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असद रियाज़ खान अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
असद रियाज़ खान
19/11/2025
क्या यह महज एक संयोग है?
पहलगाम में आतंकवादी हमले में हमारे निर्दोष नागरिक मारे गए। वहां के DGP यानि पुलिस महानिदेशक हैं - नलिन प्रभात!
अब चलिए फ्लैशबैक में चलते हैं...
चार साल पहले 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर में नक्सलियों ने अपने जवानों को घेर लिया और अंधाधुंध फायरिंग की। हमारे 24 जवान शहीद हो गए।
उस समय, आई.जी. यह था... बस यही - नलिन प्रभात!
आइये, अब हम फ्लैशबैक में चलें...
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले जो पुलवामा हमला हुआ... जिसमें हमारे 40 जवान शहीद हो गए... उस समय सीआरपीएफ में एक वरिष्ठ पद पर थे... वो हैं - नलिन प्रभात!
पुनः फ्लैशबैक...
नौ साल पहले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। उस समय सीआरपीएफ के डीआईजी थे।
यह थें... बस यही - नलिन प्रभात!
हालाँकि उस समय नलिन प्रभात को इसका दोषी पाया गया था और उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की गई थी।
फिर भी, बाद में सरकार बदलने के बाद उन्हें क्लीन चिट दे दी गई और बीजापुर, पुलवामा और पहलगाम जैसे संवेदनशील इलाकों में बड़ी जिम्मेदारियां दे दी गईं।
यह हमारे गृह मंत्रालय की उदारता का प्रतीक है, है न?
एक और गर्व की बात ये है कि इन्हीं नलिन प्रभात ने बताया कि उन्होंने पांच महीने पहले मनाली में दस करोड़ की प्रॉपर्टी खरीदी है।
ऐसा भी कहा जाता है कि चंडीगढ़ के सेक्टर 5 में उनके पास 26 करोड़ रुपए का बंगला भी है!
और उनका वेतन डेढ़ लाख रुपये प्रति माह था। जो अब ढाई लाख हो गई है।
फिर भी, नलिन प्रभात को उनकी भावी 'उपलब्धियों' के लिए शुभकामनाएँ।
अब पहलगाम आतंकी हमले में ये J&K के DGP है और शाह के ख़ास है।
03/11/2025
सालेहा बेगम सिराजगंज शहर के मासूमपुर मोहल्ले के मरहूम अब्दुस सलाम की पत्नी थीं। लंबे समय तक वे रायपुर इलाके में कौमी जूट मिल के वीरान पड़े क्वार्टर के एक कोने में अकेली रहती थीं। ज़िंदगी एकदम तन्हा थी - न घर, न परिवार, बस एक भीख का बर्तन और कुछ पुराने बैग।9 अक्टूबर को, जब स्थानीय लोगों को उनके पुराने घर की सफाई करते समय पुराने नोटों से भरी दो बोरियाँ मिलीं, तो वे हैरान रह गए। गिनती करने पर पता चला कि उनमें लगभग 1 लाख 26 हज़ार टका थे। दो दिन बाद, उसी जगह से नोटों से भरी एक और बोरी बरामद हुई। कुल मिलाकर, तीनों बोरियों में लगभग 1 लाख 74 हज़ार टका मिले - जिनमें से कई समय के साथ सड़ी, फटी और बेकार हो गई थीं,पड़ोसी अब्दुर रहीम ने कहा,सालेहा बेगमउनके पति ने छोड़ दिया था। उन्होंने कभी खाना नहीं बनाया, भीख मांगकर जो भी मिल जाता था, खा लेती थीं। जब वह बीमार पड़ीं, तो हम उनके साथ थे। उनके आखिरी दिन बहुत कठिन थे।सालेहा की बेटी स्वप्ना खातून की आवाज़ में दुःख था, "माँ थोड़ी अलग थीं। उन्हें पैसों से कोई लगाव नहीं था, और उन्हें पैसे खर्च करना भी नहीं आता था। मैंने इलाज के दौरान कुछ पैसे खर्च कर दिए। बाकी पैसे मैं अपनी माँ के नाम पर दान करना चाहती हूँ, इससे उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।सिराजगंज नगर पालिका के वार्ड नंबर एक के पार्षद शहरियार शिपू ने कहा,दो दिनों में तीन बोरी पैसे बरामद किए गए। लगभग 174,000 टका अच्छी हालत में मिले, बाकी सड़ गए।
17/09/2025
बाप ने बेटे की पुरानी बनियान को पहनते हुए पत्नी से कहा अभी नई मत लाना, दो महीने इसी से काम चला लूंगा।"
बेटे ने बाप की बात सुन ली थी। बाप के जाने के बाद माँ से बोला "घर मे ये क्या ड्रामा चल रहा है मम्मी,। तुम दो हजार की साड़ी ले आई मगर पापा के लिए सौ रुपये की बनियान भी नही ला सकी।" माँ गुस्से मे बोली " इसलिए कि तेरा बाप नही चाहता उसके लिए कुछ नया खरीदा जाए। और मेरी साड़ी तुम्हे कैसे चुभ रही है। अपने पति की कमाई से लाई हूँ। तेरे लिए भी तो नई ड्रेस आई है। तेरी बहन के लिए भी आई है तू रोज बाइक से सौ रुपये का पेट्रोल फुंक देता है। वो भी मटरगस्ती के लिए। मैंने तो कभी सवाल नही उठाया? अब तेरे बाप के शौक मर गए है। वो पुरानी चीजों से संतुष्ट है तो हम क्या करें?" बेटी भी बीच मे आ गई बोली " पापा अब बूढ़े हो गए है मम्मी। जो करे करने दो। जो पहने पहनने दो। हम अपनी जिंदगी जीनी क्यों छोड़ें? "
फिर वे तीनो अपनी जिंदगी मे मग्न हो गए। बाप क्यों बुढ़ा हो रहा है। उसके शौक क्यों खत्म हो रहे है। वो पुराने कपड़े पहन कर क्यों काम चला रहा है। वो ड्यूटी जाते वक़्त ऑटो के बीस रुपये बचाने के लिए पैदल क्यों चलता है। इन सब की वजह क्या है। इस बात पर किसी ने विचार नही किया। 🪻🪻
15/09/2025
प्रणाम
आराम से पढ़िए और सोचिए...
