Badrinath DHAM
DR SUDHINDRA SAH
यह पौराणिक कथा **समुद्र मंथन** की है, जिसमें भगवान विष्णु और सभी देवताओं (सुरों) की महिमा, उनके संकट और धैर्य की सुंदर झलक मिलती है।
# # समुद्र मंथन और अमृत की कथा
एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण देवराज इंद्र और सभी देवता अपनी शक्ति, वैभव और ऐश्वर्य खो बैठे। स्वर्ग की आभा फीकी पड़ गई और असुरों ने इसका फायदा उठाकर देवताओं को पराजित कर दिया। निराश और लाचार होकर सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें साथ लिया और वे सब भगवान विष्णु की शरण में क्षीर सागर पहुंचे।
भगवान विष्णु ने देवताओं की व्यथा सुनी और मुस्कुराते हुए कहा, *"हे देवगण! संकट के इस समय में तुम्हें धैर्य और कूटनीति से काम लेना होगा। इस समय असुर तुमसे अधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए उनसे मित्रता कर लो और मिलकर **समुद्र मंथन** करो। समुद्र से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम अमर और शक्तिशाली हो जाओगे।"*
# # # मंथन की तैयारी
भगवान विष्णु के कहे अनुसार, देवता और असुर दोनों समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए।
* **मंदराचल पर्वत** को मथानी (churning rod) बनाया गया।
* **नागराज वासुकी** को रस्सी के रूप में लपेटा गया।
मंथन शुरू हुआ, लेकिन तभी एक भारी संकट आ गया। बिना किसी आधार के मंदराचल पर्वत धीरे-धीरे समुद्र के भीतर धंसने लगा। यह देखकर देवता और असुर दोनों निराश हो गए।
# # # भगवान विष्णु का कूर्म अवतार
अपने भक्तों को संकट में देख भगवान विष्णु ने तुरंत **कूर्म (विशाल कछुए)** का अवतार लिया। वे समुद्र के तल में चले गए और मंदराचल पर्वत को अपनी विशाल पीठ पर संभाल लिया। इसके बाद समुद्र मंथन सुचारू रूप से आगे बढ़ा।
> **मंथन के रत्न:** मंथन के दौरान समुद्र से एक-एक करके 14 रत्न निकले। सबसे पहले भयंकर 'हलाहल' विष निकला, जिसे सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया। इसके बाद कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और स्वयं देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्होंने भगवान विष्णु को अपने वर के रूप में चुना।
>
# # # अमृत की प्राप्ति
अंत में, धन्वंतरि वैद्य अपने हाथों में **अमृत कलश** लेकर प्रकट हुए। अमृत देखते ही असुर उसे छीनकर भागने लगे। एक बार फिर देवता चिंतित हो गए कि यदि असुरों ने अमृत पी लिया तो सृष्टि का विनाश निश्चित है।
तब भगवान विष्णु ने **मोहिनी** रूप धारण किया। अपने अद्वितीय सौंदर्य और चतुराई से उन्होंने असुरों को मोहित कर लिया और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। अमृत पीकर सभी देवता पुनः अमर, शक्तिशाली और ओजस्वी हो गए। उन्होंने असुरों को परास्त किया और अपना खोया हुआ स्वर्ग का राज्य वापस पा लिया।
**सीख:** यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे कितना भी बड़ा संकट क्यों न आए, यदि हम सब मिलकर, धैर्यपूर्वक और ईश्वर पर विश्वास रखकर प्रयास करें, तो अंत में विजय सत्य और धर्म की ही होती है।
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के निर्माण और समुद्र से बहकर आई पवित्र लकड़ी (**दारु**) की कथा उड़ीसा के पुरी धाम से जुड़ी सबसे पवित्र और चमत्कारी कथाओं में से एक है। यह कथा मुख्य रूप से **स्कंद पुराण** में मिलती है।
इस अद्भुत कथा का संक्षेप इस प्रकार है:
# # # राजा इंद्रद्युम्न की खोज
मालवा के परम प्रतापी और परम विष्णु भक्त राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के साक्षात रूप 'नीलमाधव' के दर्शन करना चाहते थे। जब वे नीलमाधव की मूर्ति की खोज में पुरी पहुंचे, तो नीलमाधव की मूल मूर्ति अंतर्ध्यान हो चुकी थी। राजा अत्यंत दुखी और निराश हो गए। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया। तब भगवान विष्णु ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा:
