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01/11/2025

छठ पर्व 2025

25/10/2025

Upcoming new fisrt bhojpuri serial of my doughter.

02/10/2025

I gained 44 followers, created 6 posts and received 16 reactions in the past 90 days! Thank you all for your continued support. I could not have done it without you. 🙏🤗🎉

26/08/2025

With Gaurav Yadav – I just got recognized as one of their rising fans! 🎉

01/08/2025

हर हर महादेव

01/08/2025
12/07/2025

जय श्री कृष्ण..... राधे राधे.

27/06/2025

With Jaankari Rakho – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

17/05/2025

#खस एक बारहमासी कम सिंचित जमीन पर उगने वाली घास है । प्राचीन काल में बंजर भूमि और खेतों की मेंड़ और बंधों मे लगायी जाती थी। एक बार लगा देने के बाद सालों साल उगती रहती थी। जिसकी अब खेती इत्र में इस्तेमाल होने वाले व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण आवश्यक तेल के उत्पादन के लिए की जाती है। खस में सुगंधित तेल इसकी जडों में होता है। ऊपर की हरी घास सूख जाने पर जमीन अंदर जड़ें सुरक्षित रहती है। इन्ही से आसवन विधि से सुगंधित तेल निकाला जाता है।
खस में ठंडक देने वाले गुण होते हैं और इसका उपयोग गर्मियों के दौरान शर्बत या स्वादिष्ट पेय तैयार करने के लिए किया जाता है। यह जड़ी बूटी ओमेगा फैटी एसिड, विटामिन, प्रोटीन, खनिज और आहार फाइबर का एक अच्छा स्रोत है।
आयुर्वेद में ये माना जाता है कि शरीर में पित्त की मात्रा अधिक हो जाने के कारण मुँह में छाले होते हैं। जैसा कि पहले बताया गया है कि खस का तासीर या प्रभाव ठंडा होने के कारण मुँह के छालो से राहत पाने में ये मदद करता है।

आमतौर पर खस तेल का इस्तेमाल दर्द से राहत पाने के लिए किया जाता है क्योंकि इसका एन्टी-इंफ्लैमटोरी गुण मांसपेशियों के सूजन को कम करने में सहायता करता है और हड्डियों को मजबूत करता है।आमतौर पर खस तेल का इस्तेमाल दर्द से राहत पाने के लिए किया जाता है क्योंकि इसका एन्टी-इंफ्लैमटोरी गुण मांसपेशियों के सूजन को कम करने में सहायता करता है और हड्डियों को मजबूत करता है।

आग से जलने पर आप पानी से जलने वाली जगह को धोते हैं लेकिन जलन से आपका हाल बेहाल रहते है और जलन कम नहीं होती,उस वक्त खस घास आपको जलन से राहत दिलायेगा। क्योंकि खस का जीवाणुरोधी और ठंडक देनेवाला गुण उस वक्त रामबाण जैसा काम करता है। नारियल तेल में खस को मिलाकर प्रभावित जगह पर लगायें इससे जलन और दर्द कम हो जायेगा।

अगर आपको नींद न आने या अनिद्रा की बीमारी है और नैचुरल तरीके आप इससे राहत पाना चाहते हैं तो खस के सेवन से आपको मदद मिलेगी। क्योंकि खस में जो यौगिक होते हैं वह न्यूरोट्रांसमीटर के उत्पादन में सहायक होते हैं जिससे मस्तिष्क को बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है। और इसी से नींद न आने की समस्या कम होती है।
सोने के पहले नहाने के पानी में 5-10 बूंद खस का तेल डालकर नहाना चाहिए। इससे शरीर को ठंडक मिलती है। खस का महक मन और शरीर को शांत करने में मदद करता है। यानि इसका महक और ठंडक का एहसास नींद आने में मदद करती है।
जैसे अनिद्रा के बीमारी में खस काम करता है ठीक उसी तरह न्यूरोट्रांसमीटर के उत्पादन के कारण ये मस्तिष्क को कार्य को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और डिप्रेशन और स्ट्रेस को कम करता है।

खस ग्रास का ठंडा तासिर और उसका एन्टीबैक्टिरीयल गुण फीवर को कम करने या राहत दिलाने में मदद करता है।
खाना खाने के बाद 1-2 ग्राम खस का चूर्ण शहद या पानी के साथ ले सकते हैं।

