S. M. Life
इंडिया में पहली बार 100% शुद्ध और असरकार?
14/08/2024
**साइटिका का दर्द** एक गंभीर समस्या हो सकती है, जो सामान्यतः निचली पीठ से शुरू होकर पैरों में फैल जाती है। यह दर्द सायटिक नर्व के दबाव या उत्तेजना के कारण होता है, जो शरीर के सबसे लंबे और सबसे चौड़े नसों में से एक है। आयुर्वेद में इस स्थिति को "ग्रिध्रसी" के नाम से जाना जाता है, और इसका उपचार प्राकृतिक तरीके से करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
# # # **आयुर्वेदिक दृष्टिकोण:**
आयुर्वेद के अनुसार, साइटिका का मुख्य कारण वात दोष का असंतुलन होता है। जब वात दोष असंतुलित हो जाता है, तो यह शरीर में सूजन और दर्द को बढ़ाता है, विशेषकर नसों में। इसलिए, आयुर्वेदिक उपचार का मुख्य लक्ष्य वात दोष को संतुलित करना, सूजन को कम करना और नसों की ताकत को बढ़ाना होता है।
# # # **उपचार विधियाँ:**
1. **हर्बल उपचार:**
- **अश्वगंधा**: यह एक शक्तिशाली वातशामक औषधि है, जो नसों को शांत करने और मांसपेशियों के दर्द को कम करने में सहायक होती है।
- **गुग्गुलु**: यह सूजन को कम करता है और जोड़ों के दर्द में राहत देता है।
- **शल्लकी** (बोसवेलिया): यह सूजन और दर्द को कम करने में सहायक होती है और साइटिका के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है।
- **रस्नादि कषायम**: यह एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि है, जो साइटिका के दर्द में विशेष रूप से प्रभावी है। इसे अन्य हर्बल उपचारों के साथ मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है।
2. **पंचकर्म चिकित्सा:**
- **बस्ती (एनिमा थेरेपी)**: यह वात दोष को संतुलित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें औषधीय तेलों और काढ़े का प्रयोग किया जाता है, जो मलाशय के माध्यम से दिया जाता है।
- **अभ्यंग (तेल मालिश)**: इसमें औषधीय तेलों से पूरे शरीर की मालिश की जाती है, जिससे वात दोष को शांत किया जाता है और मांसपेशियों और नसों को आराम मिलता है।
- **स्वेदन (भाप उपचार)**: इसमें गर्म भाप का उपयोग करके शरीर को गर्म किया जाता है, जिससे सूजन और दर्द में राहत मिलती है।
3. **आहार और जीवनशैली:**
- **संतुलित आहार**: वात दोष को संतुलित करने के लिए, गर्म, ताजे और पौष्टिक भोजन का सेवन करना चाहिए। ठंडे, बासी और सूखे भोजन से बचना चाहिए।
- **योग और प्राणायाम**: कुछ विशेष योगासन, जैसे कि भुजंगासन, शलभासन और पवनमुक्तासन, साइटिका के दर्द को कम करने में सहायक हो सकते हैं। प्राणायाम के रूप में अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम फायदेमंद होते हैं।
- **समय पर सोना**: नियमित और पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है, क्योंकि यह शरीर को पुनः संतुलित करने में मदद करता है।
4. **घरेलू उपचार:**
- **हल्दी और अदरक का सेवन**: ये दोनों प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट्स हैं, जो सूजन और दर्द को कम करते हैं।
- **गर्म और ठंडी सिकाई**: दर्द वाली जगह पर गर्म और ठंडी सिकाई करने से दर्द में आराम मिलता है।