> *"हे राजन! दुखी मत हो। नीलमाधव का वह रूप अब समाप्त हो चुका है। अब मैं दारु (लकड़ी) के रूप में प्रकट होऊंगा। तुम समुद्र तट पर जाओ, वहाँ तुम्हें एक विशाल वृक्ष का तना (लकड़ी का लट्ठा) तैरता हुआ मिलेगा, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न होंगे। उसी से मेरी नई मूर्ति का निर्माण करो।"*
>
# # # समुद्र से दिव्य लकड़ी (दारु) का मिलना
राजा तुरंत अपने सैनिकों के साथ पुरी के समुद्र तट पर पहुंचे। वहाँ सचमुच एक विशाल और खुशबूदार लकड़ी का टुकड़ा तैर रहा था, जिस पर दिव्य चिह्न अंकित थे। इसे **'महादारु'** कहा गया।
राजा के बलशाली सैनिकों और हाथियों ने उस लकड़ी को पानी से बाहर निकालने का प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण लकड़ी नहीं है। तब भगवान की आकाशवाणी हुई कि सात्विक भाव से ही इसे उठाया जा सकता है। राजा ने नीलमाधव के परम भक्त **विश्रावसु** (शबर कबीले के प्रमुख) और मंदिर के मुख्य पुजारी को बुलाया। जब दोनों ने मिलकर पवित्र भाव से लकड़ी को छुआ, तो वह आसानी से उठ गई।
# # # बूढ़े बढ़ई (विश्वकर्मा) का आगमन
अब चुनौती यह थी कि इस कठोर लकड़ी से मूर्ति कौन बनाएगा? जितने भी शिल्पकार आए, उनके छैनी-हथौड़े उस दिव्य लकड़ी को छूते ही टूट गए।
राजा चिंतित हो गए। तभी देवशिल्पी **भगवान विश्वकर्मा** एक अत्यंत वृद्ध मूर्तिकार (बढ़ई) का रूप धारण कर राजा के दरबार में आए। उन्होंने अपना नाम **'अनंत महाराणा'** बताया। उन्होंने मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी ली, लेकिन राजा के सामने एक कड़क शर्त रखी:
* वे २१ दिन (21 days) तक एक बंद कमरे में अकेले मूर्ति बनाएंगे।
* इस दौरान कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा और न ही अंदर झांकेगा। यदि किसी ने दरवाजा खोला, तो वे काम अधूरा छोड़कर चले जाएंगे।
# # # अधूरा रूप ही बना पूर्ण रूप
राजा ने शर्त मान ली। बंद कमरे से कई दिनों तक लकड़ी काटने और छैनी की आवाजें आती रहीं। लेकिन लगभग १४-१५ दिन बाद अचानक कमरे से आवाज आना बंद हो गया।
राजा की रानी **गुंडिचा** अत्यंत व्याकुल हो उठीं। उन्हें चिंता हुई कि कहीं वह वृद्ध मूर्तिकार भूख-प्यास से मर तो नहीं गया? रानी के हठ के आगे झुककर राजा इंद्रद्युम्न ने २१ दिन पूरे होने से पहले ही कमरे का दरवाजा खुलवा दिया।
दरवाजा खुलते ही कमरा खाली था और वह वृद्ध मूर्तिकार अंतर्ध्यान हो चुका था। वहाँ केवल तीन अधूरी मूर्तियां पड़ी थीं—**भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा** की। इन मूर्तियों के हाथ और पैर पूरी तरह नहीं बने थे और पंजे गायब थे।
# # # भगवान की इच्छा
राजा अपनी इस भूल पर बहुत रोए और पश्चाताप करने लगे। तब भगवान जगन्नाथ ने स्वयं राजा को सांत्वना दी और कहा:
> *"हे राजन! दुखी मत हो। यह मेरी ही इच्छा थी। मैं इस कलियुग में इसी निराकार और अधूरे प्रतीत होने वाले रूप में पूजनीय होना चाहता हूँ। मेरे हाथ-पैर न होने पर भी मैं पूरे ब्रह्मांड का संचालन कर सकता हूँ और भक्तों की पुकार सुन सकता हूँ।"*
>
इसके बाद राजा इंद्रद्युम्न ने उसी रूप में मूर्तियों की स्थापना की और एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
# # # इस कथा का आध्यात्मिक महत्व
* **नवबलेवर उत्सव:** आज भी हर ८, ११ या १९ साल बाद जब आषाढ़ महीने में दो 'मलमास' आते हैं, तो पुरानी मूर्तियों को बदलकर नई मूर्तियां बनाई जाती हैं। इसे **'नवकलेवर' (Navakalevara)** कहा जाता है। आज भी इसके लिए उसी तरह नीम के विशेष पेड़ (दारु) को खोजा जाता है, जिस पर शंख, चक्र, गदा के चिह्न हों।
