Dr Ganesh K Meena
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17/08/2026
जीन चॉल ( jeane chall) अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में शैक्षिक मनोवैज्ञानिक ( education psychologist)थी। उनके समय में अमेरिका में काफी बच्चों का ठीक से पढ़ना नहीं सीख पाना एक राष्ट्रव्यापी चिंतन का मुद्दा था। इस बहस का जवाब उन्होंने पुस्तक लर्निंग टू रीड : द ग्रेट डिबेट से दिया। 1983 में उनकी पुस्तक स्टेजेस ऑफ रीडिंग डेवलपमेंट ( stages of reading development) में उन्होंने छोटे बच्चों के पढ़ना सीखने की प्रक्रिया को पांच स्टेजेज में बांटा। उनके अनुसार पहली स्टेज ( जन्म से छ साल की उम्र ) में बच्चे हजारों शब्दों को समझते हैं लेकिन उनमें से सिर्फ कुछ को ही पढ़ सकते हैं। इस पहली स्टेज को उन्होंने प्री रीडिंग का नाम दिया। आमतौर पर बच्चे 6 साल की उम्र के बाद ही पढ़ना सीखते हैं। जीन चॉल की इस थ्योरी के आधार पर दुनिया भर के विकसित देशों ने बच्चों के स्कूल एडमिशन की उम्र 6 साल या इससे ज्यादा कर दी। यूरोप और अमेरिका के ज्यादातर देशों में स्कूल एडमिशन की उम्र छह साल या ज्यादा है। भारत सरकार ने भी 2020 में अपनी नई शिक्षा नीति में जीन चॉल का अनुसरण करते हुए स्कूल एडमिशन की न्यूनतम उम्र बढ़ा कर छह साल कर दी है।
फिर भी कुछ पेरेंट्स तीन चार साल के बच्चों को स्कूल भेज देते हैं और एक साल बाद शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा पढ़ना नहीं सीख रहा। मुझे लगभग हर महीने ऐसे एक दो पेरेंट्स मिल जाते हैं जो अपने पांच छः साल के बच्चे को ओपीडी में ले कर आते हैं कि हमने बहुत महंगे स्कूल में डाला है और साल भर ज्यादा हो गया लेकिन इसे कुछ नहीं आता। किताब पढ़ना भी नहीं सीख पाया , स्कूल से भी शिकायत आती है। बच्चों के साइकोलॉजिकल डेवलपमेंट में थोड़ी भिन्नता होती है और दो चार प्रतिशत बच्चे थोड़ा जल्दी भी पढ़ना लिखना सीख सकते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस के दुनिया के सबसे बड़े डाटाबेस पबमेड पर ऐसे हजारों रिसर्च आर्टिकल मिल जायेंगे जो बताते हैं कि ये थोड़ी सी एडवांटेज 3-4 क्लास तक जा कर खत्म हो जाती है और जिन बच्चों को छह साल से पहले स्कूल भेजा जाता है वो अंत में कमजोर आत्मविश्वास, रचनात्मकता की कमी और अंत में पढ़ाई लिखाई में उन बच्चों से कमजोर साबित होते हैं छ साल के बाद स्कूल गये। डेवलपमेंटल साइकोलॉजी में इसको फेड आउट इफेक्ट ( fade out effect) बोलते हैं।
इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि छ साल से छोटे बच्चे सीख नहीं सकते। बल्कि ये उम्र सीखने के लिहाज से बहुत ही अच्छी है लेकिन इस उम्र में बच्चों के कॉग्निटिव विकास के लिए प्ले बेस्ड लर्निंग ही काम आती है न कि किताब कॉपी और ब्लैक बोर्ड। इस उम्र में दिन के 2-3 घंटों के लिए बच्चों को किसी बढ़िया प्ले स्कूल भेजा जा सकता है जहाँ अलग अलग तरह की एक्टिविटी और खेल होते हों।
तो निष्कर्ष ये है कि बच्चों को छह साल से पहले या मुमकिन हो तो सात साल की उम्र से पहले फॉर्मल एजुकेशन में न डालें। ये बच्चों के ओवरऑल डेवलपमेंट और एकेडमिक अचीवमेंट्स के लिए नुकसानदायक है। 3-6 साल तक के बच्चों को स्टोरी सुनाइए उनके साथ खेलिए , उन्हें दूसरे बच्चों के साथ खेलने दीजिए , वे इसी तरह से सीखते हैं। विषय की ज्यादा जानकारी पब्मेड सर्च कर सकते हैं या नीचे दिए आर्टिकल्स पढ़ सकते हैं। बच्चों को पढ़ाई लिखाई की किसी भी प्रकार की समस्या के लिए नजदीकी मनोचिकित्सक से मिल सकते हैं| नीचे जीन चॉल की स्टेजेस ऑफ रीडिंग डेवलपमेंट...