खस में मिनरल जैसे कैल्शियम होता है जो बालों का झड़ना कम करके नए बाल उगाने में मदद करते हैं। खस के इस्तेमाल से बाल चमकदार और हेल्दी बनते हैं।
नारियल तेल में खस डालकर उसको अच्छी तरह से तेल में मिला लें। उसके बाद स्कैल्प में लगायें। बेहतर परिणाम के लिए इसको हफ़्ते में तीन बार इस्तेमाल कर सकते हैं।

खस का एन्टीऑक्सिडेंट, एन्टी-इंफ्लैमटोरी गुण और उच्च मात्रा में लिनोलेनिक एसिड त्वचा के संक्रमण से राहत दिलाने मददगार साबित होता है। अगर स्किन इंफेक्शन का प्रॉब्लम है तो खस का इस्तेमाल करने से त्वचा के स्थिति में सुधार आता है। साथ ही साथ त्वचा में एक अलग चमक आती है। अगर आपके त्वचा में किसी प्रकार का छोटा-मोटा जख़्म हुआ है तो वहां भी खस लगाने से राहत मिल सकती है।
अगर आपकी त्वचा संवेदनशील है तो खस रूट पाउडर का इस्तेमाल शहद या दूध के साथ करें। इसके बेहतर परिणाम के लिए इसका त्वचा पर इस्तेमाल दिन में एक बार या हफ़्ते में तीन बार कर सकते हैं।
अगर त्वचा में किसी तरह का घाव या छोटा-मोटा जख़्म हुआ है तो नारियल तेल के साथ खस मिलाकर लगाने से जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है।

खस का प्रभाव ठंडा होने के कारण इसका सेवन गर्मी के मौसम में करना ही फायदेमंद होता है। सर्दी के मौसम या मानसून में खस के सेवन से बचना चाहिए । गरमी के दिनों में खस से शरबत बनाया जाता है जिससे शरीर को ठंडक मिलती है।

आयुर्वेद के अनुसार खस के गुण -

#खस का रस मीठा, कडुवा, तिखा, गुण में रूखा होता है।इसकी प्रकृति शीतल होती है। खस के प्रयोग से शरीर की जलन व प्यास शांत होती है। बुखार होने, उल्टी आने, खून की खराबी, दस्त रोग, हृदय के रोग, त्वचा रोग एवं बच्चों के रोग आदि को दूर करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

मात्रा: इसके जड़ का चूर्ण 2 से 6 ग्राम की मात्रा में और रस 10 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है।

खस से विभिन्न रोगों का घरेलु उपचार -

#जलन: शरीर के किसी भी भाग में जलन होने पर सफेद चन्दन और खस की जड़ को बराबर मात्रा लेकर पीस लें और तैयार लेप को जलन वाले भाग पर लगाएं। इससे जलन शांत होती है। इसका प्रयोग आग से जल जाने पर भी किया जाता है।

#बुखार(fever): खस की जड़ का काढ़ा बनाकर 4-4 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पीने से बुखार ठीक होता है। इसके सेवन से अधिक पसीना आता है और पसीने के साथ बुखार भी ठीक हो जाता है।

#बच्चों का दस्त(loosemotions ): यदि बच्चे को बार-बार दस्त आ रहा हो तो खस के चूर्ण और मिश्री बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और आधा चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन कराएं। इससे दस्त रोग ठीक होता है।

#त्वचा रोग :गर्मी के मौसम में होने वाले त्वचा रोगों में खस का शर्बत बनाकर रोजाना पीना चाहिए। इससे त्वचा रोग ठीक होता है। यह इन्फैक्शन (संक्रमण) से होने वाले त्वचा रोग और बच्चों के त्वचा पर होने वाले फोड़े-फुन्सियां भी ठीक होती है।

#पसीना अधिक आना : खस की जड़, कमल के पत्ते और लोध्र की छाल को बराबर मात्रा में लें और पीसकर लेप बना लें। इस लेप को शरीर पर मलने से गर्मी के दिनों में अधिक पसीना आना कम होता है।

#घमौरियां: 20 ग्राम खस को पानी के साथ पीसकर त्वचा पर लगाने से और 2 चम्मच खस का शर्बत 1 कप पानी में मिलाकर दिन में 2-3 बार पीने से घमौरियां नष्ट होती है।

#साइटिका (sciatica): साइटिका के दर्द से पीड़ित रोगी को खस का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से साइटिका का दर्द में आराम मिलता है। सिर्फ गर्मी के मौसम में

#गले का दर्द(throat pain) : खस का काढ़ा बनाकर गरारे करने से गले का दर्द समाप्त होता है और आवाज भी साफ होता है।