* **भगवान का प्रेम:** यह कथा दर्शाती है कि भगवान रूप और सौंदर्य के भूखे नहीं हैं, वे केवल भक्त के भाव और भक्ति के भूखे हैं।
भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए शनिवार का व्रत और कथा श्रवण अत्यंत फलदायी माना जाता है। वैसे तो शनिवार का दिन मुख्य रूप से न्याय के देवता शनिदेव को समर्पित है, लेकिन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शनिदेव परम विष्णु भक्त हैं और शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है।
इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने से शनि दोष तो दूर होता ही है, साथ ही घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य का आगमन होता है। आइए जानते हैं शनिवार की इस पावन व्रत कथा को:
# # शनिवार व्रत कथा (विष्णु-लक्ष्मी जी और शनिदेव का प्रसंग)
एक बार सभी नवग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) में इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया कि उनमें सबसे बड़ा और सर्वश्रेष्ठ कौन है? जब वे आपस में किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाए, तो वे देवराज इंद्र के पास गए। इंद्र देव ने विवाद से बचने के लिए उन्हें पृथ्वी लोक के न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य के पास जाने की सलाह दी।
सभी ग्रह राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुँचे। राजा विक्रमादित्य ने बड़ी चतुराई से नौ धातुओं (सोना, चाँदी, कांसा, ताँबा, सीसा, राँगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा) के सिंहासन बनवाए। उन्होंने ग्रहों से कहा कि वे अपनी इच्छा से किसी भी सिंहासन पर बैठ जाएँ, जो जिस सिंहासन पर बैठेगा, उसका स्थान वही माना जाएगा।
* **सोने का सिंहासन:** सबसे आगे था, जिस पर सूर्य देव बैठे।
* **लोहे का सिंहासन:** सबसे पीछे था, जिस पर शनिदेव बैठे।
चूँकि लोहा सबसे पीछे और निम्न माना जाता था, इसलिए शनिदेव को लगा कि राजा विक्रमादित्य ने उन्हें सबसे छोटा सिद्ध किया है। क्रोधित होकर शनिदेव ने राजा से कहा— *"राजन! तुमने मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्ति को नहीं जानते। सूर्य एक राशि पर एक महीना रहते हैं, लेकिन मैं साढ़े सात साल (साढ़ेसाती) तक रहता हूँ। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने नष्ट कर दिया। अब तुम मेरे प्रकोप के लिए तैयार रहो।"*
# # # राजा विक्रमादित्य पर शनि का कोप
इसके बाद राजा विक्रमादित्य के जीवन में शनि की साढ़ेसाती शुरू हो गई। शनिदेव के प्रभाव से राजा को अपना राज्य छोड़कर भटकना पड़ा। उन पर चोरी का झूठा आरोप लगा, जिसके कारण एक अन्य राज्य के राजा ने उनके हाथ-पैर कटवा दिए। राजा विक्रमादित्य एक तेली के घर रहकर कोल्हू चलाने का काम करने लगे।
इतने कष्टों के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने अपना धैर्य नहीं खोया। वे निरंतर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का स्मरण करते रहे।
# # # शनिवार के दिन पीपल पूजा और कष्ट निवारण
शनिदेव के प्रकोप के अंतिम समय में, एक शनिवार के दिन राजा विक्रमादित्य ने तेली के घर पर ही दीप जलाकर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और शनिदेव की मानसिक आराधना की। वे राग दीपक गाने लगे। उनके भक्ति भाव और कठिन साधना को देखकर शनिदेव अत्यंत प्रसन्न हुए।
शनिदेव प्रकट हुए और बोले— *"हे राजन! मैं तुम्हारी भक्ति और न्यायप्रियता से अत्यंत प्रसन्न हूँ। माँगों क्या वरदान माँगते हो?"*
राजा विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर कहा— *"हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो जैसा कष्ट आपने मुझे दिया है, वैसा कष्ट संसार में किसी और को मत देना।"*