किसी ने फोन किया कि किसी रिश्तेदार को कुछ मानसिक समस्या है,एक महीने बाद शादी है, दिखाना चाहते हैं | मेने कहा कि मानसिक बीमारियों मे दवाओं का असर आने मे पंद्रह दिन से एक डेढ़ महीने का टाइम लगता है, आप रविवार को दिखा लेना| उनको शायद जल्दी ठीक होने की उम्मीद रही होगी तो नही आए |
मानसिक समस्याओं का इलाज शारीरिक बीमारियों की तरह नही होता | शारीरिक बीमारियों के दवाओं की फिक्स डोज और एक दो हफ्तों की कुछ अवधि का कोर्स होता है | जैसे बुखार के लिए वयस्कों के लिए पेरासीटामोल की 500 मिली ग्राम की डोज होती है| एंटीबाओटिक्स अक्सर हफ्ते भर का कोर्स होता है |
मानसिक समस्याओं मे दवाइयों की कोई फिक्स डोज नही होती | बल्कि न्यूनतम प्रभावशाली डोज से अधिकतम लाइसेन्स डोज की एक रेंज होती है | उदाहरण के लिए डिप्रेशन की दवाई फ़्लूऑक्सेटिन ( fluoxetine) की न्यूनतम प्रभावशाली डोज 20 मिली ग्राम और अधिकतम लाइसेन्स डोज 80 मिली ग्राम है| ये दवाइयाँ न्यूनतम प्रभावशाली डोज से शुरू की जाती है और असर और साइड एफेक्ट्स देखते हुए हर 5 - 7 दिन मे इनकी डोज बढ़ाई जाती है | मतलब 20 मिली ग्राम से शुरू करके पहले 40 फिर 60 और उसके बाद लगभग 15 -20 दिन मे 80 मिली ग्राम तक पहुचा जाता है | मिर्गी के दौरों की दवाई लेवेटिरासीटेम (levetiracetam) वयस्कों मे 1000 मिली ग्राम प्रतिदिन से शुरू की जाती है और असर और साइड एफेक्ट के अनुसार 3000मिली ग्राम प्रतिदिन तक बढ़ाई जा सकती है | साइकिट्रिक या न्यूरोलॉजी की बीमारियों मे कोई एक दवा सिर्फ़ 40 - 50 प्रतिशत तक मरीजों पर असर करती है | बाकी मरीजों के लिए दवाई बदलनी पड़ेगी | अंतरराष्ट्रीय गाइड्लाइन्स के अनुसार दवाई बदलने से पहले पंद्रह दिन से डेढ़ महीने का इंतेजार करना चाहिए | तो दुनिया को कोई भी डॉक्टर किसी
मानसिक समस्या को हफ्ते दो हफ्ते मे ठीक नही कर सकता | उसे दो अलग अलग दवाइयों के पर्याप्त ट्रायल के लिए कम से कम एक से दो महीने का समय चाहिए| मानसिक बीमारियों को एक हफ्ते मे ठीक करने की ज़िद का अंतिम नतीजा ये होता है कि मनो चिकित्सक पहली विज़िट पर ही एक से ज़्यादा दवाइयों की उच्च मात्रा लिखते हैं जिसे खा कर मरीज दिन भर सोता रहता है | आर्थिक नुकसान और गंभीर शारीरिक साइड एफेक्ट्स के अलावा कई सारी दवाइयाँ एक साथ स्टार्ट करने का नुकसान ये भी होता है कि अगर महीने भर दवाई खा कर मरीज ठीक भी हो गया तो ये पता नही किया जा सकता कि किस दवाई के असर से ठीक हुआ है और किस दवाई को बंद किया जाए तथा किस दवाई को आगे चालू रखा जाए | मानसिक बीमारियों मे दवाइयों को जिस तरह धीरे धीरे स्टार्ट किया जाता है उसी तरह धीरे धीरे ही बंद भी किया जाता है | अचानक से बंद करने पर पूर्ववर्ती लक्षणों के फिर से उभर आने का रिस्क रहता है | तो मरीज पत्ते भर भर का दवाइयाँ महीनो या सालों खाते रहते हैं और जैसे ही बंद करने की कोशिश करते हैं उनकी तबीयत फिर से खराब हो जाती है | याद रखिए मानसिक समस्याओं के इलाज के लिए 90 प्रतिशत से ज़्यादा मरीजों को अक्सर एक गोली ही काफ़ी होती है | पर इसके लिए मरीजों को भी समझदारी और धैर्य का परिचय देना पड़ेगा |
कुछ महीनो पहले एक 30 साल के लगभग उम्र का व्यक्ति ओ पी डी मे आया | समस्या पूछने पर बताया कि तीन साल पहले शादी हुई थी लेकिन अभी तक पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नही बना पाया | सेक्स की इच्छा नॉर्मल है | प्राइवेट पार्ट मे तनाव भी आता है लेकिन जैसे ही संबंध बनाने की कोशिश करता हूँ तो बहुत तेज घबराहट बैचेनी होने लगती है | दिल तेज़ी से धक धक करने लगता है | और ऐसा लगता है जैसे दिल का दौरा आ जाएगा | नतिजन कुछ महीनो पहले पत्नी ने तलाक़ ले लिया | मेने दवाई लिख कर दो हफ्ते बाद आने के लिए बुलाया | पंद्रह दिन बाद आ कर बोला कि डॉ साब कोई फ़ायदा नही हुआ | दवाई की डोज़ बढ़ा कर फिर पंद्रह दिन बाद आने को बोला | पंद्रह दिन बाद वो अपने बहनोई के साथ आया | और बताया कि उसने किसी महिला के साथ संबंध बनाया और इस बार कोई दिक्कत नही हुई| उसके जीजाजी ने बताया कि इसकी शादी टूट गई | और जब तक पत्नी ने तलाक़ के लिए आवेदन नही किया तब तक परिवार मे किसी को पता भी नही चला कि इसके साथ ऐसी कोई समस्या है | अगर हमें पहले पता होता तो पहले अस्पताल ले आते और ये नोबत ना आती |
मेडिकल लिटरेचर के हिसाब से लगभग 20 प्रतिशत भारतीय पुरुषों को किसी न किसी प्रकार की सेक्स संबंधी समस्या है | मतलब हर पाँचवे पुरुष को | लेकिन समाज मे सेक्स के बारे मे निषेधात्मक धारणा की वजह से लोग अपनी समस्याओं के बारे मे बात नही कर पाते | अगर कोई हिम्मत जुटाता तो ज़्यादातर लोगों को पता भी नही है कि किसको दिखाया जाए | ज़्यादातर लोग झोला छाप लोगों के पास जाते है जो उन्हे बेमतलब का डर दिखा कर लूटते हैं | मेरे पास आने वाले सभी मरीजों से मे पूछता हूँ कि कितने दिन से समस्या है ? अब से पहले कहीं दिखाया है ? कितने पैसे खर्च कर चुके हो ? लगभग सभी मरीज एक से पाँच साल की समस्या के बाद हॉस्पिटल पहुचते हैं और 50 हज़ार से ले कर दो लाख तक रुपये खर्च कर चुके होते हैं |