#सिर की रूसी : खस को दूध या पानी में मिलाकर बालों में मालिश करने से रूसी कम होती है।

#चोट :• चोट लगने, मोच आने, सूजन आने या कहीं छिल जाने पर खस का काढ़ा बनाकर उस स्थान को सेंकने से लाभ मिलता है। चोट या मोच के दर्द में खस के दाने को पीसकर लेप बनाकर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।

#घाव - यदि किसी को घाव हो गया हो तो खस, कुन्दरू का तेल और सफेद मोम को हल्के आग पर पिघलाकर व छानकर घाव पर लगाना चाहिए। इससे घाव जल्दी ठीक होता है। खस, लोहबान का तेल और सफेद मोम मिलाकर हल्की आग पर पिघलाकर मलहम बना लें और इस मलहम को घाव पर लगाएं। इससे घाव सूख जाते हैं।

#छींके अधिक आना: यदि छींक अधिक आती हो तो 12 ग्राम खस को 120 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उबलना चाहिए और उससे निकलने वाले भाप को नाक से अन्दर खींचना चाहिए। इससे छींक का अधिक आना बंद होता है।

#पेट का दर्द : खस और पीपरा की जड़ को मिलाकर खाने से पेट का दर्द ठीक होता है।

#त्वचा की देखभाल - खस का तेल त्वचा को मॉइस्चराइज करता है और डिहाइड्रेशन से बचाता है। यह त्वचा पर ठंडक और ताजगी प्रदान करता है।

#तनाव कम करने के लिए - खस का तेल सुगंधित होता है और इसे अरोमाथेरेपी में उपयोग किया जाता है। यह मन को शांत करता है और अनिद्रा में मदद करता है।

#शरीर को ठंडक प्रदान करना - खस की जड़ से बने पानी का उपयोग गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडा रखने के लिए किया जाता है। इसे शरबत और पेय पदार्थों में मिलाया जाता है।

#डाइजेशन सुधारने में मददगार - खस का सेवन पाचन को बेहतर करता है और पेट की समस्याओं में आराम देता है।

#मूत्रवर्धक गुण - खस का उपयोग मूत्र संबंधी समस्याओं को ठीक करने के लिए किया जाता है।

#तनाव और चिंता में कमी - खस के तेल में प्राकृतिक रूप से शांत करने वाले गुण होते हैं, जो तनाव, अवसाद और मानसिक थकान को कम करते हैं।

#रक्त परिसंचरण में सुधार - खस का तेल शरीर के रक्त परिसंचरण को बढ़ाने में मदद करता है।

#डिटॉक्सिफिकेशन - यह शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त करने में मदद करता है।

#शरीर की गंध को नियंत्रित करना -
खस के अर्क का उपयोग इत्र और डिओडरेंट में किया जाता है।

#जलन और सूजन को कम करना - यह सूजन और खुजली को शांत करने के लिए उपयोगी है।

उपयोग के तरीके

1. खस की जड़ से पानी का अर्क निकालकर पेय पदार्थ तैयार किया जा सकता है।

2. खस के तेल को मालिश के लिए उपयोग किया जा सकता हैं.

15/05/2025

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01/05/2025

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हर व्यक्ति के शरीर में दो गुर्दे होते हैं, जो मुख्य रूप से यूरिया, क्रिएटिनिन, एसिड, आदि जैसे नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों को रक्त में से छानने के लिए जिम्मेदार होते हैं। (जो सभी शरीर में चयापचय के उत्पाद हैं) और इस तरह मूत्र का उत्पादन करते हैं।

लाखों लोग विभिन्न प्रकार के गुर्दे की बीमारियों के साथ रह रहे हैं और उनमें से अधिकांश को इसके बारे भनक तक नहीं है। यही कारण है कि गुर्दे की बीमारी को अक्सर एक ‘साइलेंट किलर’ के रूप में जाना जाता है क्योंकि अधिकांश लोगों को बीमारी का पता तब तक नहीं चलता जब तक यह उग्र रूप धारण नहीं कर लेता। जबकि लोग अपने रक्तचाप, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर की नियमित रूप से जांच करवाते रहते हैं, वे अपने गुर्दे की किसी भी समस्या का पता लगाने के लिए अपने रक्त में एक सरल क्रिएटिनिन परीक्षण भी नहीं करवाते। 2015 के ग्लोबल बर्डन डिजीज (GBD) के अध्ययन के अनुसार, क्रोनिक किडनी रोग (CKD) को भारत में मृत्यु दर के आठवें प्रमुख कारणों में से एक के रूप में स्थान दिया गया है।

