Har har mahadev
Ayurveda .
Kya hoga
Sudhar jawo
“यह एक सोची-समझी राजनीतिक चाल नजर आती है, जिसमें जाति और पात की लड़ाई को खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में भड़काया जा रहा है। सवाल यह है कि ऐसी स्थिति अन्य राज्यों—महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल या ओडिशा—में क्यों नहीं दिखती?
इससे यह संदेह होता है कि कहीं न कहीं इन राज्यों को कमजोर और पिछड़ा बनाए रखने की कोशिश तो नहीं की जा रही। यूजीसी जैसे मुद्दों को भी एक अलग दिशा देकर भ्रम पैदा किया जा रहा है।
जरूरत है कि लोग इस बात को समझें और आंतरिक रूप से सोचें कि आखिर किसका फायदा हो रहा है और किसका नुकसान। केवल भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि सच्चाई को समझकर निर्णय लेना जरूरी है।”
जब दुनिया में न गाड़ियाँ थीं, न इंजन…
तब धरती खुद “काला सोना” उगलती थी।
प्राचीन मेसोपोटामिया में लोग
इस गाढ़े काले तेल (बिटुमेन) से
🏗️ मंदिर बनाते थे
🚢 नावों को जलरोधक करते थे
🧱 ईंटों को जोड़ते थे
यह सिर्फ तेल नहीं था…
यह उस समय की “टेक्नोलॉजी” था!
इतना ही नहीं…
कई जगह जमीन से निकलने वाली गैस
अपने आप जलती रहती थी 🔥
लोग इसे “भगवान की अनंत आग” मानते थे।
👉 सोचिए…
जिस चीज़ को आज हम पेट्रोल-डीजल के रूप में जलाते हैं,
वही कभी सभ्यता को जोड़ने का काम करती थी।
💭 समय बदलता है… चीज़ें नहीं, उनका इस्तेमाल बदलता है।
आज आप सभी देख रहे हैं और स्वयं भी उपयोग कर रहे हैं —
डिजिटल दुनिया, ऑनलाइन फूड, दवाइयाँ और बहुत कुछ।
लेकिन एक कहावत है —
“अपने ही हाथों अपना नुकसान करना, जिस डाली पर बैठे हैं उसी को काटना।”
इसी बात को समझिए…
जैसे किसी भी मरीज को दवा देने से पहले उसकी प्रकृति (वात, पित्त, कफ) को समझना जरूरी होता है।
चाहे वह आयुर्वेदाचार्य हो या एलोपैथिक डॉक्टर —
जब तक आप उनके पास जाकर सही जांच नहीं कराते, तब तक सही इलाज संभव नहीं है।
लेकिन आज क्या हो रहा है?
लोग जल्दबाजी में हैं…
कोई भी बीमारी हो, इंटरनेट पर देखा और दवा खा ली।
ऐसा नहीं होता, मेरे दोस्त।
हम इस आधुनिक दुनिया में बिना दिशा के दौड़ रहे हैं,
जैसे कोई घोड़े पर सवार हो, पर उसे यह न पता हो कि जाना कहाँ है।
अपनी जिंदगी को पैकेट बंद चीज़ों की तरह मत बनाइए,
और अपने दिमाग को भी “रेडीमेड सोच” तक सीमित मत रखिए।
आप जानते हैं —
विकासशील और विकसित देश में अंतर क्या होता है?
कभी-कभी विकास की अंधी दौड़ इंसान को तनाव और असंतुलन की ओर ले जाती है।
अगर संतुलन खो गया, तो वही विकास हमारे लिए बोझ बन जाएगा।
आज AI क्या कर रहा है?
वह ज्ञान को एक जगह समेट रहा है…
लेकिन क्या हम खुद सोचने की क्षमता खोते जा रहे हैं?
ऑनलाइन दुनिया हमें क्या बना रही है — इस पर सोचिए।
आने वाले भविष्य को बिगाड़िए मत,
उसे ऐसा बनाइए जो संतुलित, सुरक्षित और मानवीय हो।
देश के साथ गद्दारी करने वाले और भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को जनता भी जानती है, कानून भी जानता है और संविधान भी जानता है। फिर भी आखिर क्यों और कैसे ये लोग सत्ता की कुर्सी पर बैठे हुए हैं?
इन लोगों को सत्ता से हटाया क्यों नहीं जाता? एक पार्टी दूसरी पार्टी के बारे में सब कुछ जानती है, फिर भी एक-दूसरे के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या ये सभी आपस में मिले हुए हैं?
आखिर ये लोग जनता को क्या समझते हैं?
पहले लोग “कांग्रेस मुक्त भारत” की बात करते थे, लेकिन अब समझ नहीं आता कि कुछ लोग “भाजपा मुक्त भारत” क्यों चाहते हैं — ऐसा क्यों हो रहा है?
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