लगभग सभी लोग आर्थिक नुकसान के अलावा पारिवारिक झगड़ों , अवसाद आदि का भी शिकार होते हैं | आजकल तलाक़ के मामलों मे बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है जिसका एक बड़ा कारण सेक्स संबंधी समस्याएँ भी है |
पुरुषों की सेक्स संबंधी समस्याओं को तीन प्रकार के स्पेशलिस्ट देखते हैं | अगर टेस्टोस्टेरॉन की कमी जैसी हॉर्मोन संबंधी समस्या हो तो उसे endocrinologist द्वारा देखा जाता है | अंडकोष या प्राइवेट पार्ट मे कुछ संरचनागत समस्या है तो उसे यूरोलॉजिस्ट द्वारा ठीक किया जाएगा | युवा पुरुषों मे सेक्स संबंधी समस्याओं के 90 प्रतिशत तक मामले साइको लॉजिकल होते है जिन्हे साइकिट्रिस्ट या मनो चिकित्सक द्वारा देखा जाता है |
पुरुषों की सेक्स संबंधी समस्याओं को मोटे तौर पर 4 कटेगरी मे बाँटा जा सकता है |
1 . सेक्स की इच्छा मे कमी ( Hypoactive sexual desire) - आमतौर पर शादीशुदा जोड़े औसतन हफ्ते मे दो बार संबंध बनाते है | पर लगभग 15 प्रतिशत तक पुरुषों मे सेक्स की इच्छा मे कमी पाई जाती है | और संबंध बनाने मे हफ्तों तक का अंतराल आ जाता है |
2. शीघ्रपतन (Premature ejeculation)- ये सबसे ज़्यादा प्रचलित सेक्स समस्या है | लगभग 45 प्रतिशत भारतीय पुरुष शिघ्रपतन की समस्या से ग्रस्त है | मतलब हर दूसरा भारतीय |
3. प्राइवेट पार्ट मे तनाव नही आना (Erectile dysfunction)- लगभग 10 प्रतिशत भारतीय युवा इस समस्या से ग्रस्त है |
4. सेक्स मे प्लेजर फील नही होना (Anorgasmia)- आमतौर पर ये समस्या स्त्रियों मे ज़्यादा पाई जाती है | लेकिन कुछ पुरुष भी सेक्स के दौरान कुछ भी फील नही होने की शिकायत करते हैं |
सेक्स संबंधी समस्याएँ बहुत सी परिवारिक , सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है | तलाक़ , विवाहेतर संबंध , परिवार मे लड़ाई झगड़ों की एक बड़ी वजह सेक्स संबंधी समस्याएँ है | कई मामलों मे ये गंभीर अपराधों को भी जन्म देते है | ज़्यादातर लोग बिना अपनी बीमारी को समझे दवाई की दुकान पर जा कर sildenafil नाम की दवाई खाते रहते हैं जो 50 साल से उपर के लोगों मे तनाव नही आने की समस्या के लिए दी जाती है और जिसको रेगुलर खाने से गंभीर दिल संबंधित साइड एफेक्ट हो सकते हैं | कुछ लोग शीघ्र पतन की समस्या के लिए स्मेक जैसे नशों की राह पकड़ लेते हैं जो दीर्घकालीन दुष्परिणाम ले कर आता है |
अपनी सेक्स लाइफ मे किसी भी तरह की समस्या होने पर प्रॉपर निदान और उचित इलाज के लिए नज़दीकी मनो चिकित्सक से संपर्क करें |
ब्रिटेन और अमेरिका से लौटे चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग बताते हैं कि अमेरिका में स्पेशलिस्ट डॉक्टर के अपॉइंटमेंट के लिए एक महीने तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस की हालत और ज्यादा खराब है। ब्रिटेन में जनरल फिजिशियन को दिखाने का टाइम ही तीन हफ्ते तक खिंच रहा है। यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर जानलेवा बीमारी के संदिग्ध मरीजों के जल्दी diagnosis के लिए सरकार को 28 दिन की appointment की मियाद तय करनी पडी है। डॉक्टरों की भारी कमी से जूझते ब्रिटेन ने अपॉइंटमेंट का टाइम घटाने के लिए भारत से दो साल पहले तीन हजार डॉक्टरों की मांग की थी।
कई लोगों के अनुभव और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर में ये दावे के साथ कह सकता हूं कि भारत का स्वास्थ्य तंत्र अमेरिका और यूरोप के कई देशों से बेहतर है। हमारे यहां कार्डियोलोजी, न्यूरोलॉजी जैसे किसी भी स्पेशलिस्ट का अपॉइंटमेंट उसी दिन मिल जाता है। यह बात भी कई मीडिया रिपोर्ट्स से जाहिर है कि भारतीय डॉक्टरों का निदान और ट्रीटमेंट भी अमेरिका और यूरोप से बेहतर और 80 प्रतिशत तक सस्ता है। मतलब जो सर्जरी अमेरिका में एक लाख में होगी वो भारत में बीस हजार में हो जाएगी।
भारत मेडिकल टूरिज्म का बड़ा केंद्र है।2022 में दुनियाभर के 78 देशों से लगभग 20 लाख लोग भारत में इलाज के लिए आए। 2026 तक भारत में मेडिकल टूरिज्म से देश को 13 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की आय होने का अनुमान है।
सैद्धांतिक रूप से इतनी दुरुस्त स्वास्थ तंत्र के बावजूद भारत के खुद के नागरिकों का चिकित्सा क्षेत्र का अनुभव अच्छा नहीं है। ज्यादातर की शिकायत है कि डॉक्टर ठीक से नहीं देखते, महंगे टेस्ट और दवाईयां या बेमतलब के प्रोसिजर और सरकारी अस्पतालों में लंबी भीड़ के चलते गरीब आदमी की हैसियत से बाहर है।
मेरा मानना है कि पब्लिक अवेयरनेस या जागरूकता का अभाव इन बुरे अनुभवों का मुख्य कारण है। भारत के स्वास्थ तंत्र की थोड़ी सी जानकारी लंबी कतारों के अनुभव और डॉक्टरों द्वारा कम टाइम देने और महंगे खर्चे से बचा सकती है।
