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ज्योतिषाचार्य पण्डित श्री सतीश चन्द्र मिश्र
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कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
अर्थ: इस वेद मंत्र में मनुष्यों को कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने को कहा गया है, लेकिन कर्म निष्काम होना चाहिए, जो कर्म में लिप्त नहीं होते उसे ही तो नर (जो रमन नही करते या आसक्ति नहीं रखते) कहते हैं।
इसी बात को महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता ने ऐसे लिखा
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।
अर्थ
कर्म करो फल की चिन्ता मत करो, यदि आप में कर्म फल कि तृष्णा होगी, तो आप उस कर्म फल प्राप्ति का कारण होंगे । तब वह कर्मफलरूप पुनर्जन्मका हेतु बन जाता है। अर्थात ये इच्छा दुःख के कारण बन जाएगीl
इसका मतलब ये नहीं की आप कर्महीन हो जाओ, इन मंत्र और श्लोक का उद्देश निष्काम कर्म से हैं, जो ये करता है वो नर कहलाते हैं।
डॉक्टर रतीश चन्द्र मिश्र
वैदिक प्रवक्ता
Assistant Professor
PhD MSc NET
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
ईश्वर हर जगह विराजमान हैं, जो भी कुछ गतिमान जगत आप को दिखता है वो ईश्वर के कारण ही हैं, इसलिए इसका भोग भी त्याग पूर्वक करनी चाहिए, लालच नहीं करनी चाहिए, ये जब आपका शरीर भी आपका नहीं हैं (ये सब कुछ ईश्वर का ही है)
इस वेद मंत्र में, त्याग पूर्वक भोग, और लालच नहीं करने को कहा है क्यों कि ये आपका नहीं हैं, जिस प्रकार दूसरे के धन को लेने से लोग डरते हैं, या पूछ कर उपयोग करते हैं उसी प्रकार ईश्वर के बनाई सृष्टि को समझना चाहिए
कितनी सुन्दर व्यवस्था है ईश्वर का आप यहां से एक तिनका भी अपने साथ नहीं ले जा सकते पराया तो पराया आप अपना धन भी नहीं ले जा सकते, चाहे राजा हो या रंक सबके लिए एक न्याय व्यवस्था
डॉक्टर रतीश चन्द्र मिश्र
Assistant Professor
PhD MSc NET
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