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28/08/2024
पन्ना रत्न पहनने के फायदे -
1. बुध का रत्न पन्ना धारण करने से शरीर का रंग रूप निखरने लगता है लोगों का आकर्षण आपकी तरफ बढ़ने लगता है ऐसे लोग जिन्हें समाज में सम्मान नहीं मिलता उन लोगों को पन्ना धारण करना चाहिए।
2. पन्ना रत्न को धारण करने के बाद मान सम्मान गौरव बढ़ने लगता है समाज में इज्जत भी मिलने लगती हैं।
3. कई लोग मानसिक शक्ति से कमजोर होते हैं उन लोगों को भी पन्ना रत्न धारण करने पर काफी लाभकारी साबित होता है।
4. पन्ना रत्न धारण करने के बाद जातक को बीमारियों से लड़ने के लिए शक्ति मिलती है यह रत्न जातक के शरीर को रोग मुक्त बनाने में मददगार साबित होता है।
5. पन्ना रत्न कानूनी कार्यवाही मैं पड़े लोगों के लिए सबसे ज्यादा लाभकारी माना गया है।
6. यह रत्न जातक को चिंता मुक्त बनाने में और शत्रु से मुकाबला करने में काफी मददगार होता है।
7. पन्ना रत्न जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए काफी ज्यादा लाभकारी माना गया है। जो जातक अपने भाग्य को जाग्रत करना चाहते हैं उन्हें इस रत्न को अवश्य धारण करना चाहिए।
8. पन्ना रत्न धारण करने से हमारे कामों में आने वाली रुकावट से छुटकारा मिलने लगता है।
9. जब नौकरी और व्यापार में समस्याएं आने लगती हैं तब ज्योतिष की सलाह पर इसे धारण किया जाता है।
10. हमारे शरीर में पेट के हाजमा की आए दिन समस्या बनी रहती है तब भी पन्ना रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है इससे जल्दी ही हाजमा ठीक होने लगता है।
11. पन्ना धारण करने के बाद यदि उत्तम प्रभाव देने लगे तो आपके साथ साथ आपके परिवार की भी परेशानियां कम होने लगते हैं इसका लाभ पूरे परिवार को मिलता है।
12. पन्ना रत्न को धारण करने के बाद माता पिता के सामने भी आपका सम्मान बना रहता है और हर काम में माता पिता और परिवार का सहयोग मिलता है।
13. यदि आपको किसी भी व्यापार में पैसा लगाने पर दिक्कत आती है तो इन समस्या से छुटकारा पाने के लिए आपको पन्ना रत्न जरूर धारण करना चाहिए।
14. नौकरी करने वालों को प्रमोशन पाने के लिए पन्ना रत्न काफी लाभकारी माना जाता है, व्यापार से जुड़े लोगों के लिए भी पन्ना रत्न काफी लाभकारी साबित हो सकता है।
15. पन्ना रत्न को धारण करने से अधूरी मनोकामनाएं पूर्ण होने की संभावनाएं बनती हैं, ऐसे जातक जिनका बुध कमजोर हो उनके लिए पन्ना रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है।
16. ऐसे जातक को पन्ना रत्न धारण करते ही उनके बिगड़े हुए काम जल्द ही बनने शुरू हो सकते हैं।
पन्ना रत्न धारण करने की विधि -
पन्ना रत्न कम से कम 6 से 7 रत्ती का होना चाहिए इस रत्न को सोने या पंचधातु में अंगूठी बनवा कर हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) में धारण किया जाता है या आप लॉकेट के रूप में भी धारण कर सकते हैं।
पन्ना रत्न धारण करने से एक रात पहले एक कटोरी में गंगाजल, मिश्री शहद, दूध, का घोल बनाकर उसमें अंगूठी को डूबा कर रख दें सुबह उठकर धूप दीप दिखाकर 108 बार ॐ बुद्धाय नमः मंत्र का जाप करने के बाद रत्न को धारण करें।
अभिमंत्रित पन्ना रत्न कहां से प्राप्त करें
मित्रों यदि आप भी अभिमंत्रित पन्ना रत्न प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारे नवदुर्गा ज्योतिष केंद्र से अभिमंत्रित प्राप्त कर सकते हैं जो आपको 800₹ रत्ती नेचुरल पन्ना मिल जायेगा, साथ ही साथ मुफ्त में पंडित जी द्वारा अभिमंत्रित भी करके दिया जाएगा एवं लैब सर्टिफिकेट और गारंटी कार्ड साथ में दिया जाएगा - Call and Wataap 098299 15518
ज्योतिष में द्वितीय भाव की महत्ता
