Dr BR ambedkar motivation
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Jai bhim jai savidhan
07/12/2022
आज की रात हमारे सुपरहीरो की आख़िरी रात थी। बाबा साहब बुद्धा एंड हिज धम्मा किताब पर काम कर रहे थे। देर रात तक काम किया और किताब को छाती पर रख हमेशा के लिये सो गये। नमन बाबा साहब 🙏🏾
27/09/2022
Jay bhim jai savidhan
21/09/2022
आजादी की लड़ाई में चमार जाति के रणबाकुरे अपने साहस और पराक्रम से अंग्रेजी हुकूमत के नींद उड़ाने वाले उदैया चमार का आज ही फांसी दिवस हैं। अपने इस वीर सपूत को श्रध्दा सुमन अर्पित करते हुए कोटि कोटि नमन करते हैं
🙏
16/09/2022
पटेल: मिस्टर अम्बेडकर, आप महंगे सूट पहनते हैं जबकि आपके लोग बिना कपड़ों के और नग्न रहते हैं? मिस्टर गांधी को देखिए, वे आपके लोगों की तरह बिना कपड़ों के रहते हैं। वह आपके लोगों के सच्चे नेता है।
डॉक्टर अम्बेडकर : मिस्टर पटेल, मेरे लोग 1000 साल से बिना कपड़ों के और नग्न रह रहे हैं। श्रीमान गांधी उनके तरह वेष करते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि वे अगले 1000 वर्षों तक बिना कपड़ों के रहें। मैं चाहता हूं कि मेरे लोग अच्छे कपड़े पहनें और जल्द से जल्द एक अच्छा जीवन व्यतीत करें।
11/09/2022
बाबासाहेब के बारे में निरंतर रिसर्च कर नए तथ्य और सत्य प्रस्तुत करने का मेरा मक़सद सनसनी फैलाना नहीं है बल्कि यह स्थापित करना है कि 'भीमराव' को 'बाबासाहेब' बनाने की जटिल यात्रा की शुरुवात उनके पिता और उनकी सामाजिक चेतना से आरंभ होती है, जिसे ब्राह्मणवादियों ने भ्रामक तथ्य गढ़ कर मिटा सा दिया है, ताकि 'आंबेडकर' बनने का फॉर्मूला ही मिट जाए।
हर परिस्थिति से निबटने के लिए बाबासाहेब को उनके पिता और भाई ने अपना खून-पसीना जलाकर तैयार किया था, जिसकी उपेक्षा आपके समाज मे दूसरा 'आंबेडकर' कभी पैदा न होने देगी।
रामजी बाबा जैसे दूरदृष्टा पिता का श्रेय यदि आप किसी काल्पनिक ब्राह्मण गुरु को दे दें तो आपका समाज अपने अंदर का 'आंबेडकर' कभी न जगा सकेगा।
बहरहाल, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के बड़े भाई 'आनंदराव' जी का भी सरकारी रिकॉर्ड प्राप्त कर लिया गया है, जिसे जो चाहे, जब चाहे स्वयं जाकर वेरिफाई कर ले।
आनंदराव जी के स्कूल में दाखला करवाते हुए उनका नाम 'लक्ष्मण' दर्ज कराया गया था, जिसकी विस्तृत जानकारी निम्न प्रकार है;
नाम: लक्ष्मण रामजी आंबेडकर
जन्म दिनांक: १४/०२/१८८७
स्कूल दाखले की तारीख: ०४/०१/१८९९
स्कूल छोड़ने की तारीख: सितंबर १९०४
स्कूल में कक्षा क्रमांक: सातवीं (ब)
(सादर जानकारी का स्कैन फ़ोटो पोस्ट किया जा रहा है)
तथाकथित आंबेडकरवादियों, जिन्हें हम ब्राह्मणवाद के झुझारू एजेंट्स भी मान सकते हैं, उनसे एक छोटा सा सवाल करना चाहता हूँ कि यदि मैं खोजबीन कर बाबासाहेब और उनके बड़े भाई आनंदराव जी के स्कूल के सरकारी रिकार्ड्स प्राप्त कर सकता हूँ तो क्या वे उस स्कूल में शिक्षक रहे ब्राह्मण 'आंबेडकर' गुरुजी के नौकरी का रिकॉर्ड प्राप्त नहीं कर सकते!?
ब्राह्मणवादी एजेंट बन कर मुझ पर और बाबासाहेब के असली इतिहास पर कीचड़ उछालने के बजाए सातारा जाइये और उस ब्राह्मण शिक्षक के रिकार्ड्स ढूंढ लाइये, और साबित कर दीजिए ब्राह्मण गुरु की थ्योरी।
दुसरी बात; यदि प्रतापसिंह हाई स्कूल, सातारा में बाबासाहेब का नाम नहीं बदला गया तो क्या प्राइमरी स्कूल में बाबासाहेब का नाम बदला गया था!?