किडनी विकार के चेतावनी के कई संकेत होते हैं, हालांकि, अधिकांश समय इन्हें अनदेखा किया जाता है या किसी और तरह की समस्या समझकर लोग भ्रमित हो जाया करते हैं। इसलिए, हर व्यक्ति को बहुत ही सतर्क रहना चाहिए और किडनी विकार का कोई भी लक्षण दिखने पर जल्द से जल्द पुष्टिकरण परीक्षण (रक्त, मूत्र और इमेजिंग सहित) करवाना चाहिए। ऐसे किसी व्यक्ति को किसी नेफ्रोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए और अपने संदेह को स्पष्ट करना चाहिए। लेकिन अगर आपको उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, मेटाबॉलिक सिंड्रोम है, या कोरोनरी आर्टरी डिजीज, और / या किडनी फेल होने का पारिवारिक इतिहास है या आप 60 वर्ष से अधिक उम्र के हैं तो आज के युग में आपको नियमित रूप से गुर्दे की जांच करवाते रहना चाहिए।

जबकि गुर्दे की बीमारी के निदान का एकमात्र निश्चित तरीका पुष्टि संबंधी परीक्षण करना है, यहाँ किडनी रोग के कुछ शुरुआती चेतावनी के संकेत दिए गए हैं:

