Acharya Pankaj Pathak
Ayurveda
05/02/2026
Psoriasis is Not a Curse; It Can Be Cured with Ayush Medicine!
About 8 months ago, it was OPD day at Ayush Gram (Trust) Hospital, Chitrakoot. The hospital was crowded. Suddenly, a foul smell filled the air. A nurse informed me that a patient severely afflicted with Psoriasis had arrived, emitting a strange odor. Given the emergency, we allowed him in immediately.
The patient, a teacher from Shahdol (M.P.), was in a distorted state. He suffered from both Psoriasis and Diabetes. He had tried English medicines for 5 years, but his condition only worsened. He felt he was counting his final days.
The Ayurvedic Perspective:
We explained that in Ayurveda, this is called 'Ekakushtha'. It is not caused by germs but occurs when the Vata dosha becomes aggravated in the skin, leading to scaling (like fish scales), dryness, and cracking. While modern medicine often uses steroids that merely suppress the disease, Ayurveda looks at the root: wrong lifestyle and diet.
Aggravated Vata contaminates the Rasa (plasma), Rakta (blood), and Mansa (muscle) tissues. Since the skin is an "updhatu" (secondary tissue) of the muscle, it becomes diseased. Modern doctors call this an "Autoimmune Disease" (OID).
The Treatment Plan:
We prescribed a combination of Ayurvedic herbo-mineral formulations (including Tal Sindoor, Vasant Kusuma Kar Ras, and Kaisore Guggulu) and oils for local application.
Dietary Restrictions (Pathya):
Strict avoidance of milk and milk products, sugarcane products, sour foods, curd, non-veg, and fermented foods. We also emphasized the "Mental Factor"—negative actions and stress release toxins that aggravate skin diseases.
The Result:
After just one month, the teacher walked in happy and full of life. After 6 months of treatment, he is thriving and back to his job. It is a tragedy that many suffer simply because they are unaware of the power of Ayush medicine.
தோரியாசிஸ் (காளஞ்சகப்படை) ஒரு சாபமல்ல; இது ஆயுஷ் மருத்துவத்தால் குணமாகும்!
சுமார் 8 மாதங்களுக்கு முன்பு, சித்திரகூடத்திலுள்ள ஆயுஷ் கிராம் மருத்துவமனையில் நோயாளிகள் கூட்டம் அதிகமாக இருந்தது. அப்போது ஒருவிதமான துர்நாற்றம் பரவியது. சோரியாசிஸ் நோயால் கடுமையாக பாதிக்கப்பட்ட ஒரு நோயாளி வந்திருப்பதாக செவிலியர் கூறினார். அவரின் உடல்நிலை மோசமாக இருந்ததால், அவரை உடனடியாக பரிசோதிக்க அனுமதித்தோம்.
மத்திய பிரதேசத்தைச் சேர்ந்த அந்த நோயாளி ஒரு ஆசிரியர். அவருக்கு சர்க்கரை நோயும் சோரியாசிஸும் இருந்தது. 5 ஆண்டுகளாக ஆங்கில மருத்துவம் பார்த்தும் உடல்நிலை மோசமானதால், அவர் நம்பிக்கையிழந்த நிலையில் இருந்தார்.
ஆயுர்வேத பார்வை:
ஆயுர்வேதத்தில் இது 'ஏககுஷ்டம்' என்று அழைக்கப்படுகிறது. இது கிருமிகளால் வருவதல்ல; உடலில் 'வாதம்' சீர்கெட்டு தோலில் தங்குவதால் ஏற்படுகிறது. இதனால் தோல் மீன் செதில்கள் போல உதிர்தல், வறட்சி மற்றும் வெடிப்புகள் உண்டாகும். நவீன மருத்துவத்தில் ஸ்டெராய்டுகள் மூலம் நோய் தற்காலிகமாக அழுத்தப்படுகிறதே தவிர, வேரோடு குணமாவதில்லை.
தவறான உணவுமுறை மற்றும் வாழ்க்கை முறையால் வாதம் சீர்கெட்டு, ரத்தம் மற்றும் தசை திசுக்களை மாசுபடுத்துகிறது. இதன் விளைவாகவே தோல் நோய் உண்டாகிறது.