क्या उस ब्राह्मण शिक्षक को दिव्य-आकाशवाणी हुई थी कि पहली बार एडमिशन लेने आये नन्हा भिवराव आगे चलकर एक महान व्यक्ति बनने वाला है इसलिए उसका नाम आज ही बदल देना चाहिये!? यदि नहीं तो उस स्कूल से पढ़े अन्य कितने अछूत विद्यार्थियों का नाम बदलकर 'आंबेडकर' किया था उस दयालु ब्राह्मण शिक्षक ने!?
हकीक़त यह है कि ऐसा कोई संदर्भ आपको कहीं मिलेगा ही नहीं, क्योंकि ऐसा कभी हुआ ही नहीं था।
तीसरी बात; धनंजय कीर, जिनकी पहली किताब माफ़ी वीर सावरकर पर है तथा आचार्य अत्रे, इन ब्राम्हणों द्वारा रचित किताबों और नवयुग में प्रकाशित एक मुलाक़ात का संदर्भ देने की बजाये बाबासाहेब आम्बेडकर जी ने क्या स्वयं अपने किसी लिखे ग्रंथ में इसका उल्लेख किया है? उसका संदर्भ दीजिए।
वरना तो आज RSS भी बाबासाहब पर कई सारी किताबें लिखती है, क्या उसे भी सच मान लें!?
बाबासाहेब ने अपने आत्मचरित्र का हिस्सा “Waiting for a VISA” इस पुस्तक में इंगित किया है, जिसमें उन्होंने अपने स्कूली जीवन का भी ज़िक्र किया है किंतु किसी ब्राह्मण शिक्षक ने उन्हें अपना नाम दिया हो, जैसी ऐतेहासिक विशिष्ट घटना का उन्होंने कहीं उल्लेख तक नहीं किया!
क्या बाबासाहेब जैसे प्रखर इतिहासकार एवं लेखक ऐसी बात को लिखना ज़रूरी न समझते!? यह सवाल मैं आपके बौद्धिक विवेचना के लिए यहीं छोड़ रहा हूँ।
― राजरत्न आंबेडकर.
10/09/2022
साथियों इस सच्ची घटना को लिखते हुए आँखो के आँसू नही रूके !
1932 की बात है, बाबासाहब एक साथी वकील गडकरी के साथ एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए पुणे जा रहे थे। पनवेल में रोड किनारे एक चाय की दुकान देखकर चाय पीने के लिए रुके। गाड़ी में बैठे हुए ही गडकरी ने आवाज दी, "भाई दो कप चाय भिजवाना। चाय अच्छी बनाना गाड़ी में डॉ. आंबेडकर बैठे हैं"।
हर ग्राहक की तरह ही दुकान पर लगा हुआ लड़का दो गिलास पानी लेकर गाड़ी की तरफ जाने लगा। चाय वाले ने लडके के हाथ पर हाथ मारा और दोनो गिलास गिर कर टूट गए। चाय वाले ने गुस्से में बोला, "बहुत पढ़-लिख गया है तो ब्राम्हन थोड़े ही बन जायेगा। तुम लोगों को चाय तो क्या पानी भी मिलने वाला नहीं"।
वंही खड़ा पास के गाँव का एक मजदूर सोनबा यह दृश्य देख रहा था| वह चिल्लाया, "मेरे बाबा को तुम पानी भी नहीं पिला सकते हो अपने बाबा को मैं पानी पिलाऊंगा"। यह कह कर वह मजदुर पानी लाने के लिए अपने गाँव की तरफ दौड़ पड़ा।
बाबासाहब डॉ. आंबेडकर का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने कहा, "उफ़! इतनी छुआछूत! जातिवाद से भरी हुई घृणित मानसिकता! जातीय अहंकार ने मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा"। उन्होंने गडकरी से आगे बढ़ने के लिए कहा।
थोड़ी देर में सोनबा पानी का भरा मटका लेकर वहां पहुंचा। लेकिन बाबासाहब जा चुके थे।
वह बहुत निराश, हताश, दुखी हुआ आँख से आंसू बहने लगे रोते-रोते बस यही कह रहा था, "मेरे बाबा प्यासे रह गए, मैं उन्हें पानी नहीं पिला सका"। और घड़ा लेकर रात तक वहीँ एक पेड़ के नीचे बैठा रहा।
अब सोनबा का यह नियम बन गया, जो कि निरंतर सात साल तक चलता रहा। वह हर रोज सवेरे पानी का घड़ा भर कर वहीँ पेड़ के नीचे आकर बैठ जाता और रात को ही वहां से वापस जाता। सोनबा बस यही बड़बड़ाता रहता, "हाय! मेरे बाबा प्यासे चले गए, उन्हें बहुत प्यास लगी होगी, मैं उन्हें पानी जरूर पिलाऊँगा, मेरे बाबा एक दिन जरूर आएंगे"।
