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18/11/2023
varicose vein (सिराज ग्रंथि) इसमें सिराओं का आकुंचन गुण कम हो जाता हैं
कारण :
1. गुरु आहार सेवन जैसे दही,लस्सी, तला हुआ,मासाहार आदि
2. दिन में सोना
3. ज्यादा व्यायाम करना
4. ज्यादा भार उठाना
5. ज्यादा चलना
6. लम्बे समय तक खड़ा रहना
अगर आप नीचे लिखे गए लक्षणो जैसे
से पीड़ित हैं जैसे
1. सुन्नपन
2. भारीपन
3. दर्द
4. काली,लाल सिराए
उपाय
1. लगातार खड़े ना रहना
2. सोते समय टांग के नीचे तकिया रखना
3. अर्द्धशक्ति व्यायाम
4. पट्टी बांधना
चिकत्सा
1. अग्नि कर्म
2. रक्तमोक्षण
3. अभ्यंग
4.जलोकावचरण
5. औषध
आदि चिकित्सा से varicose vein को सही किया जा सकता हैं.
आयुध हेल्थ विलेज ,बागपत रोड,मेरठ
10/11/2023
Dhanvantri diwas
12/12/2022
Hemant ritu ritu
30/09/2022
शरद ऋतु में विरेचन अत्यधिक उपयोगी रहता है। इस क्रिया में तिक्त घृत का पान किया जाता है। इस प्रक्रिया से वर्षा ऋतु के दौरान बढ़ा हुआ पित्त शरीर से बाहर निकल जाता है। यदि वर्षा ऋतु में संचित हुआ पित्त बाहर न निकाला जाये तो यह बीमारी का कारण बनता है। इसीलिये वैद्य के परामर्श से तिक्त घृत का सेवन उपयोगी होता है।
वर्षा ऋतु में शरीर वर्षाकालीन शीत का अभ्यस्त होता है। वर्षा ऋतु में पानी से भीगे हुये शरीर में पित्त का संचय होता रहता है। ऐसे शरीर पर जब सहसा शरद ऋतु के सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो शरीर के अवयवों के संतप्त होते ही वर्षा ऋतु में संचित हुआ पित्त शरद ऋतु में कुपित हो जाता है। अत: पित्त-जनित विकारों से बचने के लिये तिक्त घृत का सेवन, विरेचन आदि अवश्य कराना चाहिये।
आधुनिक वैज्ञानिक परिपेक्ष्य में देखने पर स्पष्ट होता है कि शरद ऋतु में प्राय: हृदयघात, अस्थमा का प्रकोप, चमड़ी में रूखापन, जोड़ों में दर्द, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस आदि प्रमुख समस्यायें होती हैं।
विरेचन उपचार से शरीर व इन्द्रियों की थकान मिटाती है तथा शरीर में स्फूर्ति व उमंग का अनुभव होता है तथा शरीर बार बार रोगों के आक्रमण से सुरक्षित रहता है। भूख, प्यास व निद्रा समय पर अनुभव होती है तथा शरीर के प्राकृतिक वेग जैसे शौच, मूत्र आदि समय पर निष्कासित होते हैं और शरीर का Metabolism नियमित हो जाता है।
30/09/2022
शरद ऋतु में शरीर में बढ़े हुये पित्त के कारण दूषित हो गये रक्त के शोधन के लिये आयुर्वेदाचार्यों की सलाह और देखरेख में रक्तमोक्षण कराना उपयोगी होता है।
वर्षा ऋतु में पानी से भीगे हुये शरीर में पित्त का संचय होता रहता है। ऐसे शरीर पर जब सहसा शरद ऋतु के सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो शरीर के अवयवों के संतप्त होते ही वर्षा ऋतु में संचित हुआ पित्त शरद ऋतु में कुपित हो जाता है।
अत: पित्त-जनित विकारों जैसे एसिडिटी, सोरायसिस, एक्ज़ीमा, आर्टिकरिया, एक्ने, जांडिस, फैटीलिवर आदि के कारण अशुद्ध हुये रक्त को निकालने के लिये वैद्य के परामर्श से रक्तमोक्षण करा लेना चाहिये।
03/09/2022
Nasal polyp #
21/04/2022
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