ज्योतिष विज्ञान में द्वितीय भाव (Second House) का स्थान महत्वपूर्ण है। इसे धन भाव या कुटुंब भाव भी कहा जाता है। यह जन्म कुंडली का दूसरा भाव होता है और जातक के जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाता है। द्वितीय भाव विशेष रूप से आर्थिक स्थिति, परिवार, और संचार कौशल को प्रभावित करता है।
द्वितीय भाव का महत्व
1. **धन और संपत्ति**: द्वितीय भाव मुख्य रूप से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, धन, संपत्ति और भौतिक संसाधनों को दर्शाता है। यह भाव बताता है कि व्यक्ति के पास कितनी आर्थिक समृद्धि होगी और वह धन कैसे अर्जित करेगा।
2. **परिवार और कुटुंब**: यह भाव जातक के परिवार, विशेषकर प्रारंभिक जीवन में माता-पिता और भाई-बहनों के साथ संबंधों को दर्शाता है। द्वितीय भाव से व्यक्ति का पारिवारिक वातावरण और पारिवारिक मूल्यों का भी पता चलता है।
3. **भाषण और संचार**: द्वितीय भाव व्यक्ति के भाषण, वाणी और संचार कौशल को भी प्रभावित करता है। यह बताता है कि व्यक्ति की बोलने की शैली कैसी है और वह अपनी बात कैसे प्रस्तुत करता है।
4. **भोजन और खान-पान**: द्वितीय भाव व्यक्ति की खाने-पीने की आदतों, खान-पान की पसंद और उसके द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं को भी दर्शाता है।
5. **मूल्य और नैतिकता**: यह भाव जातक के नैतिक मूल्यों, विश्वासों और उसकी प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है। द्वितीय भाव व्यक्ति के जीवन में महत्व रखने वाले मूल्यों और उसकी नैतिकता को परिभाषित करता है।
द्वितीय भाव का निर्धारण
द्वितीय भाव का स्वामी ग्रह और उसमें स्थित ग्रह जातक के जीवन के उपरोक्त पहलुओं को प्रभावित करते हैं। शुभ ग्रहों की उपस्थिति आर्थिक समृद्धि, अच्छे पारिवारिक संबंध और अच्छे संचार कौशल का संकेत देती है, जबकि अशुभ ग्रह आर्थिक समस्याओं, पारिवारिक संघर्षों और संचार में कठिनाइयों का कारण बन सकते हैं।
द्वितीय भाव और ग्रहों का प्रभाव
1. **शुभ ग्रह**: यदि द्वितीय भाव में या उसके स्वामी ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तो यह व्यक्ति के जीवन में धन और संपत्ति का प्रवाह सुनिश्चित करता है। यह व्यक्ति के पारिवारिक जीवन को भी सुखद बनाता है और उसकी वाणी को मधुर बनाता है।
2. **अशुभ ग्रह**: अशुभ ग्रहों की स्थिति या दृष्टि द्वितीय भाव पर व्यक्ति के जीवन में आर्थिक कठिनाइयाँ, पारिवारिक समस्याएँ और संचार में बाधाएँ ला सकती हैं।
3. **ग्रहों की दशाएँ**: द्वितीय भाव के ग्रहों की दशाएँ और अंतर्दशाएँ जातक के आर्थिक स्थिति, पारिवारिक जीवन और संचार कौशल को समय-समय पर प्रभावित करती हैं।
द्वितीय भाव और आय के स्रोत
द्वितीय भाव व्यक्ति के आय के स्रोतों और धन संचय के तरीकों को भी दर्शाता है। यह भाव बताता है कि व्यक्ति किस प्रकार से धन अर्जित करेगा, चाहे वह नौकरी हो, व्यवसाय हो, या अन्य स्रोत।
निष्कर्ष
द्वितीय भाव ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण भाव है, जो व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, पारिवारिक जीवन, और संचार कौशल को प्रभावित करता है। जन्म कुंडली में द्वितीय भाव और उसके स्वामी ग्रह की स्थिति का विश्लेषण करके, ज्योतिषी व्यक्ति के आर्थिक भविष्य, पारिवारिक संबंधों और उसके संचार कौशल का सही-सही अनुमान लगा सकता है।
इस प्रकार, द्वितीय भाव न केवल आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह व्यक्ति के पारिवारिक जीवन और सामाजिक संबंधों का भी महत्वपूर्ण संकेतक है। एक सक्षम ज्योतिषी द्वितीय भाव का विश्लेषण कर व्यक्ति को जीवन में आर्थिक और पारिवारिक दृष्टिकोण से सफलता प्राप्त करने के उपाय भी सुझा सकता है।
10/04/2024
संवत्सर पिङ्गल या कालयुक्त???