कई वर्षों बाद बाबासाहब को इस सत्य घटना की जानकारी एक मित्र से मिली तो सोनबा के बारे में सोच कर अत्यंत भावुक हो गए। और तुरंत ही बाबासाहब मित्र के साथ सोनबा के हाथ का पानी पीने के लिए निकल पड़े। जब बाबासाहब पनवेल नाके पर पहुंचे तो वहां सोनबा तो नहीं मिला लेकिन एक पेड़ के निचे टूटे हुआ घड़ा जरूर मिला पूछने पर पता चला कि कुछ दिन पहले ही सोनबा अपनी अधूरी आश लिए चल बसा।
बाबासाहब का ह्रदय चीत्कार उठा, आँखें डबडबा आई किसी से कह कर कुछ फूल मंगाए। घड़े के टुकड़ों को एकत्र कर उन पर फूल चढ़ा कर सोनबा को श्रधांजलि दी. ... और आंसुओं ने पलकों के बाँध तोड़ दिये। झर झर बहते आंसुओं ने टूटे घड़े के टुकड़ों में समाये सोनबा को सराबोर कर दिया। बाबासाहब के मुख से निकलती हूँकार में ये शब्द थे, "मेरे प्यारे सोनबा! तुम्हें मारने वाली और मेरे करोड़ों भाई-बहनों को कुत्ते-बिल्ली की तरह समझने वाली अंधी बहरी व्यवस्था को मैं एक दिन अवश्य नष्ट कर डालूँगा| तेरी इस अपार श्रद्धा ने मुझे हजार हाथियों का बल दिया है"।
जय मुलनिवासी
जय भीम ~ नमो बुद्धाय.
08/09/2022
मुझे सन १९५० से पहले के कुछ दस्तावेज चाहिए थे इसीलिए मैं ०७ सेप्टेम्बर २०२२ को मेरे परदादा आनंदराव और भीमराव याने विश्वरत्न बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर जिस स्कूल में पढ़े वहाँ गया ।
वहाँ जा कर पता चला की डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर जी के स्कूल रेकोर्ड से अब तक उनका स्कूल लीविंग सर्टिफ़िकेट (स्कूल छोड़ने का दाख़िला) बना ही नहीं है।
मैंने स्कूल के मुख्याध्यापक जी से पूछा की अब तक क़िसीने बाबासाहब का दाख़िला कैसे नहीं बनवाया, किसी ने अब तक माँग नहीं की ?
मुख्याध्यापक महोदय जी ने बताया, की बाबासाहब का दाख़िला माँगने के लिए कई RTI application लगाई गई, कई मंत्रियों ने बाबासाहब का दाख़िला माँगा, लेकिन जब तक परिवार के किसी व्यक्ति से जब तक माँग नहीं होती, तब तक हम दाख़िला नहीं बना सकते थे। आप पहले सदस्य है जिन्होंने बाबासाहब के दाख़िले की माँग की है।
आज ११८ साल बाद बाबासाहब का स्कूल लीविंग सर्टिफ़िकेट बनवाया है, आप सब के जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ।
विशेष बात पता चली, बाबासाहेब से ०५ साल पहले ’आनंद’ राव जी का दाख़िला सन १८८५ में हुआ और उनका नाम रजिस्टर में ‘आनंदा रामजी अम्बेडकर’ दर्ज किया है। जिसकी कॉपी मुझे जल्द उपलब्ध होगी।
इसका अर्थ जानते हो? ”अम्बेडकर” सरनेम किसी ब्राह्मण ने बाबासाहब को नहीं दिया, अगर दिया होता तो पाँच साल पहले ’आनंद’ के आगे ‘अम्बेडकर’ नाम नहीं लिखा होता । ब्राह्मण अम्बेडकर गुरुजी का अस्तित्व उतना ही सत्य है जितना मोर्या काल में चाणक्य का है ।
“ अम्बेडकर” सरनेम किसी ब्राह्मण की देन नहीं बल्कि बाबासाहब और आनंदराव जी के पिताजी “सुभेदार मेजर रामजी अम्बेडकर” की देन है ।
-Rajratna Ambedkar
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का सबसे पहला स्कूल 🙏💯 यहां से की थी उन्होंने सबसे पहले पढ़ाई💯🌟 shab
03/09/2022
कबड्डी है पर सच्ची है
02/09/2022
किताब तो सब पढ़ते हैं लेकिन उसपर अमल कोई नहीं करता है लोगो को इन माहान भारत रत्न में पढ़ो
30/08/2022
लगता है लोग इस माहापुरूस भूल गए हैं
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