Yug sahitya
इसमें केवल परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित पुस्तक का ही वर्णन किया जाएगा या गायत्री परिवार द्वारा संचालित कार्यक्रम ही दिखाया जाएगा
जय गुरुदेव 📖🙏💐🇮🇳🕉️
इस वीडियो में हम जानेंगे कि चोटी (शिखा) क्यों रखी जाती है और इसके पीछे छिपे हुए वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और मानसिक रहस्य क्या हैं।
अखंड ज्योति (जनवरी 1948) के अनुसार शिखा केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह हमारे मस्तिष्क, मनोबल, आत्मिक शक्ति और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है।
🔍 इस वीडियो में जानिए:
- शिखा का मस्तिष्क और हृदय से क्या संबंध है?
- क्या शिखा रखने से मानसिक शक्तियाँ बढ़ती हैं?
- क्या यह काम वासना को नियंत्रित करती है?
- क्या शिखा से तेज और आभा बढ़ती है?
- ब्रह्मरंध्र और आत्मा से इसका क्या संबंध है?
🙏 अगर आप सनातन धर्म, आध्यात्म और प्राचीन ज्ञान में रुचि रखते हैं तो यह वीडियो आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
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14/05/2026
धरती के मानव को देवात्मा हिमालय का संदेश !
-Akhand Jyoti - January, 1993 !
घटना आज की नहीं, पर है इसी शताब्दी की। उस वर्ष हिमालय में हिमपात अधिक हुआ था। श्री बद्रीनाथ जी के के मन्दिर के पट वैसे सामान्य स्थिति में अक्षय तृतीया को खुल जाया करते हैं। किन्तु वे जब जोशीमठ पहुँचे तो यात्री वहीं रुके थे। वह अक्षय तृतीया वाराणसी में ही मनाकर चले थे। मार्ग में तीन-चार दिन तो ऋषिकेश तक में ही रुकते रुकाते लग गए और तब मोटर बसें केवल देव प्रयाग तक जाती थीं। आगे का मार्ग उन्होंने पैदल पार किया ।
भाग्य-देवता कुछ अनुकूल लग रहे थे। जोशीमठ पहुँचने पर पता लगा कि आज ही शाम को पट खुलने वाला है। बद्रीनाथ पहुँचने पर देखा-मार्गों पर तीन-चार फुट बरफ पड़ी थी और दुकानदार फावड़ों से बरफ हटा कर अपनी दुकानों के द्वार खोलने की कोशिश में लगे हैं।
याद नहीं, दूसरे या तीसरे दिन बद्रीनाथ से आगे व्यासगुफा, सहस्रधारा तक चले गए। गए साथ में एक युवक पर्वतीय ब्राह्मण थे-मार्ग दर्शन के लिए। दो-तीन स्थानों पर उन्होंने अलकनन्दा की धारा बरफ के प्रकृति निर्मित पुल से पार की। लेकिन जब वे दोनों वसोथारा के ऊपर की गुफा पर चढ़ने लगे, तब मार्गदर्शक ने मना किया। लेकिन जैसे उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसी बीच पता नहीं कब उन्हें भाग्य भरोसे छोड़कर मार्गदर्शक और मित्र दोनों वापस लौट गए ।
ऊपर किसी तरह वे पहुँचे भी और लौटे भी। लौटते समय या तो उनको मार्ग भूल गया अथवा जिस हिमनिर्मित पुल से उनने अलकनन्दा पार की थी, वह इतनी देर में टूट गया था। हुआ कुछ भी हो, उनको माना गाँव के पास होकर घूमकर आने के लिए विवश होना पड़ा ।