भारत की स्वास्थ व्यवस्था के तीन स्तर है। पहले स्तर पर है प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पहाड़ी क्षेत्रों में बीस हजार, ग्रामीण क्षेत्रों में तीस हजार और शहरी क्षेत्रों में पचास हजार की आबादी पर एक होता है। ग्रामीण क्षेत्र में पीएचसी पर एक MBBS चिकित्साधिकारी तैनात होता है। टीकाकरण अभियान , मलेरिया टीबी उन्मूलन जैसे कई राष्ट्रीय और राज्य सरकार के स्वास्थ कार्यक्रमों का संचालन पीएचसी से ही होता है। इसके अलावा प्रसव पूर्ण मातृत्व देखभाल की सुविधाएं पीएचसी पर उपलब्ध होती हैं। पीएचसी पर भारत सरकार द्वारा जारी की गई एसेंशियल ड्रग लिस्ट की सभी दवाईयां उपलब्ध होती है। इलाज की बात करें तो गांव की पीएचसी मुख्य काम प्राथमिक उपचार के बाद उच्च केंद्र पर रेफर करना है। जैसे एक्सीडेंट के गंभीर मामलों में खून बहने से रोकना और मरहम पट्टी के बाद फ्रैक्चर के लिए हड्डी रोग विशेषज्ञ को रेफर करना। भारत में 31 हजार से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है।
स्वास्थ तंत्र के दूसरे स्तर पर आते हैं कम्युनिटी हेल्थ सेंटर या सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, उप जिला अस्पताल और जिला अस्पताल। भारत में 6000 से ज्यादा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र , 771 जिला अस्पताल और 1242 उप जिला अस्पताल है।सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर जनरल फिजिशियन, सर्जन, गाइनेकोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिशियन या शिशु रोग विशेषज्ञ होते हैं। यहां सभी छोटे मोटे ऑपरेशन, नॉर्मल डिलीवरी बच्चों की बीमारियों के इलाज की व्यवस्था होती हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर 30 बेड होते हैं और गंभीर मरीजों के लिए भर्ती की भी व्यवस्था होती है। मेरे गांव के पास नादौती, गुढ़ा चंद्र जी, वजीरपुर, पीलोदा और खण्डिप सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं।
उप जिला अस्पताल और जिला अस्पताल में न्यूरोलॉजी कार्डियोलोजी आदि सुपरस्पेशलिटी को छोड़ कर सभी तरह के स्पेशलिस्ट जैसे फिजिशियन, सर्जन, गाइनेकोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन, स्किन स्पेशलिस्ट, हड्डी रोग विशेषज्ञ, मनोरोग विशेषज्ञ, नाक कान गला विशेषज्ञ, आंखों के स्पेशलिस्ट की सेवाएं उपलब्ध होती है। उप जिला अस्पताल में 31 से 100 तक बेड होते हैं और जिला अस्पताल में 100 से 500 के बीच। यहां ज्यादातर जांचें और 24 घंटे इमरजेंसी सुविधा उपलब्ध होती है। सवाई माधोपुर, गंगापुर सिटी और करौली में जिला अस्पताल है, हिंडौन में उप जिला अस्पताल।
स्वास्थ तंत्र के तीसरे स्तर पर आते हैं मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल जेसे एम्स, सफदरजंग, SMS आदि। यहां सभी स्पेशलिटी और सुपर स्पेशलिटी के साथ 24 घंटे इमरजेंसी, 24 घंटे ऑपरेशन थियेटर, आईसीयू और 24 घंटे जांच की व्यवस्था होती है। मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल पर मरीजों के इलाज के अलावा, डॉक्टरों और नर्सों की ट्रेनिंग और रिसर्च सुविधाएं भी उपलब्ध होती हैं।
भारत के 95 प्रतिशत मरीजों का इलाज सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र और जिला अस्पताल पर हो जाएगा। मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल जाने की जरूरत मुश्किल से सिर्फ 5 प्रतिशत मरीजों को पड़ेगी। लेकिन जागरूकता के अभाव में लोग या तो निजी अस्पताल जाते हैं या फिर सीधे मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल। मेरे गांव से इलाज के लिए शहर जाने वाले ज्यादातर लोग या तो गंगापुर के किसी निजी अस्पताल में दिखाएंगे या जयपुर जाएंगे। जब कि उनमें से ज्यादातर का इलाज नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर या गंगापुर सिटी के जिला अस्पताल में हो जाएगा। सीधे मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल जाने का परिणाम ये होता है कि SMS में खांसी बुखार जैसी छोटी मोटी बीमारी के मरीजों की भीड़ हो जाएगी और जानलेवा बीमारियों के मरीजों को लंबी लाइन का सामना करना पड़ेगा। कायदे से मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में बिना छोटे अस्पताल से रेफर किए बिना मरीज नहीं लिए जाने चाहिए। लेकिन ऐसी पॉलिसी बनाना मुश्किल होगा।
सीधे बड़े अस्पताल जाने के पीछे लोगों की ये धारणा भी हो सकती हैं कि बड़े अस्पताल में बड़े या ज्यादा अच्छे डॉक्टर होते होंगे। लेकिन ये सिर्फ गलतफहमी है। MBBS और MD आदि के पढ़ाई के लिए भारतीय चिकित्सा आयोग पूरे देश में यूनिफॉर्म पाठ्यक्रम रखता है। पूरे देश भर के मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टर एक जैसी ही किताबें पढ़ते हैं सेम दवाईयां है और सेम ही बीमारियां। जैसे मनोरोग विशेषज्ञ या फिजिशियन या सर्जन या किसी और स्पेशलिस्ट की बात करें तो एम्स दिल्ली और किसी भी सरकारी कॉलेज से पढ़े किसी डॉक्टर और गंगापुर के जिला अस्पताल पर तैनात डॉक्टर के ज्ञान, अनुभव,ट्रीटमेंट में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ेगा। मेरे विचार से किसी भी मरीज को सिर से पैर तक किसी भी बीमारी के इलाज के लिए पहला संपर्क सीएचसी या जिला अस्पताल पर होना चाहिए। इससे। SMS जैसे बड़े अस्पताल में अनावश्यक भीड़ कम होगी और सभी जरूरतमंद लोगों को बिना किसी संघर्ष के इलाज मिल पाएगा। में देश के सबसे बड़े अस्पताल में काम करता हूं और इसलिए जरूरत पड़ने पर अपने अस्पताल में ही कंसल्ट करता हूं। कभी गांव रहूंगा तो पीलोदा की सीएचसी या गंगापुर के जिला अस्पताल में ही कंसल्ट करूंगा। अगर सभी मरीज उस प्रक्रिया से चलें तो जनता को सभी बीमारियों का इलाज सुलभ होगा। चिकित्सा के मामले में जनता की मुसीबतों के लिए कुछ हद तक जनता खुद भी जिम्मेदार है।
