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07/11/2024

प्रकृति पूजने वाले देश में,
जल जंगल और जमीन खतरे में क्यों?

Photos from ramsamujh_sharma's post 15/08/2024

आप सभी सम्मानित राष्ट्र प्रेमियों को स्वतंत्रता दिवस को ढेर सारी शुभकामनाएं।

29/06/2024

#घिर_आए_बदरा
बरसात की शुरुआत के साथ कजरी का मौसम आ गया है । कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित लोकगायन की वह उपशास्त्रीय शैली है , जिसमें कोमल मानवीय भावनाओं की कई - कई परतों की अभिव्यक्ति संभव हुई है । इसके जरिए कुंवारी लड़कियां पेड़ों पर लगे झूलों से आकाश नापने की कोशिश करती हुई वर्षा और हरियाली के प्रति उल्लास व्यक्त करती हैं । विवाहित स्त्रियां परदेश गए पतियों के प्रति विरह - वेदना प्रकट करती हैं , तो नव - व्याहताएं मायके में छूट गए रिश्तों की उपेक्षा का दर्द गाती हैं । कहा जाता है कि कजरी का जन्म मिर्जापुर और बनारस के गांवों में हुआ था । विंध्य क्षेत्र में गाई जाने वाली मिर्जापुरी अलग है । कहावत भी है कि लीला रामनगर की भारी , कजरी मिर्जापुर सरनाम । मिर्जापुरी कजरी में वर्षा की शीतलता व विरह के ताप के साथ सखी - सहेलियों , भाभी - ननद के रिश्तों की मिठास - खटास और मस्ती का रंग घुला होता है । बदलते समय के साथ लोक संगीत ने कई बदलाव देखे , पर कजरी जस की तस रही । इसका एक प्राचीन उदाहरण 13 वीं सदी के सूफी कवि अमीर खुसरो की रचना अम्मा मेरे बाबा को भेजोरी कि सावन आया है । अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की कजरी झूला किन डारो रे अमरैया आज भी गाया जाता है ।
#ध्रुव_गुप्त_की_फेसबुक_वॉल

13/02/2022

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