# # # **निष्कर्ष:**
आयुर्वेद में साइटिका के दर्द का उपचार मुख्यतः वात दोष को संतुलित करने पर केंद्रित होता है। हर्बल औषधियों, पंचकर्म, संतुलित आहार और योगासन के माध्यम से इस समस्या का प्राकृतिक और प्रभावी ढंग से उपचार किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी उपचार को शुरू करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करना महत्वपूर्ण है। इससे सही दिशा में उपचार करने और दीर्घकालिक लाभ प्राप्त करने में मदद मिलती है।
25/06/2024
बवासीर (पाइल्स) एक सामान्य समस्या है जिसमें गुदा क्षेत्र में सूजन या गांठ हो जाती है। यह मुख्यतः रक्त वाहिकाओं के बढ़ने और सूजन के कारण होता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे कब्ज, गर्भावस्था, मोटापा, अनियमित जीवनशैली और गलत खानपान। बवासीर के दो प्रकार होते हैं: आंतरिक और बाहरी। आंतरिक बवासीर गुदा के अंदर होती है, जबकि बाहरी बवासीर गुदा के बाहर की ओर होती है।
# # # प्राकृतिक चिकित्सा
प्राकृतिक चिकित्सा बवासीर के उपचार में प्रभावी हो सकती है। इसमें मुख्यतः खानपान और जीवनशैली में बदलाव शामिल होता है।
1. **फाइबर युक्त आहार**: अपनी डाइट में फाइबर शामिल करें, जैसे फल, सब्जियाँ, और साबुत अनाज। यह मल को नरम बनाने में मदद करता है और कब्ज से बचाव करता है।
2. **पानी पिएं**: पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेटेड रहता है और पाचन प्रक्रिया सही ढंग से होती है।
3. **व्यायाम**: नियमित व्यायाम करने से पाचन तंत्र में सुधार होता है और कब्ज से राहत मिलती है।
4. **गर्म पानी का स्नान**: गुदा क्षेत्र में गर्म पानी से स्नान करने से सूजन और दर्द में राहत मिलती है।
5. **शौचालय की आदतें**: जब भी शौच का अनुभव हो, तुरंत शौचालय जाएं और ज़्यादा समय तक बैठने से बचें।
# # # आयुर्वेदिक उपचार
आयुर्वेद में बवासीर के इलाज के लिए कई प्रकार की औषधियाँ और उपचार विधियाँ बताई गई हैं।
1. **त्रिफला**: त्रिफला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि है जो पाचन तंत्र को सुधारती है और कब्ज को दूर करती है।
2. **अरशकुटार रस**: यह एक आयुर्वेदिक औषधि है जो बवासीर के इलाज में प्रभावी मानी जाती है।
3. **नागरमोथा**: यह एक हर्ब है जो बवासीर के दर्द और सूजन को कम करने में मदद करती है।
4. **नीम और हल्दी**: नीम और हल्दी का मिश्रण गुदा क्षेत्र में लगाने से सूजन और संक्रमण से राहत मिलती है।
5. **त्रिफला चूर्ण**: त्रिफला चूर्ण को नियमित रूप से लेने से पाचन तंत्र सही रहता है और बवासीर की समस्या नहीं होती।
# # # घरेलू उपाय
1. **एलोवेरा**: एलोवेरा जेल को गुदा क्षेत्र में लगाने से सूजन और जलन में राहत मिलती है।
2. **नारियल तेल**: नारियल तेल का उपयोग करने से बवासीर के दर्द और सूजन में राहत मिलती है।
3. **बर्फ का उपयोग**: बर्फ के टुकड़े को गुदा क्षेत्र पर लगाने से सूजन कम होती है और दर्द में राहत मिलती है।
4. **अंजीर**: रात को पानी में भिगोए हुए अंजीर खाने से पाचन तंत्र सही रहता है और कब्ज से बचाव होता है।
# # # निष्कर्ष
बवासीर एक गंभीर समस्या हो सकती है, लेकिन सही उपचार और जीवनशैली में बदलाव से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक उपचार दोनों ही बवासीर के इलाज में प्रभावी हो सकते हैं। नियमित रूप से व्यायाम, सही खानपान, और उचित देखभाल से बवासीर की समस्या से बचा जा सकता है। अगर समस्या अधिक गंभीर हो जाए तो चिकित्सक से सलाह लेना आवश्यक है।
25/06/2024