गांव से अस्पताल जाने वाले आधे से ज्यादा लोगों की समस्या है कि सरदा नहीं रहती। थकान,सुस्ती सी रहती है । हाथ पैर या पूरा शरीर दुखता है।काम करने का मन नहीं करता। या कोई काम शुरू करते हैं तो पूरा नहीं कर पाते। उदासी या गुस्सा चिड़चिड़ापन भी हो सकते है। यही लोग बाबाओं के पास जाते हैं कि कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा। कुछ 2-4 प्रतिशत लोगों को छोड़ कर लगभग सभी मामलों में कारण है डिप्रेशन , थायरॉइड की बीमारी ( हाइपोथायरायडिज्म ) या पोषक तत्वों (विटामिन )की कमी। शाकाहारी लोगों में प्रोटीन और विटामिनों की कमी मुख्य है। प्रोटीन के लिए अंडा, दाल, चने, सोयाबीन इत्यादि अच्छे स्रोत है।
15 -49 साल की लगभग 60 प्रतिशत भारतीय स्त्रियों में खून की कमी ( iron deficiency anemia) है । ये थकान सुस्ती चिड़चिड़ापन का कारण हो सकता है l
विटामिनों में बी कॉम्प्लेक्स और विटामिन डी की कमी मुख्य है। विटामिन डी सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणों से मनुष्य शरीर में बनता है। खाद्य पदार्थों में मछली, अंडे और कुछ मशरूम के अलावा किसी में भी विटामिन डी नहीं होता। विटामिनों की कमी से गंभीर शारीरिक समस्याएं होती हैं।
विटामिन डी की कमी से थकान, बदन दर्द, आदि डिप्रेशन के सभी लक्षण आ जाते हैं। शरीर में विटामिन डी की जरूरत पूरी करने के लिए रोज लगभग 30 मिनट का सूरज की धूप में लगभग अर्धनग्न बैठना जरूरी है। आऊटडोर गतिविधियों में कमी की वजह से लगभग 70-90 प्रतिशत भारतीय आबादी में विटामिन डी की कमी है।
विटामिन बी पानी में घुलने वाला विटामिन है। गर्मियों में पसीने में निकल जाता है, तनावपूर्ण स्थिति में भी कमी हो जाती है। लगभग 75 प्रतिशत भारतीय आबादी में विटामिन बी 12 या methyl cobalamin की कमी है। विटामिन बी 12 की कमी से तीन तरह के लक्षण आते हैं। पहला है न्यूरोलॉजिकल लक्षण जैसे हाथ पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन आदि। दूसरा है साइकेट्रिक लक्षण जैसे उदासी, थकान , सुस्ती, घबराहट बैचेनी इत्यादि। तीसरे लक्षण है हिमेटोलॉजिक जैसे खून की कमी या एनीमिया। विटामिन बी 12 की कमी से होने वाले एनीमिया को मिगलों ब्लास्टिक एनीमिया कहा जाता है क्योंकि इसमें लाल रक्त कोशिकाओं का आकार सामान्य से बड़ा हो जाता है।
विटामिन बी 6 या पायरिडॉक्सिन की कमी से स्त्रियों में माहवारी के समय दर्द की गंभीरता एवं विचारों में नकारात्मकता आदि बढ़ जाती है।
विटामिन बी 5 या पेंटोथेनिक एसिड की कमी से कम उम्र में बाल सफेद होने लगते हैं।
विटामिन बी 7 या बायोटिन की कमी से कम उम्र में बाल झड़ने लगते हैं।
विटामिन डिफिशिएंसी के आर्थिक और सामाजिक परिणाम और भी गंभीर है।
अक्सर गांवों की सासें शिकायत करती हैं कि उनकी बहु बहुत धीरे काम करती हैं। दोपहर बाद खाना बना कर देती है। साफ सफाई भी ढंग से नहीं कर पाती। बहु बिना कुछ किए ही थकान महसूस करती है। मतलब रोज की गृह क्लेश। कारण खून की कमी या विटामिन बी 12 की कमी हो सकता है।
हमारे किसान मेहनत वाली फसल करना पसंद नहीं करते। पिछले साल मेरे गांव के लगभग सभी तालाबों में पानी रहा। चाहते तो ज्यादातर किसान सब्जी, खीरा, खरबूजा की तीसरी फसल ले सकते थे। लेकिन किसी ने प्रयास नहीं किया। गेहूं की फसल भी नहीं करना चाहते क्योंकि थोड़ी मेहनत है रखवाली या पानी देने में। दूसरी तरफ बिहार का आदमी हमारे ही खेतों में प्रति बीघा 20-25 हजार हमारे किसानों को देता है। जम कर मेहनत करता है और मुनाफा कमा कर अपनी घर ले जाता है। हमारे ज्यादातर लोगों से मेहनत का कोई काम नहीं होता। वो दिन भर पेड़ की छाया में बैठ कर पत्ते खेल सकते हैं। विटामिन बी 12 की कमी कारण हो सकता है।
हमारे युवा वर्ग में बहुत से लड़के दिन भर रेड बुल या कुछ एनर्जी ड्रिंक पीते रहते हैं। उनमें से ज्यादातर के चेहरे रूखे सूखे निस्तेज दिखते हैं। रेड बुल या दूसरे अन्य एनर्जी ड्रिंक में में कैफ़ीन नामक पदार्थ होता है जो कुछ समय के लिए थकान मिटाता है। युवाओं में एनर्जी ड्रिंक की लत विटामिन बी की कमी का परिणाम हो सकता है।
स्मैक की लत वाले कुछ युवाओं ने भी स्वीकार किया कि उन्हें थकान सुस्ती सी रहती थी फिर किसी दोस्त ने स्मैक ऑफर की और थकान मिटाने के लिए कुछ दिनों पीने के बाद उन्हें लत लग गई।
कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कुछ युवा याद नहीं रहने या पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में समस्या का सामना करते हैं। ये भी डिप्रेशन या विटामिन बी की कमी का नतीजा हो सकता है।
अक्सर कुछ महिलाएं दिन भर गुस्सा, चिड़चिड़ापन का शिकार होती है जिसकी वजह से पति से या सास ससुर से बार बार लड़ाई झगड़ा या गृह क्लेश रहता है। कई बार परिवार तक टूट जाते हैं l इन महिलाओं को डिप्रेशन, हाइपोथायरायडिज्म , या विटामिन डिफिशिएंसी हो सकती है।
उपरोक्त में से कोई भी समस्या होने पर नजदीकी मनोचिकित्सक से संपर्क करें
Dr Ganesh Kumar Meena
