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श्रीमद् भगवद् गीता
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवच्श्र सुघोषमणिपुष्पकौ।।१६।।
काश्यच्श्र परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युन्मो विराटच्श्र सात्यकिच्श्रापराजितः।।१७।।
द्रुपदो द्रोपदेयाच्श्र सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रच्श्र महाबाहुः शख्ङान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।१८।।
हे राजन्! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनंतविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक शंख बजाये। महान धनुर्धर काशीराज, परम योध्दा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रोपदी के पुत्र तथा सुभद्रा के महाबाहु पुत्र आदि सबों ने अपने-अपने शंख बजाये।
श्रीमद् भगवद् गीता
श्र्लोक-१५
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशख्ङं भीमकर्मा वृकोदरः।।१५।।
भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक भयंकर शंख बजाया।
श्रीमद् भगवद् गीता
श्र्लोक-१४
ततः श्र्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवच्श्रैव दिव्यौ शख्ङौ प्रदध्मतुः।।१४।।
दूसरी ओर से श्र्वेत घोडों व्दारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।
श्रीमद् भागवद् गीता
अध्याय - १
श्र्लोक-१३
ततः शख्ङाच्श्र भेर्यच्श्र पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१३।।
तत्पश्चात् शंख, नगाडे, बिगुल, तुरही तथा सींग सहसा एकसाथ बज उठे। वह समवेत स्वर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण था।
31/01/2025
परिवर्तन बहुत कष्टकारी होता है।
पर यकीन मानिए होना जरूरी होता है।
बोलो राधे राधे 🙏🙏
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