाहिये।
(विश्वामित्रस्मृति 1/61-63)
11. कशाय, तिक्त अथवा कटु रसवाली दातुन आरोग्यकारक होती हैं।
(वृद्धहारीतस्मृति 4/24)
12. महुआ की दातुन से पुत्रलाभ होता हैं। आक की दातुन से नेत्रों को सुख मिलता हैं। बेर की दातुन से प्रवचन की शक्ति प्राप्त होती हैं। बृहती (भटकटैया) की दातुन करने से मनुष्य दुष्टों पर विजय पाता हैं। बेल और खेर की दातुन से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं। कदम्ब से रोगों का नाश होता हैं। अतिमुक्तक (कुन्द का एक भेद) से धन का लाभ होता हैं। आटरूशक (अड़ूसा) की दातुन से सर्वत्र गौरव की प्राप्ति होती हैं। जाती (चमेली) की दातुन से जाति में प्रधानता होती हैं। पीपल यश देता हैं। िशरीश की दातुन से सब प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त होती हैं।
(स्कन्दपुराण, प्रभास. 17/8-12)
13. कोरी अंगुली से अथवा तर्जनी अंगुली से कभी दातुन नहीं करना चाहिये। कोयला, बालुका, भस्म (राख) नाख़ून, ईंट, ढेला और पत्थर से दातुन नहीं करना चाहिये।
( स्कन्दपुराण, प्रभास. 17/19)
14. दातुन कनिश्ठका अंगुली के अग्रभाग के समान मोटी, सीधी तथा बारह अंगुल लम्बी होनी चाहिये।
(वसिश्ठस्मृति-2, 6/18)
15. दन्तधावन करने से पहले दातुन को जल से धो लेना चाहिये। दातुन करने के बाद भी उसे पुन: धोकर तथा तोड़कर पवित्र स्थान में फेंक देना चाहिये।
(गरूड़पुराण, आचार. 205/50)
16. सदा पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके दन्तधावन करना चाहिये। पश्चिम और दक्षिण की ओर मुख करके दन्तधावन नहीं करना चाहिये।
(पद्मपुराण, सृिश्ट 51/125)
17. प्रतिपदा, षष्टि , अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमावस्या के दिन शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिये।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्री कृष्ण 75/60)
18. सिर पर लगाने से बचे हुए तेल को शरीर पर नहीं लगाना चाहिये।
(कूर्मपुराण, उ.16/58)
19. यदि नदी में स्नान कर रहे हो तो जिस ओर से उसकी धारा आती हो, उसी ओर मुँह करके तथा दूसरे जलाशयों में सूर्य की ओर मुँह करके स्नान करना चाहिये।
(महाभारत, आश्व.92)
20. बिना शरीर की थकावट दूर किये और बिना मुख धोये स्नान नहीं करना चाहिये।
(चरकसंहिता, सूत्र. 8/11)
21. सूर्य की धूप से सन्तप्त व्यक्ति यदि तुरन्त (बिना विश्राम किये) स्नान करता हैं तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती हैं और सिर में पीड़ा होती हैं।
(नीतिवाक्यामृत 25/28)
22. पूर्ण नग्न होकर कभी स्नान नहीं करना चाहिये।
(मनुस्मृति 4/45)
23. पुरूष को नित्य सिर के ऊपर से स्नान करना चाहिये । सिर को छोड़कर स्नान नहीं करना चाहिये। सिर के ऊपर से स्नान करके ही देवकार्य तथा पितृकार्य करने चाहिये।
(वामनपुराण 14/53)
04/02/2026
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जय ॐ क्रीं काली नमः
मां काली तारा महाविद्या षोड़शी मां भुवनेश्वरी।
मां भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या मां धूमावती तथा।।
मां बगला सिद्ध विद्या च
मातंगी मां कमलात्मिका।
ऐसा दस महाविद्या:
सिद्धविद्या: प्रकीर्तिता।।
12 राशियों की मित्रता और शत्रुता को शास्त्रसम्मत रूप से कैसे समझें❓