சிகிச்சை முறை:
நாங்கள் அவருக்கு ஆயுர்வேத மருந்துகள் (கைஷோர குக்குலு, வசந்த குசுமாகர ரசம் போன்றவை) மற்றும் வெளிப்பூச்சு எண்ணெய்களை வழங்கினோம்.
உணவு கட்டுப்பாடுகள்:
பால் மற்றும் பால் பொருட்கள், கரும்பு சர்க்கரை, புளிப்பான உணவுகள், தயிர் மற்றும் அசைவ உணவுகளை முற்றிலும் தவிர்க்கச் சொன்னோம். மன அழுத்தம் மற்றும் தவறான எண்ணங்கள் கூட உடலில் நச்சுக்களை உருவாக்கி தோல் நோயை அதிகரிக்கும் என்பதை விளக்கினோம்.
முடிவு:
ஒரே மாதத்தில் அந்த ஆசிரியர் மகிழ்ச்சியுடன் நடந்து வந்தார். 6 மாத சிகிச்சைக்குப் பிறகு, அவர் இப்போது ஆரோக்கியமாக தனது பணியைத் தொடர்கிறார். நம் நாட்டு மருத்துவமான ஆயுஷ் முறையைத் தெரியாமல் மக்கள் அவதிப்படுவது வருத்தத்திற்குரியது.
सोरायसिस अभिशाप नहीं यह आयुष चिकित्सा से ठीक होता है!!
लगभग ८ माह पहले की बात है, आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालय, चित्रकूट की ओपीडी का दिन था, रोगियों की भीड़ भी। डॉक्टर, नर्स, कम्पाउण्डर सभी सेवा में व्यस्त थे। तभी यकायक एक तेज झोंका आया और सभी जगह दुर्गन्ध पैâल गयी। हमारी ओपीडी में दरवाजे जैसे ही खुले वैसी ही बदबू वहाँ भी आ गयी। मैं जब तक समझता कि यह दुर्गन्ध कहाँ की आयी वैसे ही एक नर्स ने आकर बताया कि सर! सोरायसिस से भयंकर ग्रस्त जिसके शरीर से विचित्र बदबू आ रही है, लाया गया है। रोगी बहुत जीर्ण है, उसके साथ वाले उसे इमरजेन्सी में देखने का निवेदन कर रहे हैं। इमरजेन्सी होने के कारण हमने तत्काल उसे लाने की अनुमति दी, अन्यथा सभी रोगी क्रम से ही देखे जाते हैं। विश्वास करें कि सोरायसिस ने उस व्यक्ति को इतना विकृत कर दिया था कि मैं स्वयं विचलित हो गया, पर साहस और सावधानी जैसे चिकित्सक गुणों से मैंने परीक्षण किया। रोगी ने बताया कि वह मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के औता प्राथमिक पाठशाला में ‘शिक्षक’ हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनको शुगर की भी बीमारी है और सोरायसिस भी। अंग्रेजी डॉक्टरों से चिकित्सा कराता रहा और शरीर की यह दुर्गति होती गयी। अब मौत के दिन गिन रहा हूँ। नौकरी से छुट्टी लिये हूँ।
हमने रोगी और उसके परिजनों को समझाया कि आप परेशान न हों, यह ठीक भी हो जायेंगे और नौकरी भी करेंगे। पर संभव है कि चिकित्सा २४ से ३० माह तक भी करनी पड़ सकती है, उसने कहा सर! अंग्रेजी डॉक्टरों से तो ५ साल इलाज कराता गया, शुगर अलग से हो गयी। शरीर बेजान हो गया है, मैं २४ से ३० माह क्या ४ साल भी यहाँ से इलाज लूँगा। हमने समझाया कि इसे आयुर्वेद में ‘एककुष्ठ’ कहते हैं।
अस्वेदनं महावस्तु यन्मत्स्यशकलोपम्। तदेक कुष्ठम्।।
च.चि. ७/२१