MBBS MD
Neuropsychiatrist
AIIMS New Delhi
कुछ महीने पहले ससुर जी को बुखार खांसी हुई तो एटर्नल हॉस्पिटल में दिखाया। सीटी स्कैन में कैंसर की 15 सेंटीमीटर बड़ी गांठ बताई। बाद में दूसरे सेंटर से सीटी स्कैन रिपीट करवाया तो ऐसा कुछ नहीं मिला। पिछले महीने ही MBBS के एक साथी की अचानक से दिल की धड़कन बढ़ गई। उसने भी एटर्नल हॉस्पिटल में दिखाया तो बोले कि ज्यादा गंभीर समस्या नहीं है। बाद में दोबारा समस्या होने पर साइंस में दिखाया तो पता चला जानलेवा समस्या थी। किस्मत अच्छी थी जो बच गया। फिर दिल में इंप्लांट डाला गया। जयपुर के सभी बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल न सिर्फ हद से ज्यादा पैसा वसूलते है बल्कि काफी मामलों में गलत डायग्नोसिस ओर गलत इलाज भी करते हैं। जबकि पूरा पूर्वी राजस्थान इलाज के लिए जयपुर भागता है। जबकि दिल्ली के सरकारी अस्पताल जयपुर के इन कॉर्पोरेट लुटेरों से बेहतर डायग्नोसिस ओर विश्व स्तरीय इलाज लगभग मुफ्त में करते हैं।
नीचे बीमारी के हिसाब से दिल्ली के उन सरकारी अस्पतालों के बारे में जानकारी है जो लगभग मुफ्त में विश्व स्तरीय इलाज सुविधाएं प्रदान करते हैं -
1. Institute of liver and biliary sciences ( या शॉर्ट में ILBS ) -
दिल्ली के वसंत कुंज में स्थित ILBS लिवर ट्रांसप्लांट से लेकर पेट की सभी बीमारियों के लिए विश्व स्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाता है। दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का ड्रीम प्रोजेक्ट ये हॉस्पिटल दिल्ली सरकार के अधीन है और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के मॉडल पर संचालित होने की वजह से यहां इलाज फ्री तो नहीं है लेकिन कॉर्पोरेट से काफी सस्ता है। इसके डायरेक्टर डॉ एस के सरीन देश के नम्बर एक लिवर एवं पेट रोग स्पेशलिस्ट है। यहां भीड़ न के बराबर है और बिना लाइन में लगे नंबर आ जाता है
2. कलावती सरन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल -
केंद्र सरकार के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के अधीन ये हॉस्पिटल कनॉट प्लेस के पास स्थित है और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर है। यहां बच्चों की सभी बीमारियों का फ्री इलाज होता है। बच्चों के लिए कार्डियोलोजी आदि सभी सुपर स्पेशलिटी डिपार्टमेंट इस हॉस्पिटल में है और सभी ऑपरेशन भी होते हैं।
3. गोविंद बल्लभ पंत या जी बी पंत हॉस्पिटल -
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज से जुड़ा ये हॉस्पिटल दिल्ली सरकार के अधीन आता है। इसमें दिल, फेफड़े, पेट और मस्तिष्क की बीमारियों के सिर्फ 7 सुपर स्पेशलिटी डिपार्टमेंट है। कम डिपार्टमेंट होने की वजह से कम भीड़ है और आसानी से नंबर आ जाता है। लेकिन इसमें दिखाने के लिए किसी दूसरे अस्पताल से रेफरल जरूरी है। ये अस्पताल कार्डियोलोजी, कार्डियक सर्जरी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी , गैस्ट्रिक सर्जरी, न्यूरोसर्जरी, न्यूरोलॉजी और साइकियाट्री की ही सेवाएं देता है। लेकिन ये सभी डिपार्टमेंट विश्व स्तरीय सुविधाएं बिल्कुल मुफ्त देते हैं।
4. राष्ट्रीय टीबी एवम् श्वसन रोग संस्थान -
दिल्ली के महरौली में स्थित ये छोटा सा हॉस्पिटल को पहले महरौली टीबी हॉस्पिटल के नाम से जाना जाता था। फिर केंद्र सरकार ने इसकी सुविधाओं का विस्तार किया और आज ये फेफड़ों की सभी बीमारियों के लिए सबसे बढ़िया हॉस्पिटल है। सिंगल स्पेशलिटी होने की वजह से इसमें भी भीड़ न के बराबर है।
5. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट -
गुड़गांव के पास हरियाणा के झज्जर में स्थित एम्स दिल्ली का ये केंद्र साठ एकड़ में फैला हुआ है और लगभग दो हजार करोड़ की लागत से बना है। इसमें कैंसर के डायग्नोसिस ओर इलाज की वे लगभग सभी सुविधाएं है जो यूरोप या अमेरिका के किसी भी केंद्र पर उपलब्ध होगी। हालांकि यहां काफी चीजों के पैसे लगते हैं लेकिन कॉर्पोरेट हॉस्पिटल की तुलना में बीस प्रतिशत ही पड़ेगा।
6. स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर -
सफदरजंग हॉस्पिटल के अधीन 2010 में राष्ट्र मंडल खेलों के खिलाड़ियों के लिए बनाया गया था। चोटिल खिलाड़ियों के लिए इस केंद्र विश्व स्तर की सुविधाएं उपलब्ध हैं।बाद में इसका विस्तार किया गया और अब ये केंद्र हड्डियों और जोड़ों के रोगों का विश्व स्तरीय इलाज करता है। हालांकि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप वाले मॉडल के चलते इसमें भी पैसे लगते हैं लेकिन कॉर्पोरेट हॉस्पिटल से बहुत कम। सिंगल स्पेशलिटी होने के चलते बिना लंबी लाइन में लगे नंबर आ जाता है।
7. राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केन्द्र -
एम्स दिल्ली का ये केन्द्र आँखों की बीमारियाँ के लिए पूरे उत्तरी भारत का सबसे बड़ा और बेहतरीन सेंटर है