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ज्योतिष में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि कौन-सी राशि किसकी मित्र है और कौन सी शत्रु, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से यह समझना बहुत आवश्यक है कि राशियों के भीतर स्वयं कोई मित्रता या शत्रुता नहीं होती, मित्रता और शत्रुता का वास्तविक संबंध ग्रहों के बीच होता है, क्योंकि प्रत्येक राशि का संचालन एक अधिपति ग्रह करता है, इसलिए जब दो राशियों के आपसी संबंध की बात की जाती है तो वास्तव में उनके अधिपति ग्रहों के आपसी संबंधों को समझा जाता है, यही कारण है कि बिना ग्रहों को समझे केवल राशि के आधार पर निष्कर्ष निकालना अधूरा और कई बार भ्रमित करने वाला हो सकता है।
🔸ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों को उनके स्वभाव और प्रवृत्ति के आधार पर मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया गया है, पहला देवता गण और दूसरा दानव गण, देवता गण में सूर्य, चंद्रमा, मंगल और गुरु को रखा गया है, ये ग्रह तेज, धर्म, साहस, नेतृत्व और संरक्षण से जुड़े माने जाते हैं, वहीं दानव गण में बुध, शुक्र और शनि को रखा गया है, जो बुद्धि, भोग, कर्म, व्यवहारिकता और सांसारिक जीवन से संबंधित माने जाते हैं, शास्त्रों में यह माना गया है कि एक ही गण के ग्रहों में सामान्यतः सहयोग और सामंजस्य रहता है और भिन्न गण के ग्रहों में वैचारिक मतभेद या टकराव की प्रवृत्ति देखी जाती है।
🔸अब यदि इन ग्रहों की राशियों को देखें तो देवता गण के अंतर्गत सूर्य की सिंह राशि आती है, मंगल की मेष और वृश्चिक राशि आती है, चंद्रमा की कर्क राशि होती है और गुरु की धनु तथा मीन राशि होती है, इस प्रकार सिंह, मेष, वृश्चिक, कर्क, धनु और मीन राशियों को देवता गण की राशियाँ माना जाता है और सामान्य रूप से इनके बीच आपसी अनुकूलता और सहयोग की संभावना अधिक मानी जाती है। इसी प्रकार दानव गण में बुध की मिथुन और कन्या राशि होती है, शुक्र की वृषभ और तुला राशि होती है और शनि की मकर और कुंभ राशि होती है, इसलिए मिथुन, कन्या, वृषभ, तुला, मकर और कुंभ राशियों को दानव गण की राशियाँ माना जाता है और इनके बीच भी स्वाभाविक तालमेल देखा जाता है।
🔸शास्त्रों के अनुसार जब देवता गण और दानव गण की राशियाँ आपस में आती हैं तो सामान्यतः उन्हें परस्पर विरोधी स्वभाव का माना जाता है, लेकिन यह नियम सर्वत्र और हर स्थिति में लागू हो ऐसा नहीं है, इसे केवल एक आधार या प्रारंभिक संकेत के रूप में समझना चाहिए, क्योंकि वास्तविक फलादेश केवल यहीं तक सीमित नहीं होता बल्कि कुंडली के कई अन्य महत्वपूर्ण तत्व इसमें निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
🔸अब यदि हम किसी कुंडली का गहराई से विश्लेषण करें तो सबसे पहले भाव बल का विचार करना आवश्यक होता है, कोई भी ग्रह यदि अपने मित्र ग्रह की राशि में होकर भी छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो वह शुभ फल देने में कमजोर पड़ सकता है, वहीं कोई ग्रह यदि अपने शत्रु ग्रह की राशि में होकर भी केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित हो तो वह अपेक्षाकृत अच्छे फल दे सकता है, इसलिए केवल राशि की मित्रता या शत्रुता देखकर ग्रह को पूर्ण रूप से शुभ या अशुभ घोषित नहीं किया जा सकता।
🔸इसके साथ ही नक्षत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, ग्रह जिस नक्षत्र में स्थित होता है उस नक्षत्र का स्वामी ग्रह उस ग्रह के फल को नियंत्रित करता है, मान लीजिए कोई ग्रह शत्रु राशि में बैठा है लेकिन वह अपने मित्र ग्रह के नक्षत्र में स्थित है तो उसका अशुभ प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है, वहीं यदि कोई ग्रह मित्र राशि में होकर भी शत्रु नक्षत्र में बैठा हो तो उसके फल में बाधा आ सकती है, इसलिए नक्षत्र को अनदेखा करना शास्त्रीय दृष्टि से बड़ी भूल मानी जाती है।
