Revenue Village Mothli
ग्राम पंचायत समिति द्वारा संचालित रा?
14/03/2022
विकास का रास्ता गाँव से होकर गुजरता है
भारत माता ग्राम वासिनी।
खेतों में फैला है स्यामल धूल भरा सा आँचल,
गंगा यमुना के आँसू जल।
मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी,
भारत माता ग्राम वासिनी।। -पं- सुमित्रनंदन पंत
ग्राम या गाँव छोटी मानव बस्तियाँ होती हैं जिनकी आबादी कुछ सौ से लेकर हजार तक होती है। गाँव के लोगों की आजीविका प्रायः कृषि या कोई परम्परागत कार्य होती है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि भारत का दिल गांवों में बसता है। देश की लगभग 70 प्रतिशत से अधिाक आबादी गांव में निवास करती है। भारत का महत्व गांव से ही है। हमारे गांव हमारी रीढ़ हैं। देश की कृषि गांवों से चलती है। इसलिये भारत को कृषि प्रधान देश भी कहा जाता है।
मनुष्य ने अपना शुरूआती जीवन जंगलों, गफ़ुाओं आदि में बिताया है। धीरे-धीरे मानव ने गांवों का विकास किया। वह सभ्यता को नहीं जान पाया। बाद में गांवों ने ही नगरों की शक्ल ली। कभी जहां गांव हुआ करता था आज वहां भरा-पूरा शहर दिखाई पड़ता है। हमारे गांव आज भी प्रकृति से जुड़े हैं। वहां हरियाली है। खेत-खलिहान गांव में ही बसते हैं। बैल-गाड़ी केवल उन कच्चे रास्तों से होकर गुजरती हुई अच्छी लगती है, जो रास्ता खेत को जाता है।
अंग्रेजी शासन काल में इन गावों की दशा पर बिल्कुल धयान नहीं दिया गया, उस समय जमींदारों और सेठ- साहूकारों ने खूब जमकर जनता का शोषण किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इसमें कुछ सुधार नहीं हुए और देश के राजनेता इसे बखूबी जारी रख अपना पेट और घर भरते रहे। आर्थिक और सामाजिक समीकरण कुछ ऐसे बुने गये कि विकास के ज्यादातर प्रयास सिफ़र् शहरों तक ही सीमित रह गये। जहाँ एक ओर शहरों में ऊँची- ऊँची अट्टालिकायें और फ्लैट बनते गये, वहीं दूसरी ओर गाँव मूलभूत सुविधाओं से भी महरूम रहे।
भारत कृषि प्रधान देश है फि़र भी किसानों को उन्नत किस्म के कृषि यन्त्र और खाद्य सही समय पर नहीं मिल पाते हैं। अगर थोड़े बहुत कुछ प्रयास हुए भी हैं तो वह आवश्यकता से कम हैं। महंगी कृषि के आधुनिक यन्त्र गरीब जनता नहीं खरीद सकती इसलिए आज भी कृषि बैल और जैविक खादों पर आश्रित हैं। सिंचाई संसाधानों के अभाव में कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर है जिस वर्ष सही समय पर मानसून आ गये उस साल तो ठीक है, वरना फ़सल बर्बाद हो जाती है। कहीं अतिवृष्टि से फ़सलें पानी में डूबकर नष्ट हो जाती हैं और कहीं अनावृष्टि से फ़सलें पानी के बिना सूख जाती हैं।
महात्मा गांधी ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था जहां गांव विकसित हों। वे विकास को तरसें नहीं। आज बहुत से गांव दयनीय स्थिति में हैं। उनमें लोग कई तरह की समस्याओं से ग्रसित हैं। खेती के लिये ज़मीन नहीं है। ज़मीन है तो साधानों का अभाव है। खेती से लोगों का मोहभंग होता जा रहा है। कारण है खेती की लागत के मुकाबले लाभ का न होना। सरकार द्वारा किसानों की उपेक्षा की जा रही है। उनकी फ़सल का उचित मूल्य उन्हें नहीं दिया जा रहा। किसान कर्ज में दबकर आत्महत्या तक करने को मजबूर हो रहे हैं।
समय के साथ गांवों ने तरक्की भी की है। बहुत से गांव ऐसे भी हैं जहां जाति-पांति का नामो निशान नहीं। वहां समाज की रूढियों को तोड़ा जा चुका है। साथ ही अंधाविश्वास को तिलांजलि देकर एक नये कल का सपना संजोया गया है। लोग मेहनत से काम में जुटे हैं। शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है।
