Nizami kalpi

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imtiyaz ali

27/07/2026

♥️🇮🇳🇮🇳 Good Night friends 🇮🇳🇮🇳♥️

27/07/2026

*पहले पूरा पढ़िए फिर जवाब दीजिए अदब के दायरे में*

*ये पोस्ट जान अब्दुल्लाह साहब को क़लम से है *

और जब कोई समझाए तो यह और इसके नाबालिग कहते है कि
"भाई हम तो रब की रज़ा हेतु कर रहे है"

भाई सीजेपी वाले हो या डीजेपी वाले

एक लेवल के बाद फुटेज देना बंद कर देंगे

तुमको राजनीति में इस स्तर पर बिठाया नहीं जाएगा

कि कल को तुम किसी फैसले में असहमति दर्ज करवाओ।

यह बार बार हुआ है, इतिहास पढ़ लो।

किसी की कुर्सी में कील बनने से बेहतर है कि एक ऐसा स्वतंत्र डंडा बनो कि कुर्सी वाला तुमसे मांडवली करने को राजी हो।

सीजेपी वालो को एक फूड स्पॉन्सर चाहिए था आपको पहचान चाहिए थी

दोनो को अपना अपना मिल गया है, डील खत्म होती है मित्र।

जश्न में दो तरह के लोग होते है, एक बुलाया एक बिन बुलाया

सम्मान बुलाये का ही होता है। दुनिया में इंसानियत नाम का धर्म नहीं है

अब सब अपने अपने संविधान से चलते है। जुनैद भाई, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इस आंदोलन में जाकर आपने जेनुइन परेशान लोगो की मदद कर रहे लोगों ही का काम बढ़ाया है।

आपके नाम पर तो भी बहुत के चंदे उठेंगे देखते रहिए आज त

01/06/2026

Ek haseen sham ka pl



Imtiyaz Ali

27/02/2026

👌
Day and night view of the Royal clock Tower 🌙

27/02/2026

सूरा हूद का यह हिस्सा 12वें पारे (व-मा मिन दाब्बतिन) की उन रूहानी आयतों पर मुश्तमिल है, जहाँ हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) अपनी ताकतवर कौम 'आद' को कामयाबी का वो सुनहरी नुस्खा बता रहे हैं जिसे आज भी हर इंसान की ज़रूरत है—यानी "इस्तग़फ़ार"।

पारा 12: व-मा मिन दाब्बतिन (وَمَا مِن دَآبَّةٍ)
सूरा हूद (आयत 52-56)

आयत 52: #इस्तग़फ़ार_और_बरकत_का_नुस्खा
कामयाबी की चाबी:
وَيَـٰقَوْمِ ٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ يُرْسِلِ ٱلسَّمَآءَ عَلَيْكُم مِّدْرَارًۭا وَيَزِدْكُمْ قُوَّةً إِلَىٰ قُوَّتِكُمْ وَلَا تَتَوَلَّوْا۟ مُجْرِمِينَ
* तर्जुमा: "और ऐ मेरी कौम! अपने रब से माफ़ी माँगो, फिर उसकी तरफ रुजू (तौबा) करो; वह तुम पर आसमान से खूब बरसने वाला मेह (बारिश) भेजेगा और तुम्हारी मौजूदा ताकत में और ज़्यादा ताकत बढ़ा देगा, और तुम मुजरिम बनकर मुँह न फेरो।"

आयत 53-54: #कौम की हठधर्मी और नबी पर इल्ज़ाम
जाहिलों का जवाब:
قَالُوا۟ يَـٰهُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍۢ وَمَا نَحْنُ بِتَارِكِىٓ ءَالِهَتِنَا عَن قَوْلِكَ... إِن نَّقُولُ إِلَّا ٱعْتَرَىٰكَ بَعْضُ ءَالِهَتِنَا بِسُوٓءٍۢ...
* तर्जुमा: "वे बोले: 'ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई वाज़ेह दलील लेकर नहीं आए, और हम तुम्हारे कहने से अपने माबूदों (बुतों) को छोड़ने वाले नहीं... हम तो यही कहते हैं कि हमारे किसी माबूद ने तुम्हें कोई चोट (पागलपन) पहुँचा दी है'।"

