Rao.asgar unani physician hakeem

Rao.asgar unani physician hakeem

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सामान्य रोग, पेट, गैस, ताक़त पेशाब रोग माहिर

14/09/2026

बीमारियों को नियंत्रित करने में स्वच्छ पानी बहुत जरूरी है, प्रचलित आम धारणाएं व्यथित करती है। इसके लिए क्या करे ? कमेंट में राय दे,evryone

13/09/2026

यह सच है कि क़ुरआन शरीफ़ अरबी ज़बान में नाज़िल हुआ और यह भी सच है कि हम नमाज़ अरबी ज़बान में ही पढ़ते हैं।
लेकिन यह भी एक हक़ीक़त है कि अरबी, मध्य-पूर्व और अफ़्रीका के कई देशों की राष्ट्रीय भाषा है। उन देशों में रहने वाले ग़ैर-मुस्लिम लोग भी अरबी बोलते हैं।
अरब लोग अरबी में गाने गाते हैं, मज़ाक और लतीफ़े करते हैं, आपस में लड़ते हैं और गालियाँ भी इसी ज़बान में देते हैं।
यानी अरबी एक ज़बान है। इस ज़बान में बोली या लिखी गई हर बात अपने-आप पवित्र नहीं हो जाती।
तो क्या किसी ने यह पढ़ने की कोशिश की थी कि उस औरत के कपड़े पर आख़िर लिखा क्या था???
बस, कुछ लोगों ने बिना जाने-समझे अपनी भावनाओं को इतना हावी कर लिया कि सोचने-समझने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी।
थोड़ा सब्र, थोड़ा पढ़ना और थोड़ा कॉमन सेंस—कई विवाद वहीं ख़त्म हो जाते हैं।
इंसानी सेहत और जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कुरान में और नबी ए करीम की सुन्नतों मैं ऐसी हिदायत दिख जाएगी जो असूल ए सेहत से वाबस्ता है।
नमाज़ एक रूहानी यौगिक क्रिया।
रोजा, व्रत, शरीर की शुद्धिकरण प्रक्रिया।
हज, भ्रमण, सीखने सिखाने और अंतरराष्ट्रीय भाईचारा बढ़ाने की ततबीर।
इसी तरह कुरआन में फलों जैसे खजूर, अनार, अंगुर, जैतून, पियाज लहसुन आदि का ज़िक्र विशेष उल्लेख के साथ गया है। चो पाओ हलाल जानवरों के गोस्त को जिस्म ए इंसानी के वजूद को क़ायम रखने के लिए और वैकल्पिक भोजन व्यवस्था के लिए allow किया गया है।
तिब्ब ए नबवी के नाम से एक निजाम मिलता है जो सेहत और तंदरुस्ती से हमे पथ प्रकाशित करता है। जारी

Photos from Rao.asgar unani physician hakeem's post 05/09/2026

🌿 सदर लैबोरेटरीज की अल्हयातीन और शाक्तिना — किफ़ायती हर्बल टॉनिक
आजकल ताकत और रोज़मर्रा की चुस्ती के नाम पर बाजार में कई महंगे प्रोडक्ट मौजूद हैं, लेकिन हर महंगी चीज़ बेहतर हो—यह जरूरी नहीं।
सदर लैबोरेटरीज के अल्हयातीन और शाक्तिना हर्बल टॉनिक ऐसे उत्पाद हैं, जो किफ़ायती विकल्प की तलाश करने वालों के लिए ध्यान देने योग्य हैं। खास तौर पर शाक्तिना को Sugar Free Herbal Tonic के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मेरी नज़र में इसकी सबसे बड़ी खासियत है—कम कीमत में हर्बल टॉनिक का विकल्प। रोज़मर्रा की थकान और कमजोरी महसूस करने वाले लोग अक्सर महंगे हेल्थ ड्रिंक्स की तरफ चले जाते हैं, जबकि ऐसे पारंपरिक हर्बल टॉनिक भी उनके बजट में एक विकल्प हो सकते हैं।
अल्हयातीन और शाक्तिना को लेकर मेरी राय यही है कि इन्हें किसी चमत्कारी दवा की तरह नहीं, बल्कि हर्बल रूप में देखा जाए।
और हाँ—शाक्तिना का Sugar Free होना इसे उन लोगों के लिए खास तौर पर दिलचस्प बनाता है जो शुगर वाले टॉनिक से बचना चाहते हैं। हालांकि मधुमेह या किसी अन्य बीमारी में इस्तेमाल से पहले लेबल की सामग्री देखकर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।
सस्ता, हर्बल और उपयोगी विकल्प—यही इसकी असली खूबी है।Rao Asgar Unani physician saharanpur
कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर भेजें।DM/वाट्सअप पर भी सलाह ले सकते हैं जो निःशुल्क है।