बाकी सभी बीमारियों के लिए एम्स, सफदरजंग, राम मनोहर लोहिया, लोकनायक और लेडी हार्डिंग अच्छे अस्पताल हैं। लेडी हार्डिंग में अक्सर कम भीड़ रहती है तो जल्दी नंबर आ जाता है। राम मनोहर लोहिया और लोकनायक अस्पताल मेडिकल ब्रांच या नॉन सर्जिकल इलाज के लिए बेहतरीन है। सर्जिकल प्रोसिजर या जलने और प्लास्टिक सर्जरी के लिए सफदरजंग अस्पताल बहुत अच्छा है। सुपर स्पेशलिटी सर्जरी के लिए जीबी पंत या एम्स बेहतर है। हालांकि एम्स और सफदरजंग में भारी भीड़ के चलते दिखाना मुश्किल होता है। तो उम्मीद है कि लोग बेमतलब जयपुर में नहीं लुटाएंगे।
मेरे गाँव में भूतल में पानी की गंभीर कमी है l तो सिंचाई और पेयजल के लिए सदियों पहले ही कई सारे बड़े बड़े तालाब बना दिए गए l 20-22 साल पहले सरकार ने सिंचाई के लिए फार्म pond निर्माण के लिए अनुदान देना स्टार्ट किया तो लगभग सभी किसानों ने अपने अपने खेतों में फार्म पौंड बनवा लिए l ये सभी तालाब और फार्म पौंड जुलाई में बारिश के पानी से लबालब भर जाते हैं l और फिर गांव के बच्चे, युवा इनमे कूद कूद कर मजे से नहाते हैं l लेकिन बचपन से लेकर आज तक बुजुर्ग लोगों को बच्चों की इतनी सी खुशी भी बर्दाश्त नहीं होती l जैसे ही वे किसी बच्चे को जुलाई अगस्त के महीने में इन तालाब या फार्म पौंड में नहाते देखते हैं तो डांटने लगते है कि मत नहाओ वर्ना बुखार आ जाएगा l पर मेने कभी किसी बच्चे को बुखार आते नहीं देखा l और मेरी पीढ़ी के सभी लोगों को बुजुर्गों की डांट हमेशा फालतू लगी l लेकिन मेडिकल कॉलेज आ कर पता चला कि उनकी डांट निरर्थक नहीं थी l नवंबर 2014 मे एम्स PG में माइक्रो बायोलाजी विषय से एक सवाल आया कि एक लड़की अपनी किसी फ्रेंड के गांव गयी , वापस आने पर उसको नाक से डिस्चार्ज और दिमाग की झिल्ली के इन्फेक्शन (meningitis) की समस्या हुई और 5 दिन में मृत्यु हो गई तो डायग्नॉसिस क्या होगा l ज़वाब था naegleria fowleri l ये मस्तिष्क को खाने वाला bacteria है जो बारिश के ताजा और गर्म पानी वाले तालाब आदि मे पाया जाता है l काफी रेयर है लेकिन बहुत घातक l एक बार इन्फेक्शन होने पर मृत्यु लगभग निश्चित है l ये bacteria मस्तिष्क तक नाक के रास्ते पहुंचता है और कुछ महीनों पहले मेने एक मेडिकल जर्नल में एक आर्टिकल पढ़ा जिसमें जल नेती की वजह से इस bacteria का इन्फेक्शन और मृत्यु हो गयी l
नेग्लेरिया फाउलेरी (Naegleria fowleri)
परिचय:
नेग्लेरिया फाउलेरी एक अमीबा (एककोशीय जीव) है, जिसे आमतौर पर "ब्रेन-ईटिंग अमीबा" कहा जाता है। यह जीव गर्म मीठे पानी जैसे तालाब, झील, हॉट स्प्रिंग्स आदि में पाया जाता है। यह नाक के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है और मस्तिष्क तक पहुँचता है। यह मई से अक्टूबर के महीने या 25 - 46 डिग्री के तापमान में पनपता है l
फ्रेश पानी के झरने, नदी, झीलें, तालाब, ठीक तरीके से स्वच्छ नहीं किए गए स्विमिंग पूल, और कुछ मामलों में नल के पानी से भी हो सकता है l
गोताखोरी या डाइविंग, वाटर स्पोर्ट्स जैसी गतिविधियों में इसका ज्यादा रिस्क होता है
लक्षण (Symptoms):
संक्रमण को प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफलाइटिस (PAM) कहते हैं। इसके लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 1-9 दिनों बाद शुरू होते हैं:
तेज सिरदर्द
बुखार
मतली और उल्टी
गर्दन में अकड़न
भ्रम, दौरे और कोमा
कोर्स (Course):
संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है। लक्षणों की शुरुआत के बाद 5-7 दिनों के भीतर स्थिति गंभीर हो जाती है। मस्तिष्क की सूजन तेज़ी से बढ़ती है।
पूर्वानुमान (Prognosis):
PAM का मृत्यु दर बहुत अधिक है — लगभग 97%। इलाज शुरू करने में थोड़ी भी देरी जानलेवा हो सकती है। कुछ बहुत दुर्लभ मामलों में ही समय पर पहचान और उपचार से मरीज बच पाते हैं।
निष्कर्ष:
यह एक अत्यंत घातक संक्रमण है, लेकिन बहुत दुर्लभ होता है। गर्म पानी में तैरते समय सावधानी (जैसे नाक में पानी न जाने देना) बरतनी चाहिए।
अगर आप को बुखार आदि के ऊपर लिखे लक्षण आते हैं और पिछले कुछ दिनों में तालाब आदि में नहाए हैं तो तुरंत किसी बड़े सरकारी अस्पताल में जा कर डॉक्टर को पूरी हिस्ट्री बताएं ताकि प्रॉपर जांच के साथ तुरंत इलाज शुरू किया जा सके l
पैनिक डिसऑर्डर
आमतौर पर साइकेट्रिक समस्याओं के मरीज देवी देवता, ऊपर की हवा या नजरंदाज किए जाते है या फिर बाबाओं और झाड़ फूंक की शरण में जाते है। सालों तक परेशान होने के बावजूद मुश्किल से आधे मरीज psychiatrist तक पहुंच पाते है। वो आधे भी किसी और डिपार्टमेंट से रेफर हो कर पहुंचते है। ग्रामीण , कम पढ़े लिखे या मध्यम वर्गीय या गरीब परिवारों के मानसिक रोगियों में मुश्किल से आठ दस प्रतिशत साइकाइट्रिस्ट तक पहुंचते हैं। इसलिए मेडिकल फील्ड में साइकेट्री को अक्सर शहरी अमीर लोगों की ब्रांच माना जाता है। लेकिन पैनिक डिसऑर्डर के मरीज लक्षण शुरू होने के एक महीने के अंदर हॉस्पिटल पहुंच जाते है। लक्षण इतने गंभीर होते हैं कि मरीज चाहते हुए भी नजरंदाज नहीं कर सकता। दिल्ली में साइकेट्री की इमरजेंसी में पहुंचने वाले आधे से ज्यादा मरीज एंजाइटी या पैनिक डिसऑर्डर के होते है। पैनिक डिसऑर्डर एंजाइटी डिसऑर्डर का ही एक प्रकार है। जिसमे शांति से बैठे बैठे व्यक्ति की अचानक से दिल की धड़कन बढ़ जाती है, इतनी तेज की आदमी को खुद सुनाई देने लगती है । घबराहट , मुंह सुखना , चोकिंग या दम घुट कर मरने का अहसास होना, हाथ पैरों में कंपकपी , पसीने पसीने हो जाना , छाती में दर्द या भारीपन , चक्कर आना ये सब पैनिक डिसऑर्डर के लक्षण हो सकते है। आमतौर पर लक्षण कुछ सेकंड्स या दो तीन मिनट्स चलते है। कुछ मरीजों को महीने में एक दो एपिसोड आते है तो कुछ को रोज एक दो एपिसोड हो सकते है। लेकिन लक्षणों की गंभीरता इतनी ज्यादा होती है कि मरीज को अगले एपिसोड का दर लगने लगता है।