उसके परिजनों को यह भी बताया कि यह रोग किसी कीटाणु जीवाणु से नहीं होता बल्कि शरीर का वात त्वचाश्रित हो जाता है फिर कुपित (Aggrivate or Hyper) हो जाता है। परिणामत: त्वचि स्फुटनरुक्षते।। अ.सं.नि. १५/१२ त्वचा फटती है, छिलके निकलते हैं और रूखापन होता है। इसे कुष्ठ इसलिए कहा गया है कि ‘कुष्णाति अंगं बपु: य:’ यह अंगों को कुरूप कर देता है इसीलिए इसे कुष्ठ रोग कहते हैं।
दरअसल ‘सोरायसिस’ को अंग्रेजी डॉक्टर कभी न ठीक होने वाली बीमारी बताते हैं, तो कुछ डॉक्टर केनाकार्ट, स्टेरॉयड आदि देते रहते हैं जिससे रोग केवल दब जाता है फिर भयंकर रूप से उभरता है और जटिल हो जाता है। हमने समझाया कि गलत खान-पान और रहन-सहन (गलत जीवनशैली) के कारण से ‘वात’ दोष कुपित (Aggrivate) होता है यह रसधातु, रक्तधातु और मांसधातु को दूषित करता है, चूँकि उपधातु ‘त्वचा’ मांसधातु से सम्बन्ध रखती है। (च.चि. १५/१९-२०) और ज्यों-ज्यों मांस धातु दूषित होती है तो त्वचा भी विकारग्रस्त होने लगती है उसमें रक्तवह और मांसवह स्रोतस् अतिप्रवृत्ति दोष से ग्रसित हो जाते हैं और त्वचा का निर्माण तथा क्षरण बड़ी तेजी से होने लगता है। बस! यही सोरायसिस है, इसे अंग्रेजी डॉक्टर ‘आटो इम्युन डिजीज’ (ओआईडी) कहते हैं। चूँकि इन्हें मधुमेह भी है अत: इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और कमजोर हो गयी, परिणामत: रोग और बिगड़ गया। हमने सांत्वना दी कि परेशान न हों, निश्चित लाभ मिलेगा।
दरअसल यहाँ पर लगातार कई वर्षों से सोरायसिस रोगियों की चिकित्सा की जा रही है और कई हजार सोरायसिस रोगियों की चिकित्सा की जा चुकी है। रोग, रोगी के अनुसार सभी में सकारात्मक परिणाम आते हैं। पश्चात् हमने निम्नांकित चिकित्सा व्यवस्था विहित किया-
सोरायसिस क्योर योग- ताल सिन्दूर ५ ग्राम, वृ.वातचिन्तामणि रस ३ ग्राम, वसंत कुसुमाकर रस ३ ग्राम, प्रबालपंचामृत मु.यु. ८ ग्राम, माणिक्य पिष्टी ५ ग्राम, हरिद्राघनसत्व और निम्बघन १५ ग्राम और असरोल चूर्ण ३० ग्राम। सभी को घोंटकर ६० मात्रा पानी से।
- कैशोर गुग्गुल, वातारि गुग्गुल, पंचतिक्त घृत गुग्गुल, निर्गुण्डी पराश्रयीकन्द, गिलोय घन और चोपचीनी सभी २०-२० ग्राम मिलाकर ६० मात्रा। १-१ मात्रा दोपहर व रात भोजन के ३० मिनट पूर्व गरम जल से।
गुग्गुलतिक्तक घृतम्- १०-१० ग्राम सुबह ५ बजे और शाम को ५ बजे पिघलाकर गरम जल से।
ल् सोरिया ऑयल दिन में २ बार मालिश करना है पश्चात् स्नान करना है।
सोते समय धेनुहरीतकी २ गोली गरम पानी से।
पथ्यपालन में- भैषज्य रत्नावलीकार के वचनों को ध्यान रखा गया कि दूध और दूध से बने पदार्थ तथा गन्ना और गन्ने से बने पदार्थ पूरी तरह से वर्जित किया गया।