27/08/2026

वीर्ये और शुक्राणु इस श्रृंखला में हमने तशरीहुल-अज़ा (शरीर की संरचना) और मनाफ़ेउल-अज़ा (अंगों के कार्य) का संक्षिप्त परिचय इसलिए दिया है, ताकि पाठक प्रजनन तंत्र को वैज्ञानिक और हिकमती दोनों दृष्टिकोणों से आसानी से समझ सकें।”

भाग 1: वीर्य और शुक्राणु—एक नाम नहीं, दो अलग हक़ीक़तें
“मर्दाना सेहत की पहली शर्त यह है कि हम अपने शरीर को समझें—सिर्फ़ उसके बारे में सुनें नहीं।”
रशीद: लोग अक्सर कहते हैं, “वीर्य कम है, इसलिए ताक़त कम है।” क्या यह बात पूरी तरह सही है?
हामिद: नहीं दोस्त, यहीं से पहली ग़लतफ़हमी शुरू होती है।
वीर्य (Semen) एक तरल पदार्थ है, जो स्खलन (हमबिस्तरी, मूर्बाश्रत )के समय बाहर आता है।
इसके अंदर शुक्राणु (S***m) मौजूद होते हैं, लेकिन वीर्य और शुक्राणु एक ही चीज़ नहीं हैं। ये दोनों अलग अलग चीजे है।
रशीद: तो शुक्राणु क्या होते हैं?
हामिद: शुक्राणु पुरुष की प्रजनन कोशिकाएँ हैं। ये मुख्य रूप से वृषणों (Te**es) में बनते हैं। इनका काम अंडाणु तक पहुँचकर निषेचन की प्रक्रिया में भाग लेना है।
रशीद: यानी वीर्य सिर्फ़ शुक्राणुओं का दूसरा नाम नहीं?
हामिद: बिल्कुल नहीं। वीर्य में शुक्राणुओं के साथ प्रोस्टेट ग्रंथि और दूसरी सहायक ग्रंथियों से आने वाले तरल पदार्थ भी शामिल होते हैं। इसलिए केवल वीर्य की मात्रा देखकर शुक्राणुओं की सेहत का फैसला नहीं किया जा सकता।
रशीद: फिर असली जाँच किन बातों से होती है?
हामिद: मुख्य रूप से इन बातों से—
शुक्राणुओं की संख्या, उनकी गति और उनकी बनावट।
किसी व्यक्ति की प्रजनन क्षमता का सही आकलन केवल देखने से नहीं, बल्कि चिकित्सकीय जाँच से होता है।
रशीद: लोग इसे مادہ منویہ “माद्दा-ए-मनीय्या” कहते हैं, उसे कैसे समझें?
हामिद: हिकमत ने शरीर के मवाद और क़ुव्वतों को अपने दौर की भाषा में समझाया। आज आधुनिक शरीर-विज्ञान हमें बताता है कि प्रजनन-स्वास्थ्य कई चीज़ों पर निर्भर करता है—हार्मोन, वृषणों का स्वास्थ्य, जीवनशैली, पोषण और समग्र शरीर-स्वास्थ्य।
रशीद: तो पहली सीख क्या हुई?
हामिद:
वीर्य की मात्रा और शुक्राणुओं की गुणवत्ता—दो अलग बातें हैं।
और सेहत की हर बात में अंदाज़े से ज़्यादा अहमियत सही जानकारी की होती है।
“जो बदन की ख़ामोश भाषा समझ ले,
वही सेहत की असली हिकमत पढ़ ले।”
अगले بھاگ , भाग में:
शुक्राणु बनते कहाँ हैं, और बनने की पूरी प्रक्रिया क्या है?
ज़रूरी सावधानी: यह पोस्ट सामान्य स्वास्थ्य-जागरूकता के लिए है। यदि गर्भधारण में कठिनाई, दर्द, सूजन या लंबे समय से कोई समस्या हो तो योग्य यूनानी/आयुर्वेदिक चिकित्सक या यूरोलॉजिस्ट/एंड्रोलॉजिस्ट से परामर्श लें। Rao Asgar saharanpur (unani physician)
***mHealth