# # # कथा का सार और महात्म्य
शनिदेव ने राजा की दयालुता देखकर उन्हें उनके कटे हुए हाथ-पैर वापस दे दिए और उनका खोया हुआ राज्य भी लौटा दिया। शनिदेव ने कहा— *"जो व्यक्ति शनिवार के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करेगा, पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाएगा और मेरी कथा सुनेगा, उसे मेरी साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान कोई कष्ट नहीं होगा। माता लक्ष्मी उसके घर को धन-धान्य से भर देंगी।"*
# # शनिवार व्रत की सरल पूजा विधि
यदि आप शनिवार को भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की कृपा के लिए व्रत रख रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:
* **सुबह की पूजा:** सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो नीले या काले रंग के वस्त्र न पहनकर पीले या सादे वस्त्र पहनें) धारण करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने व्रत का संकल्प लें। उन्हें पीले फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
* **पीपल वृक्ष की पूजा:** शनिवार के दिन **पीपल के पेड़ में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास** माना जाता है। सुबह पीपल के वृक्ष पर जल अर्पित करें और उसकी परिक्रमा करें।
* **शाम की पूजा:** शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का एक दीपक (चौमुखी दीपक हो तो उत्तम) जलाएं।
* **दान कार्य:** इस दिन काले तिल, काली उड़द की दाल, या कंबल का दान किसी जरूरतमंद को करें।
> **आरती और मंत्र:** पूजा के अंत में ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें, महालक्ष्मी चालीसा पढ़ें और शनिदेव की आरती करें। इससे घर के सभी क्लेश दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।
>
माता वैष्णो देवी की उत्पत्ति और उनकी महिमा से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन उनमें सबसे प्रसिद्ध और मान्य कथा **भक्त श्रीधर और भैरवनाथ** की है। आइए इस पावन कथा को जानते हैं:
# # माता वैष्णो देवी की पावन कथा
बहुत समय पहले की बात है, जम्मू के कटरा के पास **हंसली गांव** में माता रानी के एक परम भक्त रहते थे, जिनका नाम **श्रीधर** था। वे और उनकी पत्नी बहुत ही धार्मिक और सरल स्वभाव के थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण वे अक्सर दुखी रहते थे।
# # # 1. एक रहस्यमयी कन्या का आगमन
एक दिन श्रीधर ने अपने घर पर एक कुंवारी कन्याओं के पूजन (कंजक पूजन) का आयोजन किया। उस पूजन में आस-पास के गांवों की कई कन्याएं आईं। उन्हीं कन्याओं के बीच एक अत्यंत रूपवान और दिव्य कन्या भी आकर बैठ गई।
पूजन समाप्त होने के बाद जब सभी कन्याएं चली गईं, तो वह दिव्य कन्या वहीं रुक गई। उसने श्रीधर से कहा, **"तुम पूरे गांव और आस-पास के लोगों को 'भंडारे' (सामूहिक भोज) का निमंत्रण दे आओ।"**
श्रीधर असमंजस में पड़ गए क्योंकि वे बहुत गरीब थे और उनके पास पूरे गांव को खिलाने के लिए अन्न नहीं था। लेकिन उस कन्या के चेहरे का तेज देखकर वे मना नहीं कर पाए और उन्होंने आस-पास के गांवों के साथ-साथ **गोरखनाथ के शिष्य भैरवनाथ** और उनके अनुयायियों को भी भंडारे का न्योता दे दिया।
# # # 2. भंडारे का चमत्कार
भंडारे के दिन श्रीधर की कुटिया में बहुत भीड़ जमा हो गई। सभी सोच रहे थे कि इतनी छोटी सी कुटिया में श्रीधर सबको भोजन कैसे कराएंगे। तब वह दिव्य कन्या आगे आई। उसके हाथ में एक **तस्वीर (या पात्र)** था, जिससे वह सबको भोजन परोसने लगी।
चमत्कार यह हुआ कि उस छोटे से पात्र से निकले भोजन से पूरे गांव के लोगों का पेट भर गया, लेकिन भोजन खत्म नहीं हुआ।
# # # 3. भैरवनाथ की जिद
जब उस कन्या ने भैरवनाथ को भोजन परोसना चाहा, तो भैरवनाथ ने कहा, "मैं यह साधारण भोजन नहीं खाऊंगा। मुझे मांस और मदिरा चाहिए।"