आयत 55-56: #नबी का बे-खौफ़ तवक्कुल
जब एक बंदा पूरी कौम को ललकारता है:
قَالَ إِنِّىٓ أُشْهِدُ ٱللَّهَ وَٱشْهَدُوٓا۟ أَنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تُشْرِكُونَ ۞ مِن دُونِهِۦ ۖ فَكِيدُونِى جَمِيعًۭا ثُمَّ لَا تُنظِرُونِ ۞ إِنِّى تَوَكَّلْتُ عَلَى ٱللَّهِ رَبِّى وَرَبِّكُم ۚ مَّا مِن دَآبَّةٍ إِلَّا هُوَ ءَاخِذٌۢ بِنَاصِيَتِهَآ ۚ إِنَّ رَبِّى عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
* तर्जुमा: "(हूद ने) कहा: 'मैं अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि मैं उन सब (बुतों) से बेज़ार हूँ जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा शरीक ठहराते हो। अब तुम सब मिलकर मेरे खिलाफ जो चाल चलना चाहो चल लो और मुझे मोहलत न दो। बेशक मैंने अल्लाह पर भरोसा किया है जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है; ज़मीन पर चलने वाला कोई जानदार ऐसा नहीं जिसकी पेशानी (Forehead) उसने न थाम रखी हो; बेशक मेरा रब सीधे रास्ते पर है'।"

तफ़सीर और रूहानी हिकमत (Insights)
* #इस्तग़फ़ार_की_बरकत (आयत 52): हज़रत हूद (अ.स.) ने अपनी कौम को बताया कि तौबा सिर्फ गुनाह धोने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया की तरक्की के लिए भी है। बारिश (रिज़्क) और कुव्वत (Power) का सीधा ताल्लुक अल्लाह से माफी माँगने में है। जो कौम अल्लाह के आगे झुकती है, अल्लाह उसे ज़मीन पर मज़बूत कर देता है।
* #माबूदों की मार (आयत 54): मुशरिकों का पुराना डर—"हमारे बुत तुम्हें मार देंगे।" आज भी लोग वहम और डर के शिकार होते हैं, मगर नबी का जवाब पत्थर पर लकीर है।
* #पेशानी थामना (आयत 56): "आख़िज़ुम-बि-नासियातिहा"—ये लफ़्ज़ तवक्कुल की इंतिहा है। इसका मतलब है कि हर ज़ालिम की लगाम अल्लाह के हाथ में है। जब तक अल्लाह न चाहे, कोई हाथ तुम्हें छू नहीं सकता। ज़ालिम तो क्या, जंगल का शेर भी अल्लाह के हुक्म का पाबंद है।

#सुब्हान_अल्लाह! ज़रा हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) का वो जलाल और बे-खौफ़ अंदाज़ तो देखिए। सामने वो कौम है जो पहाड़ों को तराश कर महल बनाती थी, जिनके बाजू फौलाद जैसे थे। वो डराते हैं कि 'हमारे बुत तुझे पागल कर देंगे', और खुदा का ये पैग़म्बर सीना तान कर कहता है: 'ऐ गर्दनों में सरिया रखने वालों! जाओ, अपने उन बे-जान पत्थरों को भी बुला लो और तुम सब मिलकर मेरे खिलाफ साजिशें कर लो, मुझे रत्ती भर परवाह नहीं। क्योंकि मेरी पेशानी और तुम्हारी पेशानी, यहाँ तक कि हर चलते-फिरते जानदार की लगाम उस रब्बे-ज़ुलजलाल के हाथ में है। जब तक मेरा मालिक नहीं चाहेगा, तुम मेरा बाल भी बीका नहीं कर सकते।' वाह! ये होता है ईमान का वह नूर, जिसके सामने दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकतें सजदा-रेज़ हो जाती हैं।