तिथि क्षयकी तरह संवत्सर भी क्षय/ लुप्त हो जाता है। प्रभवादि साठ संवत्सर हैं। उनकी गणना बृहस्पति और चंद्रके आधार पर चलती है। बृहस्पतिके अतिचारी हो जानेके कारण लगभग 2 वर्ष पूर्वही एक संवत्सर लुप्त हो गया था। कुछ पंचांगकारोंने इस पर ध्यान नहीं दिया है और वे 1 वर्ष पीछे चल रहे हैं। मुख्य रूपसे कालयुक्त संवत ही नवसंवत्सर है। नारायण नारायण
आइए हम स्वागत करते हैं, भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 9 अप्रैल 2024 क्या आप सब तैयार हैं, अपने घर पर भगवा लहराने को!� जय श्री राम
सनातन हिन्दू
जीवन सीखने की एक सतत यात्रा के रूप में सामने आता है, और इसमें अमूल्य सबक हैं जिन्हें सीखा भी जाना चाहिए और प्रदान भी किया जाना चाहिए। सबसे पहले, चुनौतियों का सामना करने में लचीलापन एक महत्वपूर्ण सबक है, जो हमें सिखाता है कि असफलताएँ बाधाएँ नहीं हैं बल्कि विकास
के अवसर हैं। सहानुभूति और समझ का महत्व एक और महत्वपूर्ण सबक है, जो विविध दृष्टिकोणों की सराहना करने और करुणा विकसित करने की आवश्यकता पर बल देता है। परिवर्तन को अपनाना सीखना मौलिक है; जीवन गतिशील है, और अनुकूलनशीलता इसके उतार-चढ़ाव से निपटने की हमारी क्षमता सुनिश्चित करती है। दृढ़ता का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया जा सकता; सफलता अक्सर दृढ़ता और कठिनाइयों के बावजूद डटे रहने की इच्छा से उत्पन्न होती है। इसके अलावा, जीवन के
छोटे-बड़े आशीर्वादों के प्रति कृतज्ञता को बढ़ावा देना सकारात्मक मानसिकता में योगदान देता है। सत्यनिष्ठा और नैतिक आचरण के पाठ एक सैद्धांतिक जीवन का आधार बनते हैं, जो ईमानदारी और
जिम्मेदारी के महत्व पर जोर देते हैं। अंततः, आत्म-प्रेम और आत्म-देखभाल का पाठ आवश्यक है; केवल स्वयं का पोषण करके ही कोई वास्तव में दूसरों की भलाई में योगदान दे सकता है। इन
जीवन पाठों को पढ़ाने और अपनाने से अधिक लचीला, दयालु और पूर्ण अस्तित्व का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
02/06/2023
प्रश्न १:-
ब्राह्मण से ही पूजा-पाठ क्यों कराएं ?
उत्तर:-
यम-नियम में आबद्ध ब्राह्मण- वर्ग अपनी निरंतर उपासना व त्यागवृत्ति, सात्त्विकता एवं उदारता के कारण ईश्वरतत्त्व के सर्वाधिक निकट रहते हैं। फिर धर्मशास्त्र, कर्मकांड के ज्ञाता एवं अधिकारी विद्वान होने के कारण परंपरागत मान्यता अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार उन्हें ही है।
प्रश्न २:-
ब्राह्मण को देवता क्यों कहा गया ?
उत्तर:-
दैवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता।
ते मंत्रा विप्रं जानंति, तस्मात् ब्राह्मणदेवताः।।
यह सारा संसार विविध देवों के अधीन है। देवता मंत्रों के अधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग-उच्चारण व रहस्य को विप्र भली-भांति जानते हैं इसलिये ब्राह्मण स्वयं देवता तुल्य होते हैं।
प्रश्न ३:-
ब्राह्मणों को लोक-व्यवहार में अधिक सम्मान क्यों ?