कन्या ने शांत भाव से उत्तर दिया, "यह एक ब्राह्मण का घर है, यहाँ केवल सात्विक भोजन ही मिलेगा।"
भैरवनाथ अपने तंत्र बल से जान गया था कि यह कोई साधारण कन्या नहीं है, बल्कि साक्षात आदिशक्ति है। वह उस कन्या को अपनी शक्तियों से वश में करने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन माता ने (जो कन्या रूप में थीं) वहीं से पवन का रूप धारण किया और **त्रिकुटा पर्वत** की ओर उड़ गईं।
# # # 4. गुफा की यात्रा और भैरवनाथ का अंत
भैरवनाथ भी माता के पीछे-पीछे त्रिकुटा पर्वत की ओर भागा।
* रास्ते में माता जहाँ रुकीं और पीछे मुड़कर भैरवनाथ को देखा, उसे आज **'बाणगंगा'** और **'चरण पादुका'** के नाम से जाना जाता है।
* इसके बाद माता ने एक गुफा में प्रवेश किया, जहाँ उन्होंने नौ महीनों तक तपस्या की (जिसे आज **'अधकुंवारी' या 'गर्भजून' गुफा** कहा जाता है)।
जब भैरवनाथ उस गुफा के पास भी पहुंच गया, तो माता गुफा की दूसरी ओर से दीवार तोड़कर बाहर निकल गईं और पवित्र मुख्य गुफा में चली गईं। जब भैरवनाथ वहाँ भी नहीं माना, तो माता ने महाकाली का रूप धारण किया और अपने त्रिशूल से **भैरवनाथ का वध कर दिया**।
वध होते ही भैरवनाथ का सिर कटकर मुख्य गुफा से कुछ किलोमीटर दूर जाकर गिरा (जहाँ आज भैरव घाटी है)।
# # # 5. मुक्ति का वरदान
मरते समय भैरवनाथ को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने माता से क्षमा मांगी। माता दयालु हैं, उन्होंने भैरवनाथ को क्षमा करते हुए वरदान दिया:
> "जो भी भक्त मेरी यात्रा पर आएगा, उसकी यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाएगी, जब तक वह तुम्हारे (भैरवनाथ के) दर्शन नहीं करेगा।"
>
# # माता का पिंडी रूप
भैरवनाथ का वध करने के बाद माता वैष्णो देवी ने तीन पिंडियों (चट्टानों) का रूप धारण कर लिया और हमेशा के लिए उस पवित्र गुफा में अंतर्ध्यान हो गईं। ये तीन पिंडियाँ माता के तीन रूपों को दर्शाती हैं:
1. **महाकाली** (दाहिनी ओर - शक्ति और संहार की देवी)
2. **महालक्ष्मी** (मध्य में - धन और समृद्धि की देवी)
3. **महासरस्वती** (बाईं ओर - ज्ञान और बुद्धि की देवी)
बाद में माता ने अपने परम भक्त श्रीधर को सपने में आकर इस पवित्र गुफा का मार्ग दिखाया। श्रीधर ने ही सबसे पहले इस गुफा को खोजा और माता की पूजा शुरू की। तब से लेकर आज तक लाखों भक्त माता के दर्शन के लिए कटरा आते हैं।
**बोल सांचे दरबार की जय!**
30/06/2026
**हनुमान गढ़ी**, अयोध्या का वह पावन धाम है जहां बजरंगबली साक्षात सुल्तान के रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि अयोध्या आने वाले हर श्रद्धालु को श्री राम के दर्शन करने से पहले हनुमान गढ़ी आकर हनुमान जी से आज्ञा लेनी होती है।
इस मंदिर और यहां के हनुमान जी की कथा बेहद दिव्य और रोचक है:
# # # 1. लंका विजय और अयोध्या वापसी की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान श्री राम लंका पर विजय प्राप्त करके माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौटे, तो उनके साथ परम भक्त हनुमान जी भी आए। श्री राम के राज्याभिषेक के बाद जब सभी देवताओं और वानर सेना को विदा करने का समय आया, तो हनुमान जी ने प्रभु श्री राम के चरणों में ही रहने की इच्छा जताई। वे अयोध्या छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते थे।
# # # 2. राम जी का वरदान और 'गढ़ी' का निर्माण
हनुमान जी की अगाध भक्ति को देखकर भगवान श्री राम ने उन्हें अयोध्या में ही रहने के लिए एक ऊंचा टीला (स्थान) दे दिया, जिसे आज **हनुमान गढ़ी** कहा जाता है।
श्री राम ने हनुमान जी को वरदान दिया:
> *"जो भी भक्त अयोध्या आएगा, वह पहले तुम्हारा दर्शन और पूजन करेगा। तुम्हारी आज्ञा लेकर ही उसे मेरे दर्शनों का पुण्य प्राप्त होगा।"*
>