पुलिस की लाठी
पुलिस का नाम सुनते ही आम जन के बदन में सिहरन आ जाती है क्योंकि पुलिस की लाठी हमेशा आम पर ही चलती है, खास की तो सखा है। इसका व्यवहार कद-काठी पर निर्भर है। यदि कद बड़ा हो तो लाठी सहमती है और यदि कद कमजोर हो तो जोर से गरजती है। ऐसे में कहीं सीताराम तो कहीं शिवप्रताप जैसा आम आदमी धराशायी हो जाता है,तब खास की खबरें चल पड़ती है।
प्रशासन को अनुशासन के लिए लाठी की हनक जरूरी है,पर ऐसी हनक कि ऊपर से नीचे तक सब हलकान हो जाये ? ऐसी मार कि कोई तड़पकर प्राण छोड़ दें ?
आरक्षी बंधुओं! कभी आप भी आम थे,फिर खाकी वर्दी ने आपको एक अलग पहचान दी। आप चाहें तो इस पहचान को खूश्बू-सा तैरा सकते हैं और चाहें तो बदबू-सा फैला सकते हैं। आपसे न्याय और सहयोग की अपेक्षा की जाती है। एक निरीह प्राणी आपकी तरफ आशा भरी नजरों से देखता है ताकि आप उसके आंसू पोंछ सके,पर आप तो वर्दी के पावर में टावर पर चढ़ गये हैं । आप जरा उतरकर चलिए, निरपराध आदमी की मदद करके देखिए। अपराधियों को रगड़कर देखिए। लोगों का भरोसा जीतकर देखिए। आशा की किरण बनकर देखिए। सच कहता हूं आप भगवान-सा श्रद्धा पायेंगे।
विगत दिनों की घटनाओं ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किए हैं। हम मानते हैं कि कुछ कुत्सित लोगों की वज़ह से ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं और दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट जाती है,पर उस पर मानसिक दण्ड से भी विजय पाया जा सकता है क्योंकि इसका प्रशिक्षण आपको प्राप्त है।
गाजीपुर का नोनहरा कांड आज सुर्खियों में है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। मातमपुर्सी के लिए कतारें लगी हैं। शासन-प्रशासन इस समस्या से निजात पाने का भरपूर कोशिश कर रहा है। संभव है समय के साथ घाव भर जाये। सब कुछ सामान्य हो जाये,पर क्या ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो,इसकी सीख ली जायेगी ? पुलिस पश्चाताप की आग में अपने आपको तपा लेगी ? आम आदमी के सुरक्षा और न्याय की प्रतिबद्धता होगी ? गुटबाज़ी की राजनीति को तिलांजलि देकर विकास के मुद्दों पर बहस होगी ? जनप्रतिनिधि जनसेवा से लबरेज़ और अपराधियों के संरक्षण से परहेज़ करेंगे ? दुर्भावना से ऊपर उठकर सर्वजन हिताय को अपनायेंगे ? या यूं ही दुर्घटनाओं की आवृत्ति को हवा देंगे ????
बंधुओं! सवाल बड़े और उत्तर छोटे हैं। सिद्धांत बड़े और व्यवहार खोंटे हैं......
28/08/2025
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा ,
" इस्लाम धर्म जब से आया है तब से देश मे इस्लाम धर्म है और इस्लाम धर्म यहां हमेशा रहेगा , हमें अपनी सोच बदलनी होंगी , हम सब एक है "...
24/08/2025
दुनिया बस मौके की तलाश में बैठी कब आपके घर के टुकड़े हो ।।क्योंकि उनके उनका दिल का सुकून ही आपकी बरबादी है🙏
21/08/2025
हम करें बात दलीलों से तो रद्द होती है
उस के होंटों की ख़मोशी भी सनद होती है
साँस लेते हुए इंसाँ भी हैं लाशों की तरह
अब धड़कते हुए दिल की भी लहद होती है
जिस की गर्दन में है फंदा वही इंसान बड़ा
सूलियों से यहाँ पैमाइश-ए-क़द होती है
शो'बदा-गर भी पहनते हैं ख़तीबों का लिबास
बोलता जहल है बद-नाम ख़िरद होती है
कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है
23/05/2025
अल्फाज़ इस्तेमाल करते वक़्त ऐसे ही एहतियात करें..
जैसे मछली खाते वक़्त काँटों से.
क्योंकि ये सच है काँटे तो सिर्फ जिस्म को तकलीफ देते है, लेकिन अल्फाज़ दिलों को चीर देते हैं
22/05/2025
हैं बेगुनाह तो होने से कुछ नहीं होगा
सुबूत दीजिए रोने से कुछ नही होगा
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