क्योंकि भारत की अधिाकतम आबादी गाँवों में बसती है इसलिए स्पष्ट कहा जा सकता है कि गाँव का विकास ही वस्तुतः देश का विकास है। आवश्यकता है तो सरकार को जनप्रतिनिधिायों को और जनता को जागरूक होने की। गाँवों को अविकसित दशा में छोड़कर आधारभूत संरचना के अभाव में और मूलभूत सुविधाएँ गाँवों को न प्रदान कर हम भारत देश के विकास की परिकल्पना भी नहीं कर सकते।
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24/12/2021
"यदि सूर्य सत्य है, और चंद्रमा भी है, तो यह भी उतना ही सच है कि भारत भी स्वतंत्र होगा"~ शहीद लक्ष्मण नायक
महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, आदिवासी भूमियाँ सरदार, 'मलकानगिरी के गाँधी', आदिवासी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, शहीद लक्ष्मण नायक जी की जयंती पर शत् शत् नमन🌼🙏🏽
आदिवासी प्रतिरोध के नायक: लक्ष्मण नायक, ओडिशा के एक महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म 22 नवंबर 1899 को कोरापुट जिले के तेंतुलिगुमा गांव में हुआ था और उनके पिता पदलम नायक तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में 'जेपोर समस्थानम' के तहत एक आदिवासी सरदार और 'मुस्तेदार' थे। वह 1936 के पहले चुनाव के दौरान मलकानगिरी उप-मंडल में कांग्रेस के अभियान में शेफ डी मिशन बने। स्थानीय प्रशासन ब्रिटिश सरकार के सहायक के रूप में कार्य करता था । उनके प्रशासन के तहत आदिवासियों के साथ राजस्व अधिकारियों, वन गाइडों और पुलिस कांस्टेबलों द्वारा बुरा व्यवहार किया गया और उन्हें यातना दी गई । नायक ने जैपोर समस्थानम के अधिकारियों द्वारा शोषण के खिलाफ विद्रोहियों को सफलतापूर्वक संगठित किया। इससे उन्हें एक संभावित आदिवासी नेता के रूप में पहचान मिली।
अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचार और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए आदिवासी लोगों को संगठित किया। नायक ने अंग्रेज़ों के खिलाफ अपना एक क्रांतिकारी गुट तैयार किया। आम आदिवासियों के लिए वे एक नेता बनकर उभरे। उनके कार्यों की वजह से पुरे देश में उन्हें जाना जाने लगा। इसी के चलते कांग्रेस ने उन्हें अपने साथ शामिल करने के लिए पत्र लिखा। कांग्रेस की सभाओं और ट्रेनिंग सेशन के दौरान वे गाँधी जी के सम्पर्क में आये। बताया जाता है कि वे गाँधी जी से काफी प्रभावित थे। उनके दिल में राष्ट्रवाद की भावना जागृत होने लगी। इसके बाद वे न केवल आदिवासियों के लिए अपितु सभी देशवासियों के लिए सोचने लगे। वे गाँधी जी का चरखा साथ लेकर आदिवासी गाँवों में एकता व शिक्षा के लिए लोगों को प्रेरित करते थे। उन्होंने ग्रामीण इलाकों में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई। उन्हें बहुत से लोग ‘मलकानगिरी का गाँधी’ भी कहने लगे थे।
महात्मा गांधी के आह्वान पर लक्ष्मण नायक ने 21 अगस्त 1942 को जुलूस का नेतृत्व किया और मैथिली पुलिस स्टेशन के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। लेकिन पुलिस ने प्रदर्शनकारी पर अंधाधुंध फायरिंग की. इसने इस भीषण घटना में 40 लोगों की जान ले ली और 200 से अधिक घायल हो गए। लेकिन प्रशासन ने लक्ष्मण नायक को हत्या के मामले में और झूठा फंसाया और ‘मलकानगिरी का गाँधी’ जिससे डरकर, 13 नवंबर, 1942 को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। उसके साथी कैदी उसे फांसी दिए जाने से एक दिन पहले, मार्च 28,1943 की पूरी रात रोते रहे। 29 मार्च 1943 को बेरहामपुर जेल में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। यद्यपि वे स्वतंत्र भारत को देखने के लिए जीवित नहीं थे, फिर भी वे नेताओं के नेता के रूप में भारत के लाखों लोगों के मन में अंकित रहे।
जोहार✨
जय आदिवासी🏹
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