Indian Desi Folk
We have primarily chosen the medium of folk music as these folk songs reflect a wide spectrum of Indian culture. Every song tells an interesting story.
On the one extreme, they narrate stories that reflect the hopes and fears of common people. India is one of the most diverse countries in the world. This rich cultural diversity of India is reflected in its folk music. In modern India, the ancient culture of India breathes through its folk songs. And on the other extreme, the songs tell stories motivated by deep insights from the ancient Indian sc
10/06/2026
लोकगीत का तात्पर्य लोक में प्रचलित गीत ही है, जिसे दो अर्थ दिये जा सकते हैं-
१. अवसरविशेष के प्रचलित गीत तथा २. परम्परागत गीत।
लोक द्वारा निर्मित होने पर भी लोकगीत को किसी व्यक्तिविशेष से जोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि रचनाकार को उस गीत में समस्त लोक के व्यक्तित्व को उभारना होता है। लोकसाहित्य वस्तुतः जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा, जनता के लिये लिखा जाता है।
"The poetry of the people, by the people, for the people." अंग्रेजी में 'फ़ोक' का अर्थ है- लोक, राष्ट्र, जाति, सर्वसाधारण या वर्गविशेष ।
इसीलिए Folk Song के अनुरूप हिन्दी में लोकसंज्ञा दी गई है। अंग्रेजी का Folk Song जर्मनी के Volkslied का अपभ्रंश है। समस्त मानव समाज में चेतन-अचेतन के रूप में जो भावनाएँ गीतबद्ध हुई हैं, उन्हें लोकगीत कहा जा सकता है।
डॉ० बार्क ने 'फोक' शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि इससे सभ्यता से दूर रहने वाली किसी पूरी जाति का बोध होता है। ग्रिम का कथन है कि लोकगीत अपने आप बनते हैं-"A folk song composes itself."
ग्रिमन पेरी ने लिखा है कि लोकगीत आदिमानव का उल्लासमय संगीत है। "The primitive spontaneous music has been called folk-music.
राल्फ वी० विलियम्स का कथन है कि "लोकगीत न पुराना होता है न नया। यह तो जंगल के एक वृक्ष जैसा है, जिसकी जड़ें तो दूर जमीन में फैली हुई हैं, परन्तु जिनमें निरन्तर नई-नई डालियाँ, पल्लव और फल लगते हैं।"
लोकगीत हमारे जीवन विकास की गाथा हैं। उनमें जीवन के सुख-दुःख, मिलन-विरह, उतार-चढ़ाव की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। सामाजिक रीति एवं कुरीतियों के भाव इन लोकगीतों में हैं। इनमें जीवन की सरल अनुभूतियों एवं भावों की गहराई है।
लोकगीतों का विस्तार कहाँ तक है, इसे कोई नहीं बता सकता। किन्तु इनमें सदियों से चले आ रहे धार्मिक विश्वास एवं परम्पराएँ जीवित हैं। ये हृदय की गहराइयों से जन्मे हैं। श्रुति परम्परा से ये अपने विकास का मार्ग बनाते रहे हैं। अतः इनमें तर्क कम, भावना अधिक है। न इनमें छन्दशास्त्र की लौह श्रृंखला है, न अलंकारों की बोझिलता। इनमें तो लोकमानस का स्वच्छ और पावन गंगा-यमुना जैसा प्रवाह है। लोकगीतों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इनमें सहज स्वाभाविकता एवं सरलता है। इनमें सुख-दुःख, प्रेम और करुणा के विविध रंग हैं। कहीं पुत्रजन्म के अवसर पर हर्ष उल्लास के स्वर गूंजते हैं तो कहीं कन्या की विदाई या प्रियवियोग की बेला में करुणा के गीत मुखर होते हैं।
"लोकगीतों में भावों की अभिव्यक्ति स्वाभाविक और हृदय से निकली हुई लय के साथ होती है। हरे जंगलों में जैसे पंछी उन्मुक्त होकर गाते हैं, उसी प्रकार लोकगीत स्वाभाविक रीति से हृदय से फूटकर निकलते हैं। इनमें सरल काव्य होता है, भावों की खींचतान नहीं होती।"
लोकगीतों में लोक का समस्त जीवन चित्रित है। शिशु के प्रथम क्रन्दन से लेकर जीवन की अन्तिम कड़ी तक के भावचित्र इनमें हैं। भाई से मिलने को व्याकुल बहन की व्यथा-कथा, स्त्रियों का आभूषण-प्रेम, सास, ननद तथा सौत के अत्याचारों से पीड़ित स्त्री की मनोव्यथा, कृषकपरिवार की विपन्नता, वीरों की शौर्यगाथा तथा मिलन-विरह के रंगारंग भाव इन गीतों में मिलते हैं। दूसरे शब्दों में, इन लोकगीतों में जीवन का शाश्वत सत्य झलकता है।
मौखिक परम्परा से विकसित होते हुए इन लोकगीतों को वेदों के समान माना गया है, क्योंकि दोनों ही अधिक मात्रा में श्रव्य हैं। लोकगीतों की शैली सहज होती है और उनमें गेयतत्त्वों की प्रधानता होती है।
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05/06/2026
पर्यावरण दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ...
Music journey of Jodhpur .... जोधपुर का मेहरान गढ़ फोर्ट हो या उम्मेद भवन पैलेस , देख कर लगता है की हमारी सभ्यता हमारी संस्कृति कितनी महान रही है ।
नाटक में गणपति जी की प्रार्थना .....