भगवान राम ने हनुमान जी को अयोध्या का **'कोतवाल' (रक्षक)** घोषित किया। तब से यह माना जाता है कि हनुमान जी इस ऊंचे टीले पर बैठकर पूरी अयोध्या नगरी की रक्षा करते हैं।
# # # 3. सुल्तान और राजा के रूप में हनुमान जी
हनुमान गढ़ी में हनुमान जी एक योद्धा और राजा के रूप में पूजे जाते हैं। यहां स्थापित मुख्य प्रतिमा बहुत विशाल नहीं है, बल्कि लगभग 6 इंच की है जो हमेशा फूलों और भव्य श्रृंगार से ढकी रहती है।
* **माता अंजनी की गोद में बालक हनुमान:** मुख्य गुफा के भीतर माता अंजनी की एक प्रतिमा है, जिनकी गोद में बाल रूप में हनुमान जी बैठे हैं।
* **76 सीढ़ियों का सफर:** मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह मंदिर एक किले (गढ़) की तरह दिखाई देता है, इसलिए इसका नाम 'हनुमान गढ़ी' पड़ा।
# # # 4. एक ऐतिहासिक और चमत्कारी प्रसंग
इस मंदिर से जुड़ी एक और लोककथा अवध के नवाब **मंसूर अली (सफदरजंग)** के समय की है। कहा जाता है कि एक बार नवाब का इकलौता बेटा गंभीर रूप से बीमार हो गया और हकीमों ने हाथ खड़े कर दिए। तब किसी ने नवाब को हनुमान गढ़ी के संत अभयाराम दास जी के पास जाने की सलाह दी।
संत के आशीर्वाद और हनुमान जी की कृपा से नवाब का पुत्र पूरी तरह ठीक हो गया। इस चमत्कार से प्रभावित होकर नवाब ने हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और मंदिर के नाम कई एकड़ भूमि दान की। यही कारण है कि इस मंदिर को सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी माना जाता है।
> **संक्षेप में:** हनुमान गढ़ी की कथा हमें सिखाती है कि जहां निश्छल भक्ति होती है, वहां भगवान स्वयं अपने भक्त को अपने से भी ऊंचा स्थान दे देते हैं। आज भी अयोध्या के राजा भले ही श्री राम हों, लेकिन वहां की व्यवस्था और रक्षा का जिम्मा उनके परम भक्त हनुमान जी के हाथों में ही है।
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**जय पवनपुत्र हनुमान!**
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**जगन्नाथ स्नान पूर्णिमा** (जिसे देवस्नान पूर्णिमा भी कहा जाता है) सनातन धर्म और विशेषकर उड़ीसा की संस्कृति में एक बेहद महत्वपूर्ण उत्सव है। यह ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के प्रकट होने और उनके बीमार पड़ने की कथा इससे गहराई से जुड़ी है।
यहाँ स्नान पूर्णिमा की पौराणिक और लोक कथा दी गई है:
# # # 1. महाप्रभु जगन्नाथ का प्राकट्य (पौराणिक संदर्भ)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियों का निर्माण करवाया, तो ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्म जी ने इन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की थी।
चूंकि इसी दिन भगवान का साकार रूप धरती पर प्रकट हुआ था, इसलिए इस दिन को **श्री जगन्नाथ जी का जन्मदिन** भी माना जाता है। राजा इंद्रद्युम्न ने पहली बार इसी दिन भगवान का भव्य जलाभिषेक (स्नान यात्रा) करवाया था, जो तब से आज तक एक परंपरा बन चुका है।
# # # 2. भक्त गणाधिपति की कथा (गजवेश का रहस्य)
स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ को **'गजवेश' (हाथी का रूप)** धारण कराया जाता है। इसके पीछे एक बेहद सुंदर कथा है:
मराठा काल में 'गणाधिपति' नाम के एक परम गणेश भक्त थे। वे शास्त्रों के प्रकांड विद्वान थे। जब वे पुरी आए, तो उस दिन स्नान पूर्णिमा का उत्सव चल रहा था। वहां लोगों ने उनसे कहा कि वे वेदी पर जाकर साक्षात पूर्ण ब्रह्म के दर्शन करें।
गणाधिपति ने जब वेदी पर देखा, तो उन्हें जगन्नाथ जी के रूप में भगवान गणेश के दर्शन नहीं हुए। वे निराश हो गए क्योंकि वे भगवान को केवल गणेश रूप में ही देखना चाहते थे। वे मंदिर से लौटने लगे।
