Kabir is super me god
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10/01/2022
#कबीरसागर_का_सरलार्थPart217
बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाण
परमेश्वर कबीर जी ने बताया कि हे धर्मदास! तू मेरा अंश है। मैं तुझे एक अति गुप्त भेद बताता हूँ जो मैंने अभी तक तुझसे छुपा रखा है। सात सुरति तो उत्पत्ति करने वाली हैं। तुम आठवीं सुरति हो तथा नौतम सुरति मेरा निज वचन है यानि उसको पूर्ण मोक्ष मंत्र देने का अधिकार मैंने दिया है। जो उससे दीक्षा लेगा, उसको काल चोर रोक नहीं सकता। धर्मदास ने प्रार्थना की कि हे परमात्मा! मुझे वह वचन बताओ जिससे जीव जन्म-मरण के चक्र में न आए। परमात्मा कबीर जी ने कहा कि आठ बून्द यानि सतलोक में स्त्राी-पुरूष से उत्पन्न अच्छी आत्माओं (हंसों) द्वारा काल लोक से जीव मुक्त कराने की युक्ति (योजना) बनाई थी। तुम आठवीं बून्द हो। तुम सबको काल ने भ्रमित कर दिया। अब नौंवी बून्द (नौतम सुरति) को संसार में भेजूंगा। उसका जन्म भी तुम्हारी तरह बून्द से यानि माता-पिता से होगा। (तब युग बन्द हुए धर्मदास। नौतम सुरत बून्द प्रकाशा। आठ बून्द की जुगति बनाई। नौतम से आठों बून्द मुक्ताई।) उस एक बून्द से तेरे सहित आठों बून्द तथा तेरे बून्द (बिन्द) वाले बयालीस वंश पार कर दिए यानि आशीर्वाद दे दिया। (वंश बयालीस बून्द तुम्हारा। सो मैं एक बून्द से तारा।) हे धर्मदास! तू मेरी आठवीं सुरति है जो संसार में भेजा है। कलयुग पाँच हजार पाँच सौ पाँच वर्ष बीत जाने पर मेरा यथार्थ तेरहवां पंथ चलेगा, उसको चलाने वाली मेरी नौतम सुरति होगी। वह नौंवी (9वीं) आत्मा मेरा निज बचन यानि सत्य नाम, सार शब्द लेकर जन्मेगा, उसके द्वारा चलाए पंथ में जो नाम दीक्षा लेगा तो काल चोर उसको रोक नहीं सकेगा।
धर्मदास-उवाच
धर्मदास दोई कर जोरा। कहो बचन सोई सतगुरू मोरा।।
सोई बचन कहो समुझाई। जेहि तें जीव सृष्टि में न आई।।
सतगुरू उवाच
आठ बून्द की जुगति बनाई। नौतम तें आठों बून्द मुक्ताई।।
बिना गुरू कोऊ भेद नहीं पावै। युगबन्ध होवै तो हंस कहावै।।
भावार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! मेरी योजना आठ अच्छी आत्माओं को काल लोक में जन्म देकर जीव उद्धार करने की थी, परंतु वे आठों भी काल के वश होकर भटक रही हैं। जन्म से आठवीं बूंद यानि माता-पिता के बीज से बने मानव शरीर वाली आठवीं आत्मा तुम हो। उन आठों का भी उद्धार नौंवीं बूंद यानि मानव जन्म प्राप्त अच्छी आत्मा से होगा।
कबीर बानी पृष्ठ 133 पर अधिकतर मिलावटी तथा बनावटी वाणी हैं जिनका प्रसंग से मेल नहीं होता।
केवल धर्मदास की विनती ठीक है जिसमें परमेश्वर से पूछा है कि मेरे नारायण पुत्र की शिक्षा-दीक्षा कैसी चलेगी?
धर्मदास विनती अनुसारी। साहब विनती सुनो हमारी।।
नारायण दास हमारे पुत्र सोई। उनकी सिखावन कैसी होई।।
सतगुरू उवाच
तब सतगुरू यह वचन पुकारा। चूड़ामणि वंश छत्र उजियारा।।
और सब जीव काल धर खाई। नारायण जीव काल का भाई।।
चूड़ामणी नाम से काल डराई। सत्य नाम है तो जीव मुक्ताई।।
तिनकी सनंद चलै संसारा। उनके हाथ नाम सत हमारा।।
ये वाणी उचित हैं, शेष बनावटी हैं।
भावार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने स्पष्ट कर दिया है कि नारायण दास तो काल का भेजा जीव है। वह हमारे मार्ग पर नहीं चलेगा। उसने तो श्री कृष्ण की महिमा बताई थी। चूड़ामणी को मैं गुरूपद दूँगा। उसके सिर पर गुरू पद का छत्र लगेगा। अनुराग सागर के पृष्ठ 140 पर स्पष्ट किया है कि चूड़ामणि की परंपरा भी भ्रमित होकर काल जाल में रह जाएगी। उपरोक्त वाणी में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि गुरू पद पर विराजमान के पास सतनाम है तो जीव मुक्त होंगे। उनकी सनद यानि प्रमाणिकता संसार में मुक्ति के लिए मान्य होगी। उनके हाथ में हमारा सत शब्द भी रहेगा। अन्यथा न गुरू का मोक्ष होगा, न अनुयाईयों का। सतनाम तथा सारशब्द चुड़ामणि जी के पास नहीं था। वह तो अब तक (सन् 1997 तक) छुपाकर रखना था।
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