नाट्य परम्परा में नाटक के शुरुआत गणपति जी की अराधना होती है......सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखित "बकरि" का गणपति प्रार्थना यहां प्रस्तुत है
उस्ताद डॉ मुजतबा हुसैन , भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया के एक प्रतिष्ठित बाँसुरी वादक, विद्वान और गुरु माने जाते हैं। वे Punjabi University Patiala में प्रोफेसर के रूप में भी जुड़े रहे हैं और उन्होंने संगीत शिक्षा तथा मंचीय प्रस्तुति—दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उनकी बाँसुरी वादन शैली में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गहराई, सूफियाना संवेदना और रागों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति विशेष रूप से दिखाई देती है। वे विशेषकर रागों की भावात्मक प्रस्तुति, मधुर आलाप और संतुलित लयकारी के लिए जाने जाते हैं।
Hindustani Classical Music के क्षेत्र में उन्होंने अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित किया और बाँसुरी को केवल एक वाद्य नहीं बल्कि “आत्मा की आवाज़” के रूप में प्रस्तुत किया। पंजाब, उत्तर भारत और देश के कई संगीत समारोहों में उनकी प्रस्तुतियाँ सराही गई हैं।
https://www.facebook.com/stories/118683063538958/UzpfSVNDOjI2NjM4NDEyOTU5MTczNTU5/?view_single=1
08/05/2026
बागोर की हवेली
यह हवेली मेवाड़ के प्रधानमंत्री अमरचंद बड़वा द्वारा 1751 से 1778 के बीच बनवाई गई थी।
बाद में यह हवेली महाराणा मेवाड़ के छोटे भाई महाराज शक्ति सिंह के निवास के रूप में उपयोग हुई।
1823 से 1864 के बीच इसे बागोर ठिकाने के महाराणा शक्तावत सिंह, शंभू सिंह और सज्जन सिंह आदि ने विकसित कराया।
पिछोला झील के किनारे बने गणगौर घाट पर महाराज भीम सिंह ने सुंदर महल बनवाया। बाद में 1878 में महाराणा शक्तावत सिंह ने तीन मंज़िला महल का निर्माण करवाया।
1930 में यह हवेली मेवाड़ राज्य द्वारा अधिग्रहित की गई और राज्य अतिथि गृह बनाई गई।
स्वतंत्रता के बाद राजस्थान सरकार ने इसका उपयोग सरकारी कर्मचारियों के आवास के रूप में किया।
1986 में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र को यह भवन सौंपा गया। इसके बाद संरक्षण और जीर्णोद्धार के बाद इसे संग्रहालय बनाया गया।
इस हवेली में:
138 कमरे
अनेक चौक
लंबे बरामदे
राजसी बैठक कक्ष
संगीत कक्ष
पूजा घर
भोजन कक्ष
आदि देखने योग्य हैं।
यह हवेली राजस्थानी जीवन शैली, वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत का सुंदर उदाहरण मानी जाती है।
06/05/2026
डॉ. निरंजन राज्यगुरु : लोकधारा के साधक
Dr. Niranjan Rajyaguru गुजरात की लोकसंस्कृति, संतवाणी और लोकगायन परंपरा के महत्वपूर्ण शोधकर्ताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने अपना जीवन लोकधारा, लोकगायकों और संत परंपरा के संरक्षण के लिए समर्पित किया। विशेष रूप से सौराष्ट्र और काठियावाड़ की लोक परंपराओं पर उनका कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
डॉ. राज्यगुरु के पास लोकसाहित्य, संतवाणी, लोकभजन और दुर्लभ लोकधुनों का विशाल संग्रह है। कहा जाता है कि उनके संग्रह में लगभग 18 हज़ार से अधिक लोकगीत, भजन, दोहे, कथाएँ और लोकध्वनियों का दस्तावेजीकरण सुरक्षित है। यह केवल संग्रह नहीं, बल्कि गुजरात की लोकस्मृति का जीवित अभिलेख है।
उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर उन लोकगायकों और संतों की वाणी को संजोया, जिनकी परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। उनके शोध का एक महत्वपूर्ण पक्ष “जीवनदासी संत” परंपरा है। जीवनदासी संतों की वाणी में भक्ति, करुणा, श्रम और जनजीवन की गहरी अनुभूति मिलती है। डॉ. राज्यगुरु ने इन संतों के पदों और लोकगायन को केवल अकादमिक विषय नहीं माना, बल्कि उन्हें जनमानस की आत्मा के रूप में देखा।
लोकगायक के रूप में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। वे मंच पर केवल प्रस्तुति नहीं देते, बल्कि गीतों के पीछे छिपे इतिहास, लोकविश्वास और सांस्कृतिक संदर्भों को भी सामने लाते हैं। उनके गायन में मिट्टी की सुगंध, लोकभाषा की आत्मीयता और संतवाणी की आध्यात्मिक गहराई एक साथ दिखाई देती है।
घोड़ा-बदर जैसे लोक आख्यानों और ग्रामीण सांस्कृतिक परंपराओं पर उनका कार्य गुजरात की मौखिक परंपरा को समझने में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोकसाहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संघर्ष और संवेदना का दस्तावेज होता है।
आज के समय में, जब आधुनिकता के दबाव में लोकपरंपराएँ तेजी से बदल रही हैं, डॉ. निरंजन राज्यगुरु जैसे शोधकर्ता भारतीय लोकसंस्कृति के प्रहरी की तरह दिखाई देते हैं। उनका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत को बचाने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
24/02/2026
Song Recording with # vijay verma khan Tiwari at Yashraj Studio
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