24/08/2026

Namaste,, assalam o alikum friends

24/08/2026

Aadab doston
Ladaai aur baat cheet,dono Chalo

Photos from Rao.asgar unani physician hakeem's post 12/08/2026

Happy International Youth Day 🌿

युवाओं की सेहत सिर्फ़ आज की ज़रूरत नहीं,
बल्कि आने वाले कल की बुनियाद है।
हमदर्द ने बरसों से यूनानी तिब्ब की उस रवायत को ज़िंदा रखा है, जहाँ दवा महज़ एक प्रोडक्ट नहीं, बल्कि इल्म, तजुर्बे और दवा-साज़ी की एक पूरी तहज़ीब होती है।
यूनानी दवाओं की असल खूबसूरती यही है कि इनके पीछे सदियों का तजुर्बा, जड़ी-बूटियों का इल्म और इंसानी जिस्म के मिज़ाज को समझने की एक मुकम्मल सोच मौजूद है।
हमदर्द के प्रोडक्ट्स इसी विरासत की आधुनिक पेशकश हैं—
जहाँ पुरानी हिकमत, आज की ज़रूरत और दवा-साज़ी के आधुनिक उसूल एक-दूसरे से मिलते हैं।
इस International Youth Day पर संदेश बस इतना—
युवा स्वस्थ होंगे, तो समाज मज़बूत होगा;
और अपनी विरासत को समझेंगे, तो भविष्य और भी समृद्ध होगा।
🌿 यूनानी तिब्ब की रवायत — इल्म से दवा तक, दवा से सेहत तक।

Rao Asgar saharanpur Unani physician

12/08/2026

Happy International Youth Day 🌿
युवाओं की सेहत सिर्फ़ आज की ज़रूरत नहीं,
बल्कि आने वाले कल की बुनियाद है।
हमदर्द ने बरसों से यूनानी तिब्ब की उस रवायत को ज़िंदा रखा है, जहाँ दवा महज़ एक प्रोडक्ट नहीं, बल्कि इल्म, तजुर्बे और दवा-साज़ी की एक पूरी तहज़ीब होती है।
यूनानी दवाओं की असल खूबसूरती यही है कि इनके पीछे सदियों का तजुर्बा, जड़ी-बूटियों का इल्म और इंसानी जिस्म के मिज़ाज को समझने की एक मुकम्मल सोच मौजूद है।
हमदर्द के प्रोडक्ट्स इसी विरासत की आधुनिक पेशकश हैं—
जहाँ पुरानी हिकमत, आज की ज़रूरत और दवा-साज़ी के आधुनिक उसूल एक-दूसरे से मिलते हैं।
इस International Youth Day पर संदेश बस इतना—
युवा स्वस्थ होंगे, तो समाज मज़बूत होगा;
और अपनी विरासत को समझेंगे, तो भविष्य और भी समृद्ध होगा।
🌿 यूनानी तिब्ब की रवायत — इल्म से दवा तक, दवा से सेहत तक।