🔸डिग्री की स्थिति भी ग्रह की शक्ति तय करती है, कोई ग्रह यदि अत्यंत कम डिग्री या अत्यधिक अंतिम डिग्री पर स्थित हो तो वह बाल या वृद्ध अवस्था में माना जाता है और उसका प्रभाव पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता, वहीं ग्रह यदि अपनी उच्चतम प्रभावी डिग्री के आसपास हो तो वह अधिक सक्षम होकर फल देता है, चाहे वह मित्र राशि में हो या शत्रु राशि में। इसी प्रकार ग्रह का अस्त होना भी बहुत महत्वपूर्ण विषय है, सूर्य के अत्यधिक समीप होने पर जब कोई ग्रह अस्त हो जाता है तो उसकी स्वाभाविक शक्ति क्षीण हो जाती है, विशेषकर बुध, शुक्र और शनि के अस्त होने पर उनके शुभ फल कम हो जाते हैं, ऐसे में राशि की मित्रता होते हुए भी ग्रह कमजोर परिणाम दे सकता है।
🔸वक्री ग्रहों का विचार भी अत्यंत आवश्यक है, वक्री ग्रह सामान्यतः अपनी शक्ति को भीतर की ओर मोड़ लेते हैं और कई बार सामान्य स्थिति से अलग परिणाम देते हैं, कुछ शास्त्रों में वक्री ग्रह को बलवान माना गया है, लेकिन यदि वक्री ग्रह पाप भाव में स्थित हो या अशुभ दृष्टियों से ग्रस्त हो तो वह अधिक कष्टकारी भी बन सकता है, इसलिए वक्री होना अपने आप में न तो पूर्ण शुभ है और न ही पूर्ण अशुभ, उसका निर्णय भाव, राशि और दृष्टि के साथ मिलाकर किया जाता है।
🔸ग्रह किस कोण या भाव में स्थित है यह भी अत्यंत निर्णायक होता है, केंद्र भाव में स्थित ग्रह व्यक्ति के जीवन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, त्रिकोण भाव में स्थित ग्रह भाग्य और धर्म को मजबूत करते हैं, जबकि छठा, आठवां और बारहवां भाव ग्रह के लिए चुनौतीपूर्ण माने जाते हैं, यदि कोई ग्रह अपने मित्र राशि में होकर भी इन भावों में हो तो संघर्ष देता है और यदि कोई ग्रह शत्रु राशि में होकर भी केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम दे सकता है।
🔸अंततः शास्त्र सम्मत निष्कर्ष यही निकलता है कि राशियों की मित्रता और शत्रुता को केवल ग्रह गण के आधार पर समझना एक सामान्य और प्रारंभिक तरीका है, वास्तविक ज्योतिषीय निर्णय के लिए ग्रह का भाव बल, नक्षत्र, डिग्री, अस्त या वक्री अवस्था, शुभ या अशुभ दृष्टियाँ और कुंडली की समग्र स्थिति का अध्ययन अनिवार्य है, यही समग्र दृष्टिकोण ज्योतिष को गहराई और सत्य के अधिक निकट ले जाता है और यही कारण है कि शास्त्रों में एक ही नियम को अंतिम सत्य नहीं माना गया बल्कि समन्वय और विवेक पर सबसे अधिक बल दिया गया है, इसलिए एक अनुभवी ज्योतिषी सब पहलू पर विचार करके कुण्डली का फलादेश करता है ।।
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04/02/2026
suraj ji ayodhya
16/01/2026
suraj ji ayodhya
07/01/2026
सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा प्रथम स्कंध से द्वादश स्कन्ध तक मूल श्लोक
suraj ji ayodhya
Lal Jeet Shukla
माँ ललिताम्बा ज्योतिष सेवा केंद्र
Prakash Chandra
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02/01/2026
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औषधियों, तेल, व्रत एवं दान के द्वारा गुरु पीड़ा मुक्ति
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औषधि स्नान
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गुरु के अशुभ होने की स्थिति में औषधि स्नान का विशेष महत्त्व है । औषधि स्नान
से भी गुरुकृत रोग तथा गुरु के अशुभ प्रभाव में कमी आती है।
औषधि स्नान सामग्री