माना गाँव सुनसान पड़ा था। घरों के दरवाजों पर ताले सीलबन्द पड़े थे। वहाँ के निवासी जो सर्दियों में नीचे चले गये थे, अभी तक नहीं लौटे थे । जीवन में पहली बार एक जनहीन गाँव देखा अद्भुत लगा वह सुनसान । वह कुछ और आगे बढ़ गए । सन्ध्या समीप थी। अस्ताचल से से एक बार दिनपति ने
जंगती को देखा और उनके विराम की छाया सम्पूर्ण धरातल पर फैल गई। सम्पूर्ण हिमाच्छादित गिरि शिखर गैरिकवर्णी वीतराग सन्यासी के वेश में परिवर्तित हो गए । तरु-वीरुध और लताओं ने भी उसी वर्ण को अपना लिया । प्रत्येक शिला भी रंग गई उस रंग में। पक्षियों ने दिशाओं में मन्त्रपाठ प्रारम्भ किया। अचानक बादल घिर आए, वर्षा किसी भी क्षण सम्भव थी। उनके पास न छाता था न बरसाती कोट । अतः स्थान पर पहुँचने की शीघ्रता स्वाभाविक थी ।
सहसा उनके पैरों ने चलना अस्वीकार कर दिया। उनकी क्या अवस्था हुई कहना कठिन है। स्वयं सोच लें-आस-पास कोई नहीं था । उज्ज्वल हिमाच्छन्न पर्वत और उसके पीछे एक जनहीन गाँव । मार्गदर्शक और मित्र तो कभी के चुपचाप खिसक चुके थे, जानने का कोई साधन था नहीं। सहसा सामने केवल दस गज दूर एक महाकाय आकृति आ खड़ी हुई। एक गम्भीर स्वर उभरा। कुछ क्षण लगे उन्हें अपने को आश्वस्त करने में। उनके सम्मुख वे जो कोई भी थे कुछ आश्वासन दे रहे थे कि भय करने की जरूरत नहीं है। हाँ वे पुरुष थे मानव पुरुष । किन्तु उनका विशाल शरीर-जिसके सामने खड़े वह उनके घुटनों से कुछ कुछ ही ऊँचे लग रहे थे। नाभि से नीचे तक लटकती हिम धवल दाढ़ी सुपुष्ट दीर्घ भुजाएँ और लेकिन उनके तेजोमय मुख को भली प्रक देख पाना सम्भव कहाँ था। वह वहाँ खड़े थे यही कहाँ कम था। "कौन हो तुम ?" उन्होंने शुद्ध देववाणी में पूछाः था। ये भी संस्कृत के आचार्य थे। "गोपीनाथ"-अपना नाम बताकर संक्षिप्त परिचय दिया। इतनी देर में वे अपने को कुछ अधिक आश्वस्त अनुभव कर रहे थे। उन्हें पृथ्वी पर मस्तक रखकर प्रणाम किया । "गोत्र" प्रश्न हुआ। "सावर्णि" उत्तर सुनकर वे इतने हँसे कि पर्वतमालाएँ काँपती हुई प्रतीत हुईं। "कोई विशेष बात नहीं" वे सौम्य स्वर में बोले "तुम्हारे कुलपुरुष भगवान विवस्वान आत्मज सार्वार्ण हैं-आगामी मन्वंतर के मनु तुम्हार! यह क्षीणकाय उन मार्तण्ड तनय के सम्मुख मैं भी इतना ही हवदह, अल्पप्राण प्रतीत होने लगता हूँ। कहीं तुम अपने उन कुल पुरुष का साक्षात कर सको तो? लेकिन वे इस बार हँसे नहीं। "भगवन् आप?" जिज्ञासा उभरी । "मेरा जन्म त्रेता के अन्त में हुआ था।" उन्होंने सहज भाव से कहा। "तब तक मानवदेह हास को प्राप्त हो चुका चुका था था और और तुम्हें तो देखकर लगता है।" पता नहीं क्यों उन्होंने अपनी बात छोड़ दी । अधूरी
पुराण इतने में गोपीनाथ जी को ध्यान आया कि वर्णित कलाप ग्राम कहीं यहाँ से पास होना चाहिए । अवश्य सामने जो दिव्य पुरुष उपस्थित हैं, वे हैं, वे वहीं के निवासी होंगे। उनके मन में उस भूमि के दर्शन की इच्छा प्रबल होने लगी ।