**गठिया, प्राकृतिक चिकित्सा, और आयुर्वेदिक उपचार**
**गठिया (Arthritis):**
गठिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें जोड़ों में सूजन, दर्द, और अकड़न होती है। यह अक्सर उम्र के साथ बढ़ता है, लेकिन किसी भी उम्र में हो सकता है।
**प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy):**
प्राकृतिक चिकित्सा एक ऐसी विधि है जिसमें बिना दवाओं के प्राकृतिक तरीकों से बीमारी का इलाज किया जाता है। इसमें सही खानपान, व्यायाम, और जीवनशैली में बदलाव शामिल होते हैं।
1. **आहार:** संतुलित और पोषक आहार लें। ताजे फल, सब्जियां, और साबुत अनाज शामिल करें।
2. **व्यायाम:** हल्के व्यायाम जैसे योग और तैराकी करें, जो जोड़ों पर कम दबाव डालते हैं।
3. **ध्यान और प्राणायाम:** ये तनाव कम करते हैं और मानसिक शांति प्रदान करते हैं।
**आयुर्वेदिक उपचार (Ayurvedic Treatment):**
आयुर्वेद एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली है जो प्राकृतिक तत्वों और जड़ी-बूटियों का उपयोग करती है।
1. **अश्वगंधा:** यह एक जड़ी-बूटी है जो सूजन और दर्द को कम करने में मदद करती है।
2. **गुग्गुल:** यह एक अन्य जड़ी-बूटी है जो गठिया के दर्द को कम करने में सहायक है।
3. **अभ्यंग (तेल मालिश):** तिल के तेल से मालिश करने से जोड़ों का दर्द कम होता है और आराम मिलता है।
4. **हल्दी:** हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो सूजन को कम करते हैं। आप इसे दूध के साथ ले सकते हैं।
5. **त्रिफला:** यह एक पाचन सुधारक है और विषाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर निकालता है।
**सुझाव:**
- ठंडे पानी से जोड़ों पर सिकाई करें ताकि सूजन कम हो।
- गर्म पानी में नमक डालकर जोड़ों को सेकें।
- नियमित रूप से डॉक्टर से परामर्श लें और उनकी सलाह का पालन करें।
इन उपचारों और सुझावों का पालन करने से गठिया के दर्द और लक्षणों में कमी आ सकती है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
24/06/2024
सोरायसिस (Psoriasis) एक पुरानी त्वचा रोग है जिसमें त्वचा पर लाल, खुजलीदार, और खुरदरी परतें बन जाती हैं। यह रोग ऑटोइम्यून स्थिति से संबंधित होता है, जिसमें शरीर की इम्यून प्रणाली त्वचा की कोशिकाओं पर हमला करती है।
# # # आयुर्वेदिक उपचार:
1. **नीम (Azadirachta indica)**: नीम के पत्तों का पेस्ट बनाकर प्रभावित स्थान पर लगाएं। नीम में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो सोरायसिस के लक्षणों को कम करने में मदद करते हैं।
2. **हल्दी (Curcuma longa)**: हल्दी का उपयोग भी लाभकारी हो सकता है। हल्दी में करक्यूमिन होता है, जो सूजन को कम करने में मदद करता है। हल्दी को दूध या पानी के साथ मिलाकर पी सकते हैं, या प्रभावित स्थान पर पेस्ट बनाकर लगा सकते हैं।
3. **एलोवेरा (Aloe Vera)**: एलोवेरा जेल को सीधे त्वचा पर लगाएं। यह खुजली और जलन को कम करने में मदद करता है और त्वचा को ठंडक पहुंचाता है।
4. **आयुर्वेदिक तेल**: नारियल तेल, तिल का तेल, और कुटकी तेल (Picrorhiza kurroa) का उपयोग करें। ये तेल त्वचा को मॉइस्चराइज करते हैं और सूजन को कम करते हैं।
5. **त्रिफला चूर्ण**: त्रिफला चूर्ण का सेवन पाचन तंत्र को सुधारता है और शरीर से विषैले पदार्थों को निकालने में मदद करता है। इसका सेवन रात में सोते समय गुनगुने पानी के साथ करें।