आमतौर पर मरीज पहली बार रात को 2-3 बजे के बाद मेडिकल इमरजेंसी में आता है। चूंकि लक्षण बिलकुल दिल के दौरे जैसे होते है तो सबसे पहले कार्डियोलॉजी रेफर किया जाता है। ईसीजी, ट्रॉपोनिन और इकोकार्डियोग्राफी जैसी जांचों के नॉर्मल आने के बाद मरीज का साइकेट्री रेफरल होता है। मरीज मेडिकल इमरजेंसी की जगह अगर डायरेक्ट साइकेट्री ओपीडी पहुंच जाए तो भी रूटीन ब्लड इन्वेस्टिगेशन के साथ थायराइड , वगैरा की जांच और कार्डियोलॉजी और न्यूरोलॉजी रेफरल जरूरी होता है। पैनिक डिसऑर्डर कोई रेयर बीमारी हो ऐसा नहीं है। ये 13-14 साल की उम्र से स्टार्ट हो जाता है और 18-30 साल के एज ग्रुप में इसका प्रचलन 2-3 प्रतिशत है। 30-45 साल के दौर में इसकी संभावना लगभग 3-3.5 प्रतिशत होती है। एंक्सियोलिटिक और SSRI जैसी दवाओं से इसका इलाज किया जाता है । आमतौर पर दवाएं सिम्पटम फ्री होने के बाद कुछ महीने तक कंटिन्यू की जाती है। लेकिन लक्षण दोबारा प्रकट होने की स्थिति में कई सालों तक चल सकती है।
इस तरह के लक्षण होने पर तुरंत नजदीकी हृदय रोग विशेषज्ञ और रिपोर्ट नॉर्मल आने के बाद नजदीकी मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाएं l
विटामिन B12 की कमी (Vitamin B12 Deficiency) –
मन में उदासी, थकान, सुस्ती, याददाश्त में कमी आदि डिप्रेशन के लक्षण होते हैं l हम आमतौर पर मरीज़ को 2 हफ्तों की दवाई लिख कर दो हफ्ते बाद बुलाते हैं l लगभग 20-30 प्रतिशत मरीजों को डोज बढ़ाने और महीने भर दवाई खाने के बाद भी राहत नहीं मिलती तो में पूछता हूँ खाना वेज खाते हैं या नॉन वेज l जो लोग शुद्ध शाकाहारी खाते हैं उनको में विटामिन B12 का सप्लिमेंट्स लिखता हूँ और अगली विजिट पर उनमे आधे से ज्यादा लोग बहुत अच्छा सुधार बताते हैं l कई सारे रिसर्च पेपर के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत तक भारतीय आबादी को विटामिन B12 की कमी है l legume फ़सलों जैसे राजमा, आदि के अलावा बाकी किसी शाकाहारी खाने में विटामिन B12 नहीं पाया जाता l हालांकि हमारे शरीर को विटामिन B12 बहुत ही कम मात्रा में लगभग 1 माइक्रो ग्राम प्रतिदिन चाहिए होता है l और किसी स्वस्थ व्यक्ति को 4-5 साल तक भोजन में विटामिन B12 नहीं मिलने के बाद ही इसकी कमी के लक्षण दिखते हैं l लेकिन फिर भी सिर्फ लगभग 30 प्रतिशत भारतीय आबादी में ही प्रचुर मात्रा में विटामिन B12 मिलता है l
1. कारण (Causes):
शाकाहारी भोजन (Vegetarian diet),
पाचन तंत्र की समस्याएं (जैसे पेर्निशियस एनीमिया, intrinsic फैक्टर की कमी, एट्रॉफिक गैस्ट्राइटिस)
शरीर में अवशोषण की कमी (Malabsorption)
बाईपास सर्जरी या बड़ी आंत की बीमारियाँ
इसके अलावा कुछ दवाएं जैसे शुगर की दवाई मेटफॉर्मिन, प्रोटॉन पंप इनहिबिटर या गैस एसिडिटी की गोली pantoprazole वगैरा विटामिन B12 के अवशोषण को अवरुद्ध करती हैं और लंबे समय में इसकी कमी पैदा करती है l आमतौर पर B12 Deficiency के मरीज़ मेडिसिन डिपार्टमेन्ट पहुंचते हैं जहां उन्हें डिप्रेशन का केस मान कर मनोरोग विभाग रेफर कर दिया जाता है l
2. भारत में प्रचलन (Prevalence in Indian Population):
भारत में विशेषकर शाकाहारी लोगों में यह कमी बहुत आम है। विभिन्न अध्ययनों में 30%–70% लोगों में B12 की कमी पाई गई है, खासकर बुज़ुर्गों और गर्भवती महिलाओं में।
3. मानसिक (Psychiatric) लक्षण:
चिड़चिड़ापन, थकान, कमजोरी, ताकत नहीं रहना, डिप्रेशन, एकाग्रता में कमी , गंभीर मामलों में Hallucinations
4. तंत्रिका संबंधी (Neurological) लक्षण:
हाथ-पैरों में झुनझुनाहट (Paresthesia)
चलने में असंतुलन
स्मृति दोष
नसों की क्षति (Peripheral neuropathy)
दृष्टि समस्याएं
5. रक्त संबंधी (Hematological) लक्षण:
मेगालोब्लास्टिक एनीमिया
थकावट, कमजोरी
सांस फूलना
पीला पड़ना (Pallor)
ज्यादातर मामलों में सबसे पहले मानसिक लक्षण प्रकट होते हैं, उसके बाद न्यूरोलॉजी संबंधी या खून की कमी के लक्षण दिखते हैं l विटामिन B12 का टेस्ट थोड़ा महँगा होता है इसलिए किसी मरीज़ को डिप्रेशन के लक्षणों के साथ, खून की कमी के लक्षण या CBC मे हीमोग्लोबिन की कमी मिले तो में बिना विटामिन लेवल चेक करवाये ही सप्लिमेंट्स लिख देता हूं l और परिणाम अच्छे होते हैं l
6. विटामिन B12 से भरपूर खाद्य पदार्थ (Foods Rich in Vitamin B12):
पशु उत्पाद: अंडा, मांस, मछली, के अलावा दूध दही भी विटामिन B12 के अच्छे स्रोत है
फोर्टीफाइड अनाज (Fortified cereals)
कई बार सप्लीमेंट्स (Vegetarians के लिए आवश्यक हो सकता है)l
ऐसे किसी भी प्रकार के लक्षण होने पर नजदीकी डॉक्टर या मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाएं
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