दूषित कार्यों/कर्मों में लिप्त रहना, किये हुये उपकारों को न मानना, गुरु और गुरुतुल्य लोगों की निन्दा करना, उन्हें तकलीफ पहुँचाना, इन कार्यों से दूषित हार्मोन्स (रस) मस्तिष्क में स्रवित होते हैं फिर वे शरीर में शोषित होकर शरीर में विषाक्तता उत्पन्न करते हैं जिससे सामान्य या कठिन चर्म विकार होते हैं। ऐसे ही गलत तरीके से भोजन, गलत तरीके से पेय पदार्थ लेने, दिन में सोना, प्रचण्ड सूर्यताप में रहना, मिथ्याहार, स्वेदकर्म, मैथुन कर्म में गलत विधि अपनाना, मल, मूत्र के वेगों को रोकना, गन्ना से बने पदार्थों का सेवन, अति शारीरिक पिरश्रम, खट्टे पदार्थ, तिल, उड़द, द्रवान्न (खिचड़ी आदि), भारी अन्न, दाह पैदा करने वाले पदार्थ, कब्ज करने वाले पदार्थ, मूली, सलाद, दूषित जल, मांसाहार, अण्डा, दही, दूध, गुड़, मद्य आदि पदार्थों को इस रोगी को सेवन नहीं करना चाहिए।
आयुर्वेद विज्ञान में बताये ये परहेज पूरी तरह से वैज्ञानिक हैं। अभी १६ जनवरी २०१८ को अमेरिका के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्त्ताओं ने सचेत किया कि स्तन वैंâसर के रोगियों को ब्रेड और सोयाबीन का सेवन नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि इनमें जीनोस्ट्रोजीन्स पाया जाता है, ये रोग को बढ़ाते हैं तथा दवाओं के प्रभाव को कम करते हैं।
चूँकि इस सोरायसिस के रोगी को मधुमेह भी था इसलिए मीठी चीजें स्वत: नहीं लेता था। इसलिए उस सोरायसिस ग्रस्त शिक्षक की चिकित्सा करना और सहज हो गया। अन्यथा रोगी को यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि मीठा न खाओ क्योंकि इस रोग को मधुर रस भी बढ़ाता है, वह इसलिये कि मधुर रस के अति सेवन से रसधातु की विकृति हो जाती है और उधर मांसधातु ‘कफ’ दोष से सम्बन्ध रखती है, तो उधर रसधातु भी कफदोष से सम्बन्ध रखती है जो कि पृथ्वी महाभूत और जल महाभूत से निर्मित है। मधुर रस, रसधातुु, कफदोष ये तीनों पृथ्वी महाभूत को बढ़ाते हैं। इसलिए सोरायसिस बढ़ता है।
एक माह बाद जब यह शिक्षक पुन: दिखाने आया तो अपने से चलकर आया और बहुत खुश था, बार-बार यही कहता था कि चित्रकूट आकर मैं ‘आयुष ग्राम चिकित्सालय’ में जीवनदान पा गया, नहीं तो लगता था कि अब जियेंगे ही नहीं। आज चिकित्सा करते हुये ६ माह हो गये रोगी इतना खुश है जो कि वर्णनातीत है। अभी पिछले बुधवार को शहडोल से वे शिक्षक पुन: दिखाने आये और २ माह की औषधियाँ लेकर चले गये।
जरा सोचें कि देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारे भारत की चिकित्सा आयुष इसी देश में विद्यमान है जबकि ज्ञान और जागरूकता के अभाव में मानव कष्ट उठा रहा है, यत्र-तत्र भटक रहा है।
03/02/2026