शुरुआती संकेतों में से एक है टखनों, पैरों या एड़ी के पास सूजन का दिखना है: ऐसी जगहों पर एडिमा दिखाई देने लगेगी, जो दबाव देने पर पिट करते हैं, और इन्हें पिटिंग एडिमा कहा जाता है। जैसे-जैसे गुर्दे अपने काम करने में गड़बड़ी करने लगते हैं, शरीर में नमक जमा होने लगता है, जिससे आपकी पिंडली और टखनों में सूजन आने लगती है। संक्षेप में, अगर किसी भी व्यक्ति में इस तरह के लक्षण दिखें तो उसे नेफ्रोलॉजिस्ट से मिलकर अपने गुर्दे की कार्यप्रणाली का तत्काल मूल्यांकन करवाना चाहिए।
पेरिऑर्बिटल एडिमा: इसमें आंखों के आसपास सूजन दिखने लगता है जो कोशिकाओं या ऊतकों में तरल पदार्थ के संचय के कारण होता है। यह गुर्दे की बीमारी के शुरुआती लक्षणों में से एक है। यह उन व्यक्तियों में विशेष रूप से होता है जिनमें गुर्दे के माध्यम से काफी मात्रा में प्रोटीन का रिसाव होता है। शरीर से प्रोटीन का नाश इंट्रावस्कुलर ऑन्कोटिक दबाव को कम करता है और आंखों के आसपास के विभिन्न जगहों पर तरल पदार्थ का अतिरिक्त संचय होने लगता है।
कमजोरी: गुर्दे की बीमारी का एक सामान्य लक्षण है शुरुआत में थकावट का होना। जैसे-जैसे गुर्दे की खराबी बढती जाती है यह लक्षण और अधिक स्पष्ट होता जाता है। सामान्य दिनों की तुलना में वह व्यक्ति अधिक थका हुआ महसूस कर सकता है और ज्यादा गतिविधियों को करने में असमर्थ होता है, तथा उसे बार-बार आराम की आवश्यकता होती है। ऐसा काफी हद तक रक्त में विषाक्त पदार्थों और अशुद्धियों के संचय के कारण होता है, जिसके परिणामस्वरूप गुर्दे खराब होते जाते हैं। गैर-विशिष्ट लक्षण होने के नाते इसे अक्सर अधिकांश लोगों द्वारा अनदेखा किया जाता है और इसकी पूरी तरह से जांच नहीं की जाती है।
भूख में कमी: यूरिया, क्रिएटिनिन, एसिड जैसे विषाक्त पदार्थों के जमा होने से व्यक्ति की भूख कम होने लगती है। इसके अलावा, जैसे-जैसे गुर्दे की बीमारी बढती जाती है, रोगी के स्वाद में बदलाव होता जाता है, जिसे अक्सर रोगियों द्वारा धातु के रूप में बताया जाता है। यदि किसी को दिन में बिना कुछ खाए भी पेट भरे का अहसास होता हो, तो दिमाग में खतरे की घंटी बजनी चाहिए और उसके गुर्दे की जांच करवानी चाहिए।
सुबह की मिचली और उल्टी: गुर्दे के खराब होने के शुरुआती लक्षणों में से एक और लक्षण है सुबह-सुबह मिचली और उल्टी का होना, और इसका पता तब चलता है जब रोगी सुबह बाथरूम में अपने दांतों को ब्रश करता है। इससे व्यक्ति की भूख भी कम होती जाती है। गुर्दे फेल होने के अंतिम चरण में, मरीज को बार-बार उल्टी आती है और भूख कम लगती है।
एनीमिया: हीमोग्लोबिन का स्तर गिरना शुरू हो जाता है, और व्यक्ति पीला दिखने लग सकता है, बिना शरीर से खून का बाहर हुए। यह गुर्दे की बीमारी की सामान्य जटिलताओं में से एक है। इससे कमजोरी और थकान भी हो सकती है। कई कारणों से यह एनीमिया होता है जिसमें एरिथ्रोपोइटिन का स्तर कम होना(गुर्दे में एरीथ्रोपोइटिन संश्लेषित किया जा रहा है), लोहे का स्तर कम होना, विष संचय के कारण अस्थि मज्जा का दमन होना इत्यादि होता है।
पेशाब करने की आवृत्ति में परिवर्तन: किसी को अपने मूत्र उत्पादन पर बहुत सावधानी से ध्यान रखना पड़ता है। उदाहरण के लिए, रोगी के मूत्र उत्पादन में कमी हो सकती है या उसे अधिक बार पेशाब करने की आवश्यकता महसूस हो सकती है, विशेष रूप से रात में (जिसे रात्रिचर कहा जाता है)। यह एक चेतावनी का संकेत हो सकता है और यह संकेत दे सकता है कि गुर्दे की फ़िल्टरिंग इकाइयाँ क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं या क्षतिग्रस्त होने की प्रक्रिया में हैं। कभी-कभी यह पुरुषों में कुछ मूत्र पथ के संक्रमण या बढ़े हुए प्रोस्टेट का संकेत भी हो सकता है। इस प्रकार, मूत्र उत्पादन में एक परिवर्तन (वृद्धि या कमी) को अपने नेफ्रोलॉजिस्ट को तुरंत सूचित करना चाहिए।
मूत्र में झाग या रक्त का होना: पेशाब में अत्यधिक झाग मूत्र में प्रोटीन की उपस्थिति को इंगित करता है (जो सामान्य परिस्थितियों में नगण्य होना चाहिए)। जब गुर्दे का फ़िल्टरिंग तंत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है या क्षतिग्रस्त हो रहा होता है, तो प्रोटीन, रक्त कोशिकाएं मूत्र से रिसने लगती हैं। गुर्दे की बीमारी का संकेत देने के अलावा, मूत्र में रक्त ट्यूमर, गुर्दे की पथरी या किसी भी तरह के संक्रमण का संकेत दे सकता है। साथ ही, बुखार या ठंड लगने के साथ पेशाब से निकलने वाला मवाद गंभीर हो सकता है और फिर से गंभीर मूत्र पथ के संक्रमण का संकेत हो सकता है। इस प्रकार मूत्र के रंग, स्थिरता या प्रकृति में परिवर्तन को गुर्दे के विशेषज्ञ को जल्द से जल्द सूचित किया जाना चाहिए।
सूखी और खुजली वाली त्वचा: सूखी और खुजली वाली त्वचा गुर्दे की बीमारी के उन्नत होने का संकेत हो सकती है। जैसे-जैसे गुर्दे की कार्य क्षमता कम होते जाती है, शरीर में विषाक्त पदार्थों का जमाव होता जाता है, जिससे त्वचा में खुजली, सूखापन और दुर्गंध होती है।
पीठ दर्द या पेट के निचले हिस्से में दर्द: पीठ, बाजू या पसलियों के नीचे दर्द गुर्दे की गड़बड़ी के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं जैसे कि गुर्दे की पथरी या पाइलोनफ्राइटिस। इसी तरह, पेट के निचले हिस्से में दर्द मूत्राशय के संक्रमण या एक मूत्रवाहिनी (गुर्दे और मूत्राशय को जोड़ने वाली ट्यूब) में पत्थर होने से जुड़ा हो सकता है। इस तरह के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और एक्स-रे केयूबी या अल्ट्रासाउंड एब्डोमेन जैसे नियमित इमेजिंग अध्ययन द्वारा आगे की जांच की जानी चाहिए।
उच्च रक्तचाप: किडनी की बीमारी का एक लक्षण उच्च रक्तचाप हो सकता है। उच्च रक्तचाप का निदान करने वाले किसी भी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप के वृक्क एटियलजि का पता लगाने के लिए गुर्दे की कार्यप्रणाली और गुर्दे की इमेजिंग का विस्तृत विवरण होना चाहिए। जैसे-जैसे गुर्दे की कार्यक्षमता बिगड़ती जाती है, शरीर में सोडियम और पानी जमने लगते हैं जिससे उच्च रक्तचाप होता है। उच्च रक्तचाप के लक्षणों में सिरदर्द, पेट में दर्द, अँधेरा छाना और शायद गुर्दे की बीमारी के शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं।
चेतावनी के संकेतों की पहचान की जागरूकता होने पर और समय पर इलाज करने पर गुर्दे की गड़बड़ी या गुर्दे की विफलता से बचा जा सकता है अन्यथा रोगी को डायलिसिस, या गुर्दा प्रत्यारोपण करवाना पड़ता है और ज्यादा लापरवाही करने पर उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

