Sanjita Yoga

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21/07/2023
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06/01/2019

#शीर्षासन — #सिर के बल tradition

#प्रारंभिक स्थिति :
वज्रासन।

#ध्यान दें :
पूरे शरीर पर।

#श्वास
सामान्य।

#दोहराना :
1 मिनट से अधिकतम 5 मिनट तक। (काफी लंबे समयावधि तक अभ्यास करने के बाद ही)

#अभ्यास :

वज्रासन में बैठें। हाथ जांघों पर रहें। > सामान्य श्वास लेते हुए सिर को घुटनों के सामने फर्श पर रखें। अंगुलियों को सिर के पीछे जकड़ें और जकड़े हुए हाथों से सिर के पिछले भाग को सहारा दें। बाजुओं के अग्रभाग फर्श पर रखे हुए हैं और कोहनियां सिर के साथ समबाहु त्रिभुज बनाती हैं। > पंजों को नीचे मोड़ें। कूल्हों को उठायें और टांगों को सीधा करें। शरीर के सन्तुलन पर ध्यान दें। पैरों को शरीर के पास लाने के लिए चलायें जिससे नितम्ब सिर के ऊपर तक ऊंचे हो जायें। शरीर के वजन को बाजुओं के अग्रभाग पर ले आयें और पैरों को फर्श से ऊपर उठायें। पीठ सीधी रखते हुए एडियों को नितम्बों की ओर लायें। अन्त में टांगों को पूरी तरह तानकर बिल्कुल सीधा कर लें और पैरों को आराम करने दें। शरीर के भार को बाजू के अग्रभाग, सिर और गर्दन में आराम देते हुए सन्तुलित करें। > यह मुद्रा यथासंभव देर तक बनाये > आहिस्ता से घुटनों को मोड़कर और पैरों को नितम्बों की ओर लाकर और फिर पंजों को फर्श पर रखकर टांगों को नीचे ले आयें। > कुछ देर तक योग मुद्रा में आगे की ओर झुक कर आराम करें और फिर वज्रासन में लौट आयें।

#लाभ :

यह आसन सिर की रक्तापूर्ति बढ़ाता है, अत: मस्तिष्क कार्य तथा सिर में सभी इन्द्रिय-अंगों (नेत्र, कर्ण आदि) के लिए लाभप्रद है। यह याददाश्त और एकाग्रता की योग्यता सुधारता है। यह आसन शरीर की सभी प्रणालियों को संवर्धित और विनियमित करता है। रजोनिवृत्ति से संबधित समस्याओं को सुधारता है। शारीरिक और मानसिक संतोष विकसित करता है और आध्यात्मिक प्रगति में सहायक होता है।

#सावधानी :

रजोधर्म की अवधि में और जब उच्च रक्तचाप, चक्कर आना, प्रमस्तिष्क संवाहिनी अव्यवस्था, काला पानी या ग्रीवा रीढ़ की समस्या हों तो यह आसन नहीं करें।

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तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः। (योगसूत्र-२.४९) अर्थात् आसन के स्थिर हो जाने पर श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम होता है। बाहर से भीतर को आनेवाला वायु 'श्वास' तथा भीतर से बाहर जानेवाला 'प्रश्वास' कहलाता है। इन दोनों के आने-जाने को रोकना 'प्राणायाम' होता है। आसन की सुखपूर्वक दीर्घकाल तक स्थिरता हो जाने पर प्राणायाम का विधान किया गया है। चलते-फिरते अथवा अस्थिर अवस्था में किया गया प्राणायाम चित्तवृत्ति के निरोध में सहायक नहीं होता। बाह्य चेष्टाओं के रुकने पर ही चित्त की वृत्तियाँ रूकती हैं, अतः प्राणायाम से पूर्व आसन का सिद्ध होना अनिवार्य है।

Pranayama is the technique to gain control over the breathing process after being established in .

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Stretches the hips and the groins, reverses the flow of gravity, promotes circulation, stimulates the immune system, provides a shift of perspective, balances and stimulates the pineal and pituitary glands to flush the body with life-sustaining hormones, strengthens the upper arms

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