Rao Asgar saharanpur Unani physician

08/08/2026

🌿 सेक्स के बाद बदन में टूट-फूट, थकान और दर्द —

कमज़ोरी या किसी बीमारी का इशारा?
50 प्लस उम्र के मर्दों में यह कैफ़ियत अक्सर महसूस हो सकती है। हमबिस्तरी के बाद कुछ वक़्त की थकान फ़ितरी है, लेकिन अगर शदीद कमज़ोरी, बदन-दर्द, बेचैनी, बेदिली या देर तक थकान बरक़रार रहे तो इसे सिर्फ़ मनी के ज़्यादा इख़राज से जोड़ना दुरुस्त नहीं।
यूनानी नज़रिए से इसे ज़ोफ़-ए-बाह, फ़ुतूर-ए-क़ुव्वत और मिज़ाज के असंतुलन से ताबीर किया जा सकता है। वहीं आधुनिक तिब्बी इल्म में उम्र, नींद की कमी, ज़ेहनी दबाव, डिप्रेशन, पानी की कमी, डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, ख़ून की कमी, विटामिन की कमी और हार्मोन्स के असंतुलन जैसे असबाब भी अहम हो सकते हैं।
🌿 असल उसूल — एहतियात, एतिदाल, ग़िज़ा औeesर आराम।
बादाम, अख़रोट, खजूर, दूध, अंडा, दालें और मुनासिब मात्रा में गोश्त जैसी मुतवाज़िन ग़िज़ा लें। पानी पर्याप्त पिएँ, नींद पूरी करें और हल्की कसरत को मामूल बनाएँ।
⚠️ किसी भी माजून, ख़मीरा या हर्बल दवा का इस्तेमाल माहिर हकीम या मुसद्दक़ डॉक्टर के मशवरे के बग़ैर न करें।
याद रखिए—उम्र बढ़ना कमज़ोरी की सज़ा नहीं; बदन के इशारों को समझना और वक़्त पर तश्ख़ीस कराना ही असल दानाई है।
🌿 एतिदाल रखिए, सेहत सँवारिए—क्योंकि क़ुव्वत सिर्फ़ जिस्म में नहीं, सही रवैये में भी होती है।
#हेल्थ_वेलनेस_सब्जियों #हिकमत

03/08/2026

🍽️ बाज़ार सिर्फ़ भूख से नहीं, समाज की बनावट से भी बनते हैं
अक्सर देखने में आता है कि कुछ इलाकों में होटल, ढाबे, मिठाई, स्नैक्स और स्ट्रीट फूड की भरमार होती है, जबकि कुछ रिहायशी क्षेत्रों में ऐसी दुकानें बहुत कम दिखाई देती हैं। इसका कारण केवल धर्म नहीं, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और शहरी नियोजन भी होता है।
जहाँ बाज़ार, किरायेदार, छात्र, यात्री और देर रात तक आवाजाही होती है, वहाँ खाने-पीने का कारोबार स्वाभाविक रूप से अधिक फलता-फूलता है। वहीं जिन इलाकों में बड़े प्लॉट, कम व्यावसायिक गतिविधि, सख़्त रिहायशी नियम और घर पर भोजन की परंपरा अधिक होती है, वहाँ ऐसी दुकानें कम विकसित होती हैं।
व्यापारी भी वहीं निवेश करता है जहाँ ग्राहक, आवाजाही और कमाई की संभावना अधिक हो। इसलिए किसी क्षेत्र की बाज़ार संस्कृति को केवल धर्म या जाति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
बाज़ार की असली भाषा जाति या मज़हब नहीं, बल्कि माँग, पहुँच और अवसर होती है। ✍️ राव असगर

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