Ved Power Yoga
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Tructer toys dance video https://youtu.be/TGj0mrb5IQI
तदा द्रष्टु स्वरूपेस्वस्थानम्
तब वृत्तियो के निरोध होने पर द्रष्टा की स्वरूप मे अवस्थिति हो जाती है। www.vedpoweryoga.com
योगश्चित्तवृत्ति निरोध:।।
अर्थ-चित्त अर्थात अन्तकरण की वृत्तियो का निरोध सर्वथा रुक जाना ही योग है।
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11/12/2021
21/05/2020
नौकासन
यह आसन पेशीय, पाचन, परिसंचरण, तन्त्रिका और अन्तःस्त्रावी तन्त्रो में क्रियाशीलता लाता है, सभी अंगों को पुष्ट बनाता है और आलस्य एवं तन्द्रा को दूर करता है। यह तन्त्रिकीय तनाव को दूर कर गहन विश्राम प्रदान करने मे विशेष रूप से सहायक है। गहन विश्राम की प्राप्ति हेतु इसे शवासन के पूर्व करना चाहिए । प्रातः जागरण के तुरन्त बाद यदि यह आसन कर लिया जाये तो शरीर और मन को पूर्ण ताजगी प्राप्त होती है। शरीर व पेट की चर्बी कम करने वाला विशेष आसन है।
Yogacharya rajat kumar
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19/05/2020
हलासन
हलासन के समय मध्यपट में होने वाली गति से समस्त आंतरिक अगों की मालिश हो जाती है, पाचन क्रिया तीव्र हो जाती है,जिससे कब्ज और मदांग्नि से छुटकारा मिलता है।प्लीहा और अधिवृक्क ग्रंथियो को नवजीवन
प्राप्त होता है, अग्नाश्य द्वारा इन्सुलिन के उत्पादन में वृद्धि होती है और यकृत एवं गुर्दे सक्रियता बढती है । यह उदर की पेशियो को सुदृढ बनाता है, पीठ की पेशियो की ऐंठन दुर होती है ,मेरूदण्ड की तन्त्रिकाओं को पोषण मिलता है, अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र के कार्य में सुधार आता है और सम्पूर्ण क्षेत्र में रक्त संचार बढता है। यह थायरॉयड ग्रथिं उद्दीप्त होती है, साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता में वृद्धि होती है।दमा, ब्रोंकाइटिस, कब्ज, यकृतशोथ मूत्रनली और मासिक धर्म सम्बंधी गड़बडियो के योगोप्चार में इसका उपयोग किया जाता है।
Yogacharya rajat kumar
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18/05/2020
'स्थिरं सुखम आसनम् ।'
आसन के अभ्यास मे व्यक्ति को स्थिर रहना चाहिए । आसन में किसी प्रकार की कठिनाई, तनाव या दर्द उत्पन्न
नही होने देना चाहिए । सहज भाव से आसन होने चाहिए ।वही उद्देश्य यहां पर भी अपनाया गया है। शारिरिक स्थिरता प्राप्त करना आवश्यक है, क्योकि यदि किसी अवस्था में हमारा शरीर चञ्चल है, तो वह मन को केन्द्रित नही होने देगा । स्थिरता को एक गुण या आवश्यकता के रूप मे देखा गया है ।
Yogacharya rajat kumar
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17/05/2020
दृढ़ता-कुछ लोग दृढ़ता का अर्थ लगाते है 'शक्ति' ओर कुछ लोग अर्थ लगाते है मानसिक बल लेकिन यहां पर जिस उद्देश्य से दृढ़ता का प्रयोग किया गया है, वह केवल शारिरिक नहीं वरन मानसिक , विचारात्मक, और भावनात्मक भी है, जिस प्रकार हम लोग अपने अभ्यास क्रम मे शरीर को दृढ़ बनाने का प्रयास करते है, जिस प्रकार अपनी विचार धारा मे हम अपने विचारो को स्पष्ट करने का प्रयास करते है।दृढ़ और सकंल्प शाक्ति से पूर्ण बनाने का प्रयास करते है, ठीक उसी प्रकार महर्षि घेरण्ड कहते है कि आत्मशुद्धि के लिए व्यक्ति को दृढ़ता का गुण प्राप्त करना आवश्यक है।परिणाम प्राप्ति तक धेर्यपूर्वक अभ्यास करते रहना दृढ़ता का लक्षण होता है। यहां पर दृढ़ता का अर्थ लगा सकते है, एक सकंल्प को धारण कर चलना , और उस पर अडिग रहना ।
Yogacharya vikrant nagar
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16/05/2020
शोधनं दृढता चैव स्थैर्य धैर्य च लाघवम् ।
प्रत्यक्षं च निर्लिप्तं च घटस्य सप्तसाधाम ।।
अर्थ - शरीर की शुद्धि के लिए सात साधन है-- शोधन, दृढ़ता, स्थैर्य, धैर्य, लाघव, प्रत्यक्ष, और निर्लिप्तता ।।
१- शोधनम्-- पहला है शोधन ,जिसका अर्थ है शुद्धिकरण । शरीर और मन को विकार रहित बनाने के लिए शुद्धिकरण अतयन्त आवश्यक है।
Yogacharya- vikrant nagar
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15/05/2020
आमकुम्भ इवाम्भस्थो जीर्यमाण: सदा घट।
योगानलेन संदह्रा घटशुद्धिं समाचरेत ।।
अर्थ- मिट्टी के कच्चे घट मे जल भर दिया जाये तो वह गलकर नष्ट हो जायेगा। परन्तु यदि घट को पकाकर जल भरें ,न गलेगा न नष्ट होगा। इसी प्रकार जीव के अपरिपक्क शरीर के विषय मे समझना चाहिए । यह शरीर योगाम्नि के द्वारा ही परिपक्क हो सकता है। अतः शरीर को परिपक्क बनाने के लिए योगाभ्याश आवश्यक है।।
Yog acharya vikrant nagar
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