वत्स ! तुम ठीक सोचते हो हिमालय का गौरव और वैभव अनन्त है। कलाप ग्राम ही क्यों देवात्मा के इस ध्रुव केन्द्र में ऐसे अनगिनत स्थल हैं जहाँ युग-युगान्तर साधनाएँ, तपश्चर्यार्य, विशिष्ट प्रयोग सम्पन्न होते रहे हैं-सम्पन्न हो रहे हैं। जहाँ तक भूमि का प्रश्न है, इन स्थानों पर तुम और तुम्हारे अनेक साथी आते-जाते रहते हैं; किन्तु उसके निवासी जब तक स्वयं न चाहें, उन्हें तुम देख नहीं सकते ।"
अद्भुत आश्चर्यजनक लगा उस लोकोत्तर मानव का कथन । भला इन अति विशिष्ट मानवों के लिए प्रयोगों की क्या जरूरत ? अन्तराल में में उभरे प्रश्न को उनकी सुविकसित संवेदना ने अनुभव कर लिया। “ऐसा मत सोचो इनके प्रयोगों का उद्देश्य स्वार्थ का जखीरा इकट्ठा करना अथवा अहं का सिक्का चलाना नहीं है। ये सभी देवपुरुष ब्रह्माण्ड के हित में समर्पित हैं। तुम्हारे वैज्ञानिक और ज्योतिषी अनेक भविष्यवाणियाँ कर मानव के मन में हलचल पैदा कर देते हैं। सभी सुख चैन की नींद को त्याग चिन्तातुर हो उस वक्त की प्रतीक्षा करते हैं और जब वक्त आता है-तब कुछ नहीं होता। भविष्य वक्ताओं के कथन अपने स्थान पर सही होते हैं। पर ये ही महापुरुष अपने प्रयोगों से स्थिति को टाल देते हैं। आज नहीं आगे भी देखोगे, युद्ध छिड़ेंगे, पर महाविनाश के पूर्व समझौते हो जायेंगे। लगेगा सभ्यता समाप्त हुई, पर कोई शान्तिदूत स्थिति संभाल लेंगा ।"
"प्रयोग तो आश्चर्य जनक है-पर मानव भी विनाश के कगार पर है। हाँ आमंत्रित तो यही कर रहा है। आज वह और उसका समाज अस्वस्थ है।" "समाज, भी अस्वस्थ" बात समझ में नहीं आ रही थी । "मनुष्य सदा दुर्बल रहा है।" वे कह रहे थे-"उससे त्रुटि नहीं होगी, उसके पद वासना विचलित नहीं
होंगे, यह कभी सम्भव नहीं हुआ। पर पहले वह सुसंस्कृत बनने, स्वस्थ रहने के विज्ञान और विधान को स्वीकार कर देवत्व की ओर छलौंग लगाता था, आज इन्हें अस्वीकार कर कीट-पतंगों की तरह बिलबिला रहा है।"
यह सब सुनकर उन्हें अनेक पौराणिक कथाएँ याद हो आयीं। मानस चक्षुओं के सामने उभरने लगे वशिष्ठ, अगत्स्य, याज्ञवल्क्य के वे प्रयास जिन्होंने समूचे मानव जीवन को संस्कार महोत्सव बना डाला था। यदि ऐसी स्थिति आज बनायी जा सके । विचार तरंगो से स्पन्दित हो वे कह उठे-"स्थिति बनेगी वत्स धरती के मानव को हिमालय का संदेश देना-वह संस्कार के मंगल विधान को पुनः अपनाए । देवत्व की ओर बढ़ते प्रत्येक कदम को यहाँ की ऋषि सत्ताएँ सम्बल देंगी। देवात्मा हिमालय के संरक्षण में चल रहे प्रयोग भारत को
द्रौपदी ने कौरवों को अपने राजमहल में बुलाया। जब वे अनोखी बनावट से भ्रमित होकर जल को थल और थल को जल समझने लगे तो द्रौपदी ने उनका उपहास उड़ाया और कहा- "अंधों के अधे ही होते हैं।"