उत्तर:-
निरंतर प्रार्थना, धर्मानुष्ठान व धर्मोपदेश कर के जिस प्रकार मौलवी मस्जिद का प्रमुख, गिरजाघर में पादरी सर्वाधिक सम्मानित होता है, उनसे भी बढ़कर ब्राह्मण का सम्मान परंपरागत लोक-व्यवहार में सदा सर्वत्र होता आया है।
प्रश्न ४:-
यज्ञ की अग्नि में तिल-जव
इत्यादि खाद्य पदार्थ क्यों ?
उत्तर:-
आज के प्रत्यक्षवादी युग के व्यक्ति हवन में घी-तिल-जव आदि की आहुतियों को अग्नि में व्यर्थ फूंक देने की जंगली प्रथा ही समझते हैं।
प्रत्यक्षवादियों की धारणा वैसी ही भ्रमपूर्ण है जैसी कि किसान को कीमती अन्न खेत की मिट्टी में डालते हुये देखकर किसी कृषि विज्ञान से अपरिचित व्यक्ति की हो सकती है।
प्रत्यक्षवादी को किसान की चेष्टा भले ही मूर्खता पूर्ण लगती हो पर बुद्धिमान कृषक को विश्वास है, कि खेत की मिट्टी में विधिपूर्वक मिलाया हुआ उसका प्रत्येक अन्नकण शतसहस्र-गुणित होकर उसे पुनः प्राप्त होगा।
यही बात यज्ञ के संबंध में समझनी चाहिये। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न-कण शत सहस्र गुणित हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लक्ष-गुणित हो जाता है। किसान का यज्ञ पार्थिव और हमारा यज्ञ तैजस्।
कृषि दोनों है एक आधिभौतिक तो दूसरी आधिदैविक। एक का फल है- स्वल्पकालीन अनाजों के ढेर से तृप्ति तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से अनन्तकालीन तृप्ति।
यज्ञ में ‘द्रव्य’ को विधिवत अग्नि में होम कर उसे सूक्ष्म रूप में परिणित किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूलांश भस्म रूप में पृथ्वी पर रह जाता है।
स्थूल सूक्ष्म उभय-मिश्रित भाग धूम्र बनकर अंतरिक्ष में व्याप्त हो जाता है, जो अंततोगत्वा मेघरूप’ में परिणित होकर द्यूलोकस्थ देवगण को परितृप्त करता है।
‘स्थूल-सूक्ष्मवाद’ सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अंश अबाध गति से अपने अंशी तक पहुंचकर ही रहता है। जल कहीं भी हो, उसका प्रवाह आखिरकार अपने उद्गम स्थल समुद्र में पहंचे बिना दम नहीं लेता।
यह वैज्ञानिक सूत्र स्वतः ही प्रमाणित करता है कि अग्नि में फूंके गये पदार्थ की सत्ता समाप्त नहीं होती।
मनुस्मृति, अध्याय 3/76 में भी एक महत्वपूर्ण सूत्र है।
‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यं उपष्ठिते’
अग्नि में विधिवत डाली हुई आहुति, सूर्य में उपस्थित होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 14-15 में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि चक्र व यज्ञ के बारे में कहते हैं- संसार के संपूर्ण प्राणी अन्न (खाद्य पदार्थ) से उत्पन्न होते हैं।
अग्नि की उत्पत्ति वृष्टि से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ (वेद) विहित कार्यों से उत्पन्न होने वाला है।
उत्तम ब्राम्हण की महिमा-
जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।
विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।
ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए। संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है।
जो वेद,मन्त्र तथा पुराणों से शुद्ध होकर तीर्थस्नानादि के कारण और भी पवित्र हो गया है, वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।
पुराणकथको नित्यं धर्माख्यानस्य सन्तति:।
अस्यैव दर्शनान्नित्यं अश्वमेधादिजं फलम्।।
जिसके हृदय में गुरु,देवता,माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है, जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
पितामह भीष्म जी पुलस्त्य जी से पूछा–
गुरुवर!मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यह बताने की कृपा करें।
पुलस्त्यजी ने कहा–
राजन!इस पृथ्वी पर ब्राह्मण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है। तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव (ब्राम्हण )नित्य पवित्र माने गये हैं।
ब्राह्मण देवताओं का भी देवता है...
जय महादेव
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।।
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