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हल्दी, स्वर्णचूर्ण, शहद, चावल, पीली सरसों, मुलहठी, नमक, शक्कर पीले पुष्प, गूलर आदि किसी भी वृक्ष के ताजे नए पत्ते आदि।
विधि👉 औषधि स्नान किसी भी शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से आरम्भ करना चाहिये। इसके लिये ताजे पत्ते एवं पीले पुष्पो के अतिरिक्त सामग्री समान मात्रा में लें अथवा जितनी उपलब्ध हो जाए उसे किसी भी देसी दवा बेचने वाले से खरीद कर कूट-पीस लें। फिर जिस गुरुवार से स्नान करना है उससे एक रात्रि पहले (बुधवार की रात्रि) इस सामग्री में से थोड़ी मात्रा में लेकर जल में भिगो दें। चूर्ण न मिला पाने की स्थिति में रात भर के लिये सोने का कोई भी आभूषण अथवा मुद्रिका जल में डाल दें। अगले दिन प्रातः काल उस सामग्री को छान कर स्नान के जल में मिला
दें। ताजे पत्ते व पीले पुष्प इस समय मिलायें। फिर उस जल से स्नान करें।
ऐसा आप प्रारम्भ में एक माह प्रत्येक गुरुवार को औषधि स्नान करें, इसके बाद लगातार अथवा 43 दिन तक स्नान करें। माह में एक बार भी स्नान कर सकते हैं।
यदि आप रोज अथवा प्रत्येक गुरुवार को स्नान करना चाहें तो भी कर सकते हैं। इससे कोई हानि नहीं होती है अपितु गुरुकृत रोग व कष्टों से मुक्ति मिलती है।
बृहस्पति तेल
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आपको यदि कोई गुरुकृत रोग है, स्मरण शक्ति क्षीण हो रही है अथवा बाल असमय सफेद हो रहे हैं तो इस तेल के प्रयोग से पूर्ण लाभान्वित हो सकते हैं।
गुरु तेल बनाने के लिये आप 1 लीटर नारियल तेल लें। उसमें 10 ग्राम पिसी हल्दी मिलाकर गर्म कर लें। फिर उसे छान कर उसमें 15 ग्राम चन्दन का तेल मिश्रित करें। इसके बाद एक पीले कांच की बोतल में तेल डाल कर ढक्कन से बन्द कर सील कर दें। यदि आपको पीले कांच की बोतल न मिले तो किसी भी सफेद कांच की बोतल पर पीली पारदर्शी पन्नी अथवा कागज लपेट कर भी तेल बना सकते हैं। बोतल को सूर्योदय के बाद प्रथम दो घण्टे के लिये धूप में रखें। फिर पीले कपड़े में लपेट कर किसी ठंडे स्थान पर रख दें। अगले दिन पुनः सूर्योदय के समय धूप में रखें। ऐसा 15 दिन तक रखें। दूसरी ओर 500 ग्राम नारियल तेल में गुड़हल के पत्ते डालकर ठीक से गर्म कर लें। पत्ते एकदम से जल कर काले हो जाने चाहिये। इस तेल को भी धूप में तैयार तेल में मिला दें। तेल तैयार है। इस तेल का प्रयोग मालिश की तरह करें। सिर में डालने के लिये इस तेल में 11 बूंद नींबू का रस मिलाकर कर प्रयोग करें। इसके प्रयोग से आपको गुरुकृत रोग व कष्टों से मुक्ति मिलेगी। शरीर में अलग ही प्रकार का तेज अनुभव करेंगे। यह तेल श्वास रोग, दमा विकार, शिरो रोग, बालों का असमय सफेद होना, झडना व अन्य गरुकत रोगों के उपचार में अमृत का कार्य करेगा। स्त्रियां अपनी त्वचा की कान्ति निखारने के लिये इस तेल की मालिश कर सकती हैं। इस तेल के प्रयोग से त्वचा की कान्ति बढ़ती है। सिर में डालने से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। बालों का सफेद होना अथवा झडना जैसे रोग में यह तेल संजीवनी का कार्य करता है।
बृहस्पति व्रत
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गुरु का अशुभ फल कम करने के लिये व शुभ फल में वृद्धि के लिये (गुरुवार) का व्रत बहुत अच्छा प्रभाव देता है। इसके लिये यदि आप मीठा व्रत रखते हैं तो अधिक अच्छा है अन्यथा बिना नमक के भोजन का व्रत का संकल्प लेकर 7 अथवा 21 गरुवार का मीठा व्रत रखें। इसके लिये पूरे दिन निराहार रहे तो बहुत शुभ है अन्यथा एक समय फलाहार कर सकते हैं। उसके बाद भोजन कर सकते हैं। भोजन पूर्णतः शद्ध व शाकाहारी हो। इस व्रत से श्रीहरि एवं बृहस्पतिदेव की कृपा प्राप्त प्राप्त होती है व गुरुकृत कष्टों से मुक्ति मिल कर मानसिक व शारीरिक शक्ति बढ़ती है। यह व्रत आप किसी भी शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से कर सकते हैं। व्रत वाले दिन पीले वस्त्र