बात उपहास में कही गई थी पर वह लगी अपमान भरे तीर जैसी । कौरवों ने उसी से रूठकर द्रौपदी द्रौपदी को, पाण्डवों को नीचा दिखाने का निश्चय किया और बात बढ़ते-बढ़ते द्रौपदी को निर्वस्त्र करने से लेकर उसके पुत्र मारे जाने तक पहुँची । महाभारत में असंख्यों का असीम विनाश हुआ।
शिष्टाचार का उल्लंघन करना साधारण बात होते हुए भी असाधारण विपत्तियाँ खड़ी कर देता है।
केन्द्र बनाकर समूचे विश्व का कायाकल्प कर डालेंगे । उन दिव्य पुरुषों का यह प्रयोग अगले पचास वर्षों में पूरा होकर रहेगा। हाँ इस बीच धरती और धरती पुत्रों को बहुत कुछ सहना पड़ेगा।"
कुछ क्षण, पता नहीं कितने क्षण वे मस्तक झुकाये अपने चिन्तन में लीन रहे अगली शताब्दी की दुनिया का स्वर्णिम चित्र उनके अस्तित्व में पुलकन भर रहा था। पता नहीं कितना समय इसमें बीत गया और जब उन्होंने नेत्र उठाए, सम्मुख कोई नहीं था। वही हिमाच्छादित पर्वतमालाएँ, वही तीव्र वेगा अलकनन्दा और वही पीछे सुनसान माना गाँव और हिमालय का शाश्वत सन्देश जिसके अनुरूप स्वयं को ढालकर गोपीनाथ प्राच्य विद्या के महान साधक महामहोपाध्याय डा. गोपीनाथ कविराज बन गए। सन्देश के स्वर शाश्वत हैं-बस ग्रहणशीलता के लिए हमारी प्रतीक्षा है।
ख़तरे का घंटा बज रहा है! 🔔
अखंड ज्योति अप्रैल 1942 का यह लेख आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
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अखंड ज्योति (मार्च 1942) में बताए गए इस रहस्यमय संदेश में बताया गया है कि समय बदलने वाला है और हमें अभी से तैयार होना चाहिए।
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क्या सच में भगवान का अवतार होने वाला है?
अखंड ज्योति (सितंबर 1988) में बताए गए इस रहस्यमयी लेख में अवतार के आगमन का अद्भुत वर्णन किया गया है।
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👉 भगवान पहले मन, वाणी और फिर कर्म में कैसे प्रकट होते हैं
👉 सत्ययुग के आगमन के संकेत
👉 निष्कलंक अवतार कैसा होगा?
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👉 क्या सच में कलियुग खत्म होने वाला है?
👉 क्या सतयुग का आगमन 21वीं सदी में शुरू हो चुका है?
इस वीडियो में हम अखंड ज्योति (जून 1988) के पेज 21, 22, 23 के आधार पर जानेंगे:
स्वर्ग और नरक की वास्तविकता क्या है?
क्या सतयुग पहले धरती पर था?
ऋषि परंपरा क्या है?
कलियुग से सतयुग में परिवर्तन कैसे होता है?
क्या हम खुद अपना "सतयुग" बना सकते हैं?
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जब मनुष्य का दृष्टिकोण बदलता है, तब युग बदल जाता है।
👉 21वीं सदी को "उषा काल" यानी नए सतयुग का प्रारंभ बताया गया है।
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हो सकता है कि किसी को कार्य करने पर भी आनन्द न मिले। पर इतना निश्चित है कि आनन्द उसी को मिला है जिसने कर्तव्य मार्ग पर चलते रहने का निश्चिय किया । Yug sahitya
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