यहाँ से आगे आयत 57 से 60 तक हज़रत हूद (अ.स.) की आखिरी चेतावनी और कौम-ए-आद पर आने वाले उस खौफनाक अज़ाब (तेज़ हवा) का ज़िक्र है जिसने उन्हें तिनकों की तरह उड़ा दिया।

26/02/2026

I got over 10 reactions on one of my posts last week! Thanks everyone for your support! 🎉

26/02/2026

8 रमजान 455 हिजरी (4 सितंबर 1063) को अल्प अर्सलान सेल्जुक सिंहासन पर आसीन हुए। उन्होंने अपने चाचा सुल्तान तुगरिल, जो महान सेल्जुक साम्राज्य के संस्थापक थे, के उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता संभाली।
​सुल्तान अल्प अर्सलान (वास्तविक नाम: मुहम्मद बिन दाऊद चगरी) चगरी बेग के पुत्र और सुल्तान तुगरिल के भतीजे थे। सुल्तान बनने से पहले, अल्प अर्सलान ने अपने पिता की मृत्यु के बाद 1059 में खुरासान के गवर्नर के रूप में कार्य किया था।
​जब 1063 में सुल्तान तुगरिल का निधन हुआ, तो उन्होंने अर्सलान के छोटे भाई सुलेमान को अपना उत्तराधिकारी नामित किया। हालांकि, सिंहासन पर अपना दावा पेश करने के लिए अल्प अर्सलान को अपने चाचा कुतलमिश का सामना करना पड़ा। अल्प अर्सलान ने 1063 में दमघान की लड़ाई में कुतलमिश को हराया और सुल्तान बने।
​उनके द्वारा लड़ी गई सबसे प्रमुख लड़ाई 1071 में मंज़िकर्ट का युद्ध (Battle of Manzikert) थी। बीजान्टिन सम्राट रोमनोस IV ने व्यक्तिगत रूप से सुल्तान के खिलाफ एक विशाल सेना का नेतृत्व किया था। दोनों सेनाएं मंज़िकर्ट के मैदानों में आमने-सामने हुईं। सुल्तान अल्प अर्सलान ने युद्ध में बीजान्टिन सेना को पूरी तरह कुचल दिया और सम्राट रोमनोस को सेल्जुक सेना द्वारा बंदी बना लिया गया।
​मंज़िकर्ट की हार बीजान्टिन साम्राज्य के लिए एक बड़ी तबाही थी। हालांकि बीजान्टिनों ने अनातोलिया खो दिया, फिर भी साम्राज्य 350 से अधिक वर्षों तक जीवित रहा और 1453 में सुल्तान मेहमद द्वितीय के नेतृत्व में उस्मानी (ओटोमन) विजय तक कॉन्स्टेंटिनोपल (कुस्तुनतुनिया) से शासन किया।

26/02/2026

😘…….🕋🫶❤️
Day and night view of the Royal Clock Tower 🌙 🌹

26/02/2026

With Entertainment By Asha – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

26/02/2026

रूमियो का खौ़फ हज़रत खालिद बिन वलीद मुजाहिदों को तर्गीबे संघर्ष देते हुए जंग में मसरूफ थे कि एक भारी जिस्म और ताकतवर कद-काठी वाला रूमी "रईस गबर" इन पर टूट पड़ा । पहले उसने तलवार का वार कर दिया , लैकिन हज़रत खालिद बिन वलीद ने उस का वार खाली फेरते हुए ढाल पर ले लिया ।

फिर हज़रत खालिद बिन वलीद ने उस पर वार किया , लैकिन वह गबर लड़ाई के फन का माहिर था उसने अपने आप को बचा लिया । हज़रत खालिद बिन वलीद और उस गबर में शिद्दत से तलवारबाज़ी होती रही । दोनों ने तलवार ज़नी के जौहर दिखाए । इस दौरान हज़रत खालिद बिन वलीद ने मौका ' पाकर गबर के सर पर तलवार दे मारी ।

तलवार लोहे के खौद से टकराई और एक शदीद झटका लगा , नतीजतन हज़रत खालिद बिन वलीद की तलवार उछल कर इस तरह टूटी कि तल्वार का कब्ज़ा हज़रत खालिद बिन वलीद के हाथ में रह गया और धार दार सलाखी हिस्सा जोड़ से टूट कर ज़मीन पर गिरा ।