আপোনাৰ শিশুটোৱেও মুখেৰে উশাহ লয় নেকি ? যদি মুখেৰে উশাহ লয় , তেন্তে আপুনি সজাগ হওঁক । মুখেৰে উশাহ লোৱা শিশুৰ বিভিন্ন ৰোগ হব পাৰে । যেনে : টনছিল , হাঁপানী , মিৰ্গী , Hyper activity , চকুৰ দৃষ্টি কমি যোৱা , চকু কেৰা হোৱা , কথা স্পষ্ট নোহোৱা , শাৰীৰিক পংগু আদিৰ উপৰিও সঘনাই জ্বৰ, পানীলগা , টনছিল আদি হৈয়েই থাকিব ।
যেতিয়া মানুহ এজনে নাকেৰে উশাহ নলৈ মুখেৰে লয় , তেতিয়া সেই বায়ু ফিল্টাৰ হব নোৱাৰে । দূষিত বায়ু পোন প্ৰথমে গলেৰে পাৰ হৈ গৈ হাওঁফাওঁ পাব । নাকেৰে উশাহ ললে বায়ু ফিল্টাৰ হৈ যায় ।
গলেৰে দূষিত বায়ু পাৰ হৈ গৈ প্ৰথমে টনছিল কৰিব । পাছত হাওঁফাওঁ পালে হাওঁফাওঁৰ বিভিন্ন ৰোগ হব । ইয়াৰ ভিতৰত হাঁপানী , হাওঁফাওঁৰ সংক্ৰমক , ব্ৰংকাইটিছ আদি আজীৱন ঠিক নোহোৱা ৰোগে প্ৰধান । সঘনাই কাহ , চৰ্দি জ্বৰ আদি হৈ থাকিব দূষিত বায়ু হাওঁফাওঁলৈ গলে ।
মুখেৰে উশাহ ললে মানুহৰ ব্ৰেইনত অক্সিজেন নাযায় । ফলত সেইজন মানুহে কোনো এটা কথা ভালকৈ ভাবিব নোৱাৰে । মানুহজন অস্থিৰ হৈ যায় বা hyper activity হয় । ব্ৰেইনত অক্সিজেন নাপালে মানুহ এজনৰ ব্ৰেইনৰ শিৰাবোৰত কফ জমা হৈ গৈ মিৰ্গী বেমাৰ বা seizure হয় । টোপনি বহুত কম হয় আৰু একদম খিংখিঙীয়া হয় । ব্ৰেইনত অক্সিজেন নাপালে সেই মানুহজনৰ বিভিন্ন মানসিক ৰোগ হয় । ব্ৰেইনত অক্সিজেন নাপালে কফ জমা হৈ ব্ৰেইন টিউমাৰ পৰ্য্যন্ত হব পাৰে ।।।
এতিয়া কথা হল মুখেৰে উশাহ কি পৰিস্থিতিত লব লগা হয় শিশুৱে ??
যেতিয়া শিশু এটাৰ নাক বন্ধ হৈ যায় , তেতিয়া শিশুটোৱে মুখেৰে উশাহ লয় ।
শিশুৰ নাক কিয় বন্ধ হয় ?
শিশুৰ নাক বন্ধ হয় শিশুক মালিচ নকৰা , শিশুক ঘিঁউ , মৌ আদি নুখুওৱা , শিশুক শিশুখাদ্যৰ পৰা বঞ্চিত কৰি বজাৰত টেমাত ভৰাই অনা খাদ্য আদি খুওৱাৰ বাবেই বেছিকৈ শিশুৰ নাক বন্ধ হয় ।
ইয়াৰ ভিতৰত আটাইতকৈ গুৰুত্বপূৰ্ণ কথাটো হল শিশুৰ মালিচ । জন্মৰ পৰা 14 বছৰলৈ শিশুক মালিচ কৰিব কৈছে আয়ুৰ্বেদত । যদি 6 বছৰ হলেও মালিচ কৰে , তেন্তে শিশুৰ মেডিকেল খৰচ শূণ্য হব । ইয়াৰ লগতে শিশুক বিলোনা ঘিঁউ , জংঘলৰ মৌ আদি খুৱাব নিয়মিত ।
ইতিমধ্যে যিবোৰ শিশুৰ নাক বন্ধ হৈ গৈছে , তেওঁলোকে সেইবোৰ শিশুক নিতৌ কালজিৰা তেলৰ মালিচ কৰক । নাকত বিলোনা ঘিঁউ গৰম কৰি দুই টুপালকৈ দিয়ক । 2-3 মাহ দিলে নাকৰ বিন্ধা সম্পূৰ্ণ খোল খাই যাব ।।।
ইতিমধ্যে যিসকল শিশুৰ মানসিক বিকৃতি বা hyper activity বা অইন মানসিক বিকৃতি হৈছে , তেওঁলোকৰ 99% ৰ ক্ষেত্ৰত মাক দেউতাকে দেখা পাব যে শিশুটিয়ে মুখেৰে উশাহ লৈ আছে । এই ক্ষেত্ৰত মাক দেউতাকে শিশুটিক মানসিক ৰোগী বুলি ভুল চিকিৎসা কৰি শিশুটিক মাৰি পেলাব বা অন্ধকাৰ ভৱিষ্যতলৈ ঠেলি দি আছে । তেওঁলোকে মোক ব্যক্তিগতভাৱে লগ কৰক
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