6. **गुग्गुल (Commiphora wightii)**: गुग्गुल एक महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है, जो सूजन को कम करने और त्वचा की स्थिति को सुधारने में सहायक होती है। इसका सेवन चिकित्सक की सलाह पर करें।
7. **महाराष्ट्रारषादि कषाय**: यह एक विशेष आयुर्वेदिक काढ़ा है जो त्वचा के विकारों में उपयोगी होता है।
8. **परहेज**: आयुर्वेद में आहार और जीवनशैली का विशेष महत्व है। तला-भुना, मसालेदार भोजन, और अत्यधिक मीठा खाने से बचें। हरी सब्जियां, फल, और ताजे जूस का सेवन करें।
9. **योग और प्राणायाम**: नियमित योग और प्राणायाम से तनाव कम होता है, जो सोरायसिस के लक्षणों को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। विशेषकर, सूर्य नमस्कार और अनुलोम-विलोम प्राणायाम फायदेमंद होते हैं।
10. **शुद्धिकरण उपचार**: पंचकर्म, विशेषकर विरेचन और रक्तमोक्षण, को आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह पर किया जा सकता है। ये शरीर से विषैले पदार्थों को निकालने में मदद करते हैं।
# # # ध्यान दें:
सभी आयुर्वेदिक उपचार को शुरू करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करना आवश्यक है, क्योंकि हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर उपचार भिन्न हो सकता है।
24/06/2024
पिंपल्स (मुहांसों) का नैचुरोपैथी और आयुर्वेदिक उपचार प्राकृतिक तरीकों और घरेलू उपायों पर आधारित है। ये दोनों पद्धतियाँ शरीर को अंदर से स्वस्थ रखने पर जोर देती हैं, जिससे त्वचा संबंधी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
# # # नैचुरोपैथी उपचार
**1. जल चिकित्सा:** प्रतिदिन पर्याप्त पानी पीना आवश्यक है। पानी शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है। दिन में कम से कम 8-10 गिलास पानी पिएं।
**2. संतुलित आहार:** पिंपल्स से बचने के लिए ताजे फल, सब्जियाँ और पूर्ण अनाज का सेवन करें। तैलीय, मसालेदार और जंक फूड से परहेज करें। विटामिन ए, सी और ई युक्त खाद्य पदार्थ त्वचा के लिए अच्छे होते हैं।
**3. नियमित व्यायाम:** योग और ध्यान त्वचा की सेहत को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। ये रक्त संचार को सुधारते हैं और त्वचा को चमकदार बनाते हैं।
**4. त्वचा की सफाई:** दिन में दो बार चेहरे को माइल्ड क्लेंजर से धोएं। अत्यधिक स्क्रबिंग से बचें क्योंकि इससे त्वचा की प्राकृतिक नमी खत्म हो सकती है।
**5. हर्बल उपचार:** नीम, एलोवेरा, हल्दी और तुलसी का उपयोग त्वचा की समस्याओं को कम करने में सहायक हो सकता है। नीम के पत्तों का पेस्ट या एलोवेरा जेल सीधे प्रभावित क्षेत्र पर लगाएं।
# # # आयुर्वेदिक उपचार
**1. त्रिफला:** त्रिफला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक संयोजन है जो पाचन तंत्र को सुधारता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है। इसे रात को सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ लिया जा सकता है।
**2. नीम:** नीम को आयुर्वेद में बहुत महत्व दिया जाता है। नीम के पत्तों का पेस्ट पिंपल्स पर लगाएं या नीम का काढ़ा पिएं। यह रक्त को शुद्ध करता है और त्वचा को साफ करता है।