यह देख कर गबर की जुरअत बढ़ी और उस ने हज़रत खालिद बिन वलीद के मुतअल्लिक यह सोचा की इनको शहीद कर के पूरे मुल्के शाम में अपनी बहादुरी का डंका बजा दूं । लिहाजा वह अपनी तमाम ताकत के साथ हज़रत खालिद बिन वलीद पर तलवार का वार करने आगे बढ़ा , लैकिन हज़रत खालिद बिन वलीद ने अपने घोड़े को एड़ी मार कर इस तरह कूदाया कि हज़रत खालिद बिन वलीद का घोड़ा गबर के घोड़े से मुलहिक हो गया |

गबर कुछ सोचे और समझे इस के पहले तो हज़रत खालिद बिन वलीद ने अपने जिस्म को गबर के जिस्म से चिमटा लिया और गबर को उस के घोड़े से खींच लिया और अपने दोनों हाथों की गिरफ्त में लेकर ऐसा दबोचा कि उस की पसलियां टूटने लगीं ।

गबर ज़ौर ज़ौर से चीखने लगा । हज़रत खालिद बिन वलीद की पकड़ सख्त से सख्त होती गई और हज़रत खालिद बिन वलीद ने उस की तमाम पसलियां पीस कर रख दीं और उस को ज़मीन पर मुर्दा डाल दिया । गबर की तलवार से ही गबर का सर juda कर रख दिया ।

तमाम रूमी और मुजाहिदीन हज़रत खालिद बिन वलीद का यह कारनामा हैरत और तअज्जुब से देखते ही रह गए कि भारी जसामत व तवील कद्दो कामत वाले मुसल्लह गबर को हज़रत खालिद बिन वलीद ने इस तरह पीस कर रख दिया जिस तरह चक्की गैहू पीस डालती है । हज़रत खालिद बिन वलीद के बाजूओं में एक अजीब ताकत पैदा हो गई थी ।

हज़रत खालिद बिन वलीद के इस हैरत अंगेज कारनामे को देख कर रूमी सिपाही लरज़ उठे और इन पर एक " अजीबो-गरीब " खौफ " तारी हो गया । जब कि मुजाहिदों के हौसले बुलन्द हो गए ।

मुजाहिदीन दोहरे जौश से रूमियों पर टूट पड़े । हज़रत खालिद बिन वलीद अपने साथियों को जंग के संघर्ष की फजीलत और jung का अज्रे अज़ीम बयान कर के मुसल्सल तर्गीब देते थे और बजाते खुद हम्ला कर के अमली मिसाल पैश करते थे । हज़रत खालिद बिन वलीद ने अपने | साथियों के साथ रूमियों पर शदीद हमला कर के रूमियों को दाएं बाएं बिखैर दिया ।

रूमियों की सफों को उलट कर रख दिया और लाशों के ढैर लगा दिये । हज़रत खालिद बिन वलीद ने इस कसरत | से शम्शीर ज़नी की कि रूमियों के खून के फव्वारे उड़ने लगे और हज़रत खालिद बिन वलीद खून से नहा बैठे । हज़रत खालिद का जिस्म खून से शराबोर हो गया और इन की जिरह से खून टपकने लगा ।

हज़रत खालिद बिन वलीद अर्गवान के फूल की तरह सुर्ख नज़र आते थे । रूमियों पर इन की हैबत ऐसी छा गई थी कि हज़रत खालिद बिन वलीद जंग में जिस तरफ अपना रूख करते थे रूमी अपनी जान बचाने के लिये जगह छोड़ देते थे ।

हज़रत खालिद बिन वलीद के जौशो खरौश को देखकर इस्लामी लश्कर के सिपेह सालारे आज़म हज़रत अबू उबैदा ने पुकार कर कहा कि ऐ अबू सुलैमान ! | बैशक तुम ने राहे खुदा में (जिहाद यानी संघर्ष) का हक अदा कर दिया ।

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