धारण करें अथवा अपनी जेब में पीला रूमाल अथवा पीला वस्त्र रखें। भोजन से पूर्व गाय को हल्दी से तिलक कर दो आटे की लोई अर्थात् आटे के पेड़े के साथ गुड़
चने की गीली दाल खिलायें। भोजन में बेसन से निर्मित किसी भी पदार्थ का भोजन कर सकते हैं। भोजन से पूर्व ॐ ग्रां ग्रीं गौं सः गुरवे नमः का 31, 51 अथवा 100 जाप करें। प्रातः पीपल के वृक्ष को पीले चन्दन अथवा चन्दन में हल्दी घिस कर तिलक करें व शुद्ध घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती के साथ जल अवश्य अर्पित करें, फिर केसर से अपने मस्तक पर तिलक करें। यदि आप चाहें तो कवच, स्त्रोत अथवा 108 नामों का उच्चारण भी कर सकते हैं। आपने जितने व्रत का संकल्प लिया है उतने व्रत पूर्ण होने पर आप उद्यापन करें तथा गुरु से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करें। यदि आप और अधिक व्रत रखना चाहते हैं तो उद्यापन के बाद बिना संख्या के एक समय के सामान्य भोजन का व्रत रख सकते हैं। इस व्रत को करने से धन की प्राप्ति तथा स्थिरता एवं यश की वृद्धि होती है। अविवाहित इस व्रत को करते हैं तो उनके विवाह का योग शीघ्र बनता है। अगर विद्यार्थी यह व्रत करते हैं तो उनकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है तथा उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ते हैं।
विवाह हेतु विशेष प्रयोग👉 यह मेरा स्वयं का शोध है कि जैसे किसी कन्या की
विवाह की आयु हो गई है तथा पत्रिका में विवाह योग भी है परन्तु अज्ञात कारणों से
विवाह नहीं हो पा रहा है तो कन्या गुरु यंत्र की उपरोक्त विधि से स्थापना करे। गुरुवार
के व्रत के साथ गुरु का कोई मंत्रजाप भी करे तो मेरा विश्वास है कि अनुष्ठान समाप्त
होने से पहले उसके सम्बन्ध की बात आरम्भ हो जायेगी। यह कार्य पूर्ण विश्वास एवं श्रद्धा के साथ करना चाहिये। मैंने यह प्रयोग अभी तक अनेक कन्यायों को स्वयं की देखरेख में करवाया है। परिणाम शत-प्रतिशत आशानुकूल निकले हैं।
दान
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प्राचीनकाल से ही दान का अत्यन्त महत्त्व माना गया है। देवताओं तथा ग्रहों की
प्रिय वस्तुओं का दान देने से वे प्रसन्न होते हैं तथा अपनी कृपाओं की वर्षा करते हैं।
यदि आप गुरुकृत पीड़ा भोग रहे हैं तो गुरु की वस्तओं का दान करके गुरुदेव की कृपा
प्राप्त कर सकते हैं। दान करने की वस्तुयें इस प्रकार है।
कोई भी गुरु का उपरत्न (यदि दान करना चाहे तो), 300 ग्राम से 11 किलो चने
की दाल व इतना ही गुड़ अपनी सामर्थ्य के अनुसार, कांसे का लोटा, थाली अथवा
कोई भी बर्तन चाहे तो दीपक, शुद्ध घी, कपूर, हल्दी, पीली सरसों, पांच फल, कोई
भी धार्मिक पुस्तक, पीले पुष्प, चाहे तो सोना भी, पीला वस्त्र, संभव हो तो गुरु यंत्र,
शहद, शक्कर, फल, गोरोचन, पीले रंग का पैन (कलम), दक्षिणा आदि। दान करने का
श्रेष्ठ समय सध्या को माना गया है। यह आवश्यक नहीं है कि आप इन सभी का दान करें। आपकी जितनी सामर्थ्य हो, उतना दान करें। किसी से उधार अथवा कर्ज लेकर दान नहीं करें।
क्रमशः...अगले लेख के माध्यम से हम अरिष्ट गुरु शान्ति के विशेष उपायों के विषय मे चर्चा करेंगे।
समयाभाव के कारण कृपया पोस्ट पर किसी प्रकार के शंका समाधान की अपेक्षा ना रखें।
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