**3. हल्दी:** हल्दी में एंटीसेप्टिक और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। हल्दी और चंदन का पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाएं। यह पिंपल्स को सुखाकर निशान को हल्का करता है।
**4. चंदन:** चंदन का पेस्ट त्वचा को ठंडक पहुँचाता है और पिंपल्स को कम करता है। चंदन पाउडर में गुलाब जल मिलाकर चेहरे पर लगाएं।
**5. गंधक रसायन:** आयुर्वेद में गंधक (सल्फर) को पिंपल्स के इलाज में बहुत प्रभावी माना जाता है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है और त्वचा को साफ करता है।
**6. आहार और जीवनशैली:** आयुर्वेद में पित्त दोष को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण है। तैलीय और मसालेदार भोजन से परहेज करें। ताजे फल, सब्जियाँ और ठंडे दूध का सेवन करें। सुबह जल्दी उठें और नियमित व्यायाम करें।
**7. पंचकर्म:** आयुर्वेद में पंचकर्म एक विशेष शोधन प्रक्रिया है जो शरीर को विषमुक्त करती है और त्वचा को स्वस्थ बनाती है। इसमें वमन, विरेचन, बस्ती, नस्य और रक्तमोक्षण शामिल हैं।
# # # सामान्य देखभाल
- **चेहरा न छुएं:** पिंपल्स को बार-बार छूने या फोड़ने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
- **धूप से बचें:** धूप में निकलने से पहले सनस्क्रीन लगाएं। धूप से त्वचा का तेल उत्पादन बढ़ सकता है जिससे पिंपल्स हो सकते हैं।
- **तनाव कम करें:** तनाव भी पिंपल्स का कारण बन सकता है। योग, ध्यान और पर्याप्त नींद से तनाव को नियंत्रित करें।
नैचुरोपैथी और आयुर्वेदिक उपचार पिंपल्स को प्राकृतिक तरीके से कम करने में सहायक हो सकते हैं। इन तरीकों को अपनाकर त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाए रखें।
24/06/2024
माइग्रेन के लिए नैचुरोपैथी और आयुर्वेदिक उपचार में प्राकृतिक और समग्र तरीकों का उपयोग किया जाता है। नैचुरोपैथी में जीवनशैली में सुधार और प्राकृतिक उपाय शामिल हैं। नियमित योग और ध्यान माइग्रेन को कम करने में सहायक हो सकते हैं। पर्याप्त पानी पीना और हाइड्रेशन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। अदरक, पुदीना और तुलसी जैसी जड़ी-बूटियों का सेवन फायदेमंद हो सकता है। ताजे फल, सब्जियाँ और पूर्ण अनाज का सेवन करें। नींद का नियमित पैटर्न बनाए रखें और तनाव को कम करने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करें।
आयुर्वेद में माइग्रेन के लिए विशेष उपचार उपलब्ध हैं। शिरोधारा, जहां माथे पर गर्म तेल डाला जाता है, माइग्रेन में आराम दिला सकता है। पंचकर्म, जिसमें शरीर को शुद्ध किया जाता है, भी प्रभावी हो सकता है। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ जैसे ब्राह्मी, अश्वगंधा और जटामांसी तनाव और माइग्रेन को कम करने में सहायक होती हैं। त्रिफला का सेवन पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है, जो माइग्रेन से राहत दिलाने में मदद कर सकता है।
दोनों पद्धतियों में संतुलित आहार और नियमित दिनचर्या पर जोर दिया जाता है। तनाव को कम करने के लिए ध्यान और प्राणायाम (सांस की तकनीक) का अभ्यास करें। इन प्राकृतिक उपचारों का उपयोग करने से माइग्रेन की तीव्रता और आवृत्ति कम हो सकती है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
02/06/2024
17/03/2024
13/03/2022