> अपने भक्त को निराश देखकर महाप्रभु जगन्नाथ ने मंदिर के मुख्य पुजारी को स्वप्न में आदेश दिया कि वे गणाधिपति को वापस बुलाएं। जब गणाधिपति वापस आए, तो भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने उन्हें **गणेश जी (हाथी) के रूप में दर्शन दिए**।
>
तभी से स्नान पूर्णिमा के दिन शाम को भगवान को 'गजवेश' पहनाया जाता है, जिसे **'हाथी वेष'** भी कहते हैं।
# # # 3. भगवान का बीमार पड़ना (अनाससर काल)
स्नान पूर्णिमा से जुड़ी सबसे रोचक बात यह है कि इस उत्सव के ठीक बाद भगवान बीमार पड़ जाते हैं।
* **108 घड़ों से स्नान:** स्नान पूर्णिमा के दिन जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और सुभद्रा जी को रत्नवेदी से उतारकर स्नान मंडप में लाया जाता है। वहां कुएं (सुना कुआं) के **108 घड़ों के सुवासित जल** से उनका भव्य स्नान कराया जाता है।
* **भगवान को बुखार आना:** अत्यधिक स्नान करने के कारण भगवान को तेज बुखार आ जाता है। वे बीमार पड़ जाते हैं।
* **15 दिनों का एकांतवास (अनाससर):** बीमार होने के कारण भगवान को अगले 15 दिनों के लिए एक विशेष कक्ष में रखा जाता है, जिसे **'अनाससर घर'** कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के कपाट आम जनता के लिए बंद हो जाते हैं और भगवान को कोई भारी भोग नहीं लगाया जाता। केवल जड़ी-बूटियों, काढ़े और फलों के रस का भोग लगाया जाता है।
* **नवयौवन दर्शन और रथयात्रा:** 15 दिनों के उपचार के बाद भगवान पूरी तरह स्वस्थ होते हैं, जिसे 'नवयौवन दर्शन' कहा जाता है। इसके ठीक अगले दिन (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) महाप्रभु अपने भक्तों से मिलने के लिए प्रसिद्ध **रथयात्रा** पर निकलते हैं।
**महत्व:**
यह कथा और परंपरा यह दर्शाती है कि भगवान जगन्नाथ केवल एक मूर्ति नहीं हैं, बल्कि वे एक जीवित मानवीय लीला करते हैं। वे इंसानों की तरह स्नान करते हैं, बीमार पड़ते हैं, दवा लेते हैं और ठीक होकर अपने भक्तों के बीच आते हैं।
यह कथा सृष्टि के आरंभ काल की है, जब ब्रह्मांड अपने प्रारंभिक स्वरूप में था और त्रिदेव व त्रिदेवी अपने दायित्वों को समझ रहे थे। यह कहानी है **अहंकार के नाश, ज्ञान की खोज और परम सत्य की।**
# # कथा: जब ब्रह्मा जी को हुआ अपनी रचना पर अभिमान
एक बार की बात है, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के मन में यह विचार आया कि इस अनंत संसार का निर्माण उन्होंने ही किया है। वे ही समस्त जीवों के जन्मदाता हैं। इस विचार ने धीरे-धीरे एक सूक्ष्म अहंकार का रूप ले लिया। उन्हें लगने लगा कि उनके बिना इस पूरी सृष्टि का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
भगवान विष्णु, जो क्षीर सागर में माता महालक्ष्मी के साथ शेषनाग पर विराजमान थे, अपनी योगनिद्रा से ब्रह्मा जी के इस बदलते भाव को जान गए। भगवान विष्णु ने सोचा कि यदि समय रहते ब्रह्मा जी का यह अहंकार दूर नहीं किया गया, तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता है।
# # # क्षीर सागर में आगमन
अपने इसी अभिमान में चूर होकर ब्रह्मा जी एक दिन भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी से मिलने क्षीर सागर पहुंचे।
वहां पहुंचकर ब्रह्मा जी ने गर्व से कहा, *"हे नारायण! देखिए, मैंने कितनी सुंदर और विशाल सृष्टि की रचना की है। मेरी बनाई इस दुनिया में हर जीव नियम से बंधा है। क्या आपको नहीं लगता कि मेरी यह कला अद्वितीय है?"*
भगवान विष्णु मुस्कुराए, लेकिन वे कुछ बोलते, उससे पहले ही माता महालक्ष्मी ने बात को भांप लिया। महालक्ष्मी जी (जो स्वयं धन, ऐश्वर्य और बुद्धि की देवी हैं) ने मुस्कुराते हुए कहा:
> "हे ब्रह्मा देव! आपकी रचना निसंदेह अद्भुत है। परंतु क्या आप सचमुच मानते हैं कि इस अनंत ब्रह्मांड में केवल यही एक सृष्टि है जिसे आपने बनाया है? और क्या आप इसके हर रहस्य को जानते हैं?"