यह भी पढ़ें : संकेतों को समझें और अपने गुर्दे को स्वस्थ रखें



गुर्दों को स्वस्थ रखने के टिप्स:

गुर्दे की बीमारी को रोकने ले लिए कई तरीके हैं। तो, जब तक आपकी किडनी रोगग्रस्त नहीं होती, तब तक आप प्रतीक्षा क्यों करें? अपने गुर्दे के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए निम्नलिखित कुछ उपाय हैं:

खूब पानी पिएं: यह आपके किडनी को स्वस्थ रखने का सबसे आम और सरल तरीका है। भरपूर पानी, विशेष रूप से गर्म पानी का सेवन करने से गुर्दे को शरीर से सोडियम, यूरिया और विषाक्त पदार्थों को साफ करने में मदद करता है।

कम सोडियम / नमक वाले आहार: अपने काने में सोडियम या नमक का सेवन नियंत्रण में रखें। इसका मतलब है कि आपको पैकेज्ड / रेस्टोरेंट के खाद्य पदार्थों से भी परहेज करना होगा। इसके अलावा, अपने खाने में अतिरिक्त नमक न डालें। कम नमक का आहार गुर्दे पर भार को कम करता है और उच्च रक्तचाप, उच्च रक्तचाप से संबंधित विकारों के विकास को रोकता है और गुर्दे की बीमारी की प्रगति को भी रोकता है।

शरीर का वजन उचित बनाए रखें: स्वस्थ भोजन करें और अपना वजन नियंत्रित रखें। अपने गुर्दे की धमनियों में कोलेस्ट्रॉल के जमाव को रोकने के लिए अपने शरीर के कोलेस्ट्रॉल के स्तर की नियमित जाँच करवाएँ। इसके अलावा, आहार से संतृप्त वसा / वसायुक्त तले हुए खाद्य पदार्थों को दूर रखें और रोजाना ढेर सारे फल और सब्जियां खाने पर जोर दें। किसी व्यक्ति का वजन बढ़ने से गुर्दे पर भार बढ़ता है। विशेष रूप से भारतीय परिदृश्य में 24 या उससे कम के बीएमआई के लिए लक्ष्य बनाने का प्रयास करें।

नियमित रूप से रक्त शर्करा के स्तर की जाँच करें और उन्हें इष्टतम स्तरों के तहत रखें: मधुमेह के रोगियों में गुर्दे की खराबी बहुत आम बात है और अगर जल्दी पता चल जाए तो इसे रोका जा सकता है। इसलिए, अपने रक्त शर्करा के स्तर पर नियमित जांच रखने, मीठे खाद्य उत्पादों से बचने और एक चिकित्सक से आपको मिलने की सलाह दी जाती है यदि रक्त शर्करा (उपवास या पोस्टप्रैंडियल) स्तर या एचबीए 1सी से ज्यादा हो। एचबीए 1सी का स्तर 6.0 से कम रखें।

नियमित रूप से रक्तचाप पर नजर रखें और इसे नियंत्रण में रखें: यदि आपको उच्च रक्तचाप है, तो अपने चिकित्सक द्वारा सलाह के अनुसार एंटीहाइपरटेन्सिव लें, और स्वस्थ जीवन शैली बनाए रखें तथा आहार में आवश्यक परिवर्तन करें। सामान्य रक्तचाप का स्तर

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