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यह माना जाता है कि कैंसर, दिल संबंधी बीमारियों, रीढ़ की हड्डी में चोट, स्ट्रोक और सिर पर लगी चोट जैसी बीमारियों का इलाज होना असंभव है। लोग जब भी इस तरह की बीमारियों के बारे में सुनते हैं तो निराश हो जाते हैं कि अब इसका कोई समाधान नहीं है। लेकिन अब आप ऐसा सोचना बंद करें। अब इस तरह की लाइलाज बीमारियों का इलाज संभव है और यह तकनीक है स्टेम सेल थेरेपी।
क्या है यह थेरेपी
वयस्क स्टेम सेल तकनीक में रोगी के ही बोन मैरो से सेल लिए जाते हैं और क्षतिग्रस्त जगह पर इन्हें रोपित किया जाता है, जिससे चोटिल या क्षतिग्रस्त अंग में ये नई कोशिकाएं बनाने लगती हैं और चोट ठीक होने लगती है।
स्टेम सेल की उपयोगिताएं
स्टेम सेल हमारे शरीर की बुनियादी कोशिकाएं हैं, जिनमें कई तरह की दूसरी कोशिकाएं विकसित की जाती हैं। इन कोशिकाओं को चोटग्रस्त जगह पर स्थापित कर दिया जाता है और फिर ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त जगह पर नई कोशिकाएं बनाती हैं। स्टेम सेल में ये क्षमता है कि ये कई गुना नवीकरण कर सकता है। नाड़ी कोशिकाओं, मांसपेशियों के कोशिकाओं और रक्त कोशिकाओं का सीमित जीवनकाल होता है और ये खुद कई गुणा नहीं बन सकते, लेकिन स्टेम सेल ये कोशिकाएं बना सकता है।
कई मांसपेशियां हो सकती हैं जीवित
हृदय की मांसपेशियों और टिश्यू का नवीकरण नहीं हो सकता। एक बार अगर ये क्षतिग्रस्त हो गए तो स्थायी रूप से खत्म हो जाते है, लेकिन अब स्टेम सेल तकनीक द्वारा इन टिश्यू और मांसपेशियों को दोबारा पुनर्जीवित किया जा सकता है।
दरअसल, स्टेम सेल शरीर की बुनियादी कोशिका है, इसलिए पहला स्टेम सेल भ्रूण में ही बनता है और वयस्क के बोन मैरो से लिए गए स्टेम सेल से दिल से जुड़ी मांसपेशियों के साथ साथ लीवर, दिमाग, नाड़ी, फैट और त्वचा से जुड़े टिश्यू विकसित किए जा सकते हैं। ये कोशिकाएं प्रजनक कोशिकाएं होती हैं, जो नई कोशिकाएं बनाने में सक्षम हैं। इसलिए इन्हें जेनरेटिव कोशिकाएं कहते हैं। हेमथोपोटिक स्टेम सेल बोन मेरो से ली जाती हैं और ये सभी प्रकार की रक्त कोशिकाओं की वृद्धि करती है।
क्या-क्या हैं लाभ
वयस्क स्टेम सेल तकनीक से इलाज करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे रोगी के ही बोन मेरो से लिया जाता है, जिससे बाहर के किसी वायरस या बीमारी होने का खतरा नहीं रहता और शरीर भी आसानी से स्टेम सेल को अपना लेता है। इससे रोगी को कोई नुकसान नहीं होता।
कैसा-कैसा उपचार संभव है
मस्तिष्क पक्षाघात, मस्तिष्क रक्तस्नव व स्ट्रोक, रीढ़ की हड्डी में चोट, अंगों में पक्षाघात, ऑटिज्म, पार्किसन बीमारी, मोटर न्यूरोन बीमारी, मांसपेशियों में विकृति, लीवर की बीमारी, किडनी की बीमारी, ऑप्टिक न्यूरीटिस, मल्टीपल स्कलेरोसिस, मस्तिष्क संबंधी रोग और फ्रिडिरिक रोगों का इलाज स्टेम सेल से किया जा सकता है।
यूं मिलता है बेहतर परिणाम
स्टेम सेल में कई लाइलाज बीमारियों जैसे मांसपेशियों से जुड़ी विकृति, ल्यूकेमिया और हृदय संबंधी रोगों को ठीक करने की क्षमता है। स्टेम सेल से इलाज की प्रक्रिया बहुत आसान है। स्टेम सेल भ्रूण, गर्भनाल, रक्त और बोन मेरो से प्राप्त किया जाता है। वयस्क स्टेम सेल ल्यूकेमिया, दिल संबंधी बीमारियां, मल्टीपल स्कलेरोसिस और डायबिटीज को ठीक किया जाता है।
26/05/2015
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