>
ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों से हंसते हुए कहा, *"देवी, मेरे अलावा और कौन सृजन कर सकता है? मैं ही आदि हूँ और मैं ही इस सृष्टि का अंत जानता हूँ।"*
# # नारायण की लीला और महालक्ष्मी का प्रश्न
भगवान विष्णु ने तब अपनी माया का एक छोटा सा अंश प्रकट किया। उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा, *"ब्रह्मा जी, आपकी जिज्ञासा और सामर्थ्य को परखने के लिए, क्या आप महालक्ष्मी द्वारा पूछे गए एक सीधे से प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं?"*
महालक्ष्मी जी ने अपने हाथ में एक चमकता हुआ **दिव्य कमल का फूल** लिया। उन्होंने उस कमल के एक छोटे से बीज को निकालकर ब्रह्मा जी के सामने रखा और पूछा:
*"हे विधाता, आप तो सर्वज्ञाता हैं। जरा अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर बताइए कि इस सूक्ष्म बीज के भीतर इस समय क्या चल रहा है और इसका भविष्य क्या है?"*
ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों की आंखों से उस बीज को ध्यान से देखा। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, परंतु उन्हें उस बीज के भीतर केवल अंधकार और एक छोटा सा बिंदु दिखाई दिया। वे उसके पार नहीं देख पा रहे थे।
# # अहंकार का भंग
जैसे ही ब्रह्मा जी उस बीज की थाह पाने में असफल हुए, भगवान विष्णु ने अपनी माया का पर्दा हटाया। अचानक ब्रह्मा जी को उस एक छोटे से बीज के भीतर **करोड़ों अन्य ब्रह्मांड** दिखाई देने लगे!
* उन ब्रह्मांडों में करोड़ों अन्य ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे।
* करोड़ों विष्णु जी पालन कर रहे थे।
* करोड़ों शिव जी लय कर रहे थे।
यह दृश्य देखकर ब्रह्मा जी का सिर चकरा गया। उन्हें समझ आ गया कि जिस सृष्टि को वे अपनी एकमात्र रचना समझ रहे थे, वह तो उस परमेश्वर (नारायण) की अनंत माया का एक अत्यंत छोटा सा हिस्सा मात्र है।
ब्रह्मा जी का अहंकार पूरी तरह से टूट गया। वे तुरंत भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के चरणों में झुक गए और बोले:
> "हे प्रभु! हे माता! मुझे क्षमा करें। मैं अपनी रचना के गर्व में अंधा हो गया था। मैं भूल गया था कि मैं तो केवल एक माध्यम हूँ। वास्तविक ऊर्जा और शक्ति तो आप दोनों की कृपा से ही प्रवाहित होती है। महालक्ष्मी के बिना तो मेरी रचना में कोई श्री (सुंदरता और समृद्धि) ही नहीं होती।"
>
# # # कथा की सीख
भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को उठाकर गले से लगाया और माता महालक्ष्मी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
* **सीख:** यह कथा हमें सिखाती है कि ज्ञान और शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, **अहंकार** हमेशा पतन का कारण बनता है। इस अनंत ब्रह्मांड में हम बहुत छोटे हैं; इसलिए सदैव विनम्र रहना चाहिए और अपनी योग्यताओं को ईश्वर की कृपा मानना चाहिए।
26/06/2026
प्रेम से बोलिए जय माता दी 🌹🙏🌹
निर्जला एकादशी व्रत कि हार्दिक शुभकामनाएं।जय श्री हरि 🌹🌹🙏🌹🌹
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