Chad.mvslim
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FBP/58/2023
अतीक अहमद:- आरंभ से अंत तक
पार्ट -1
इलाहाबाद जंक्शन से हर सुबह एक तांगा सवारी बैठाती और खुल्दाबाद, हिम्मतगंज, चकिया पर सवारी उतारती चढ़ाती जंक्शन से 5 किमी दूर स्थित "कसरिया" जाती और फिर वहां से इसी तरह इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन आती। सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक सवारी ढोने का काम चलता रहता।
यह तांगा फिरोज़ अहमद का था जिससे वह जीविकोपार्जन के लिए सवारी ढोते थे।
फिरोज़ अहमद गद्दी बिरादरी के (मुसलमानों में यादव) थे जिनकी इलाहाबाद पश्चिमी और नवाबगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी आबादी है। यह लोग शौकिया घोड़े और व्यवसायिक रूप से गाय भैंस बकरी इत्यादि पाल कर दूध का व्यवसाय करने के लिए जाने जाते हैं।
इस बिरादरी का परंपरागत पहनावा सफेद कुर्ता, सफेद तहमद और सफेद साफा था। अतीक अहमद जीवन भर इसी वेशभूषा को धारण किए रहे।
कसरिया या कसारी मसारी फिरोज अहमद का पुस्तैनी गांव था , उसी गांव के चकिया मुहल्ले में फिरोज अहमद ने 1972 में घर बनवाया और अपने दो बेटों अतीक अहमद और खालिद अज़ीम उर्फ अशरफ तथा तीन बेटियों शाहीन और परवीन और सीमा के साथ चकिया में रहने लगे।
10 अगस्त 1962 को जन्म लेने वाले और जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उम्र के 17वें साल में अतीक अहमद पर पहला केस दर्ज हुआ और वर्ष 1979 में अतीक अहमद पर अपने गांव कसारी-मसारी में ही भेंड़ चराने वाले लड़के की हत्या का आरोप लगा और वह इसमें नामजद हो गये। आरोप था कि झगड़े में उस लड़के के सर पर चोट लगी और वह मर गया।
अतीक अहमद कक्षा 8 पास थे , दसवीं में फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके थे और वह दोपहर बाद अक्सर अपने अब्बा फिरोज अहमद के उसी घोड़े पर बैठकर इलाहाबाद के पुराने इलाके नखासकोना , अटाला और रोशनबाग में आया करते थे।
1984 में रोशनबाग के छोटे मोटे दबंग वाहिद राइफल (बदला हुआ नाम) के यहां अतीक अहमद बैठकी लगाते थे , कभी कभी होटल से चाय भी लाते थे , वाहिद राइफल के लिए पान लाते थे।
चुंकि अतीक अहमद बेहतरीन घुड़सवारी और पहलवानी करते थे , इसलिए कम लोगों को पता होगा कि उन्हें लोग "पहलवान" के नाम से जानते थे।
सफेद घोड़े पर बैठकर सफेद कुर्ता सफेद तहमद और सफेद साफा बांधे लंबी मूंछों वाले अतीक अहमद रोशन बाग , अटाला और नखास कोहना पर पहचाने जाने लगे।
उस समय इलाहाबाद में "भुक्खल महाराज" का एकछत्र राज था , उनके पिता पंडित जगत नारायण करवरिया की कौशांबी (उस समय कौशांबी इलाहाबाद का हिस्सा था) में धाक थी।
पंडित जगत नारायण करवरिया कौशांबी के घाटों और बालू खनन के बेताज बादशाह थे , उनके दो बेटे थे श्याम नारायण करवरिया उर्फ़ मौला महाराज और विशिष्ट नारायण करवरिया ऊर्फ भुक्खल महाराज। भुक्खल महाराज अपने समय के सबसे बड़े बमबाज थे।
यह दोनों भाई इलाहाबाद आए और शहर के कल्याणी देवी मुहल्ले में हवेली बनवा कर रहने लगे और बालू खनन के साथ साथ रियल स्टेट के धंधे के बेताज बादशाह बनकर उभरे।
शहर में घर खाली करवाने या विवादास्पद जमीन मकान खरीदने के मामले में यह लोग सिद्धहस्त हो गये और इससे काफी संपत्ति बनाई , तब इलाहाबाद में भुक्खल महाराज का एकछत्र सिक्का चलता था।
उनके नाम की दहशत थी।
दरअसल इलाहाबाद गंगा जमुना के घाटों से बालू खनन के लिए प्रसिद्ध है , और गंगा तथा जमुना से बालू निकालने के लिए यहां दर्जनों घाट हैं और यहां का रिवाज है कि जिसकी सरकार उसके लोगों की घाट और घाट का बालू। कांग्रेस की सरकारों में करवरिया इन घाटों के बेताज बादशाह थे।
भुक्खल महाराज का दुर्भाग्य कहिए या अतीक अहमद का सौभाग्य कि कौशांबी का रास्ता चकिया से होकर गुजरता था , अब भी गुज़रता है, भुक्खल महाराज जब भी कौशांबी जाते तो तमाम जिप्सी और महेंद्रा जीप की गाड़ियों के काफिले में उनके बैठे लोग अपने असलहे बाहर निकाले रहते।
अतीक अहमद को यह नागवार लगता की कोई उनके मुहल्ले से असलहों का प्रदर्शन करते हुए जाए।
कहते हैं कि एक दिन उन्होंने हाथों में असलहा लिए भुक्कल महाराज का काफिला रोक लिया और दबंगई से चेतावनी दी कि कल से काफिला गुज़रे तो असलहा गाड़ी के बाहर दिखाई ना दे वर्ना .......
भुक्कल महाराज की काफी उम्र हो चुकी थी पंगा लेने की बजाय उन्होंने अक्लमंदी दिखाई और अगली बार से काफिले ने रास्ता ही बदल दिया, शहर में इसे लेकर सनसनी फैली और इस घटना ने 23-24 साल के अतीक अहमद को शहर में चर्चित कर दिया।
यह दौर था जब इलाहाबाद में सलीम शेरवानी की टार्च और बैटरी "जीप इंडस्ट्रियल सिंडिकेट" की भारत में तूती बोलती थी।
उसी दौर में संभवतः 1984-85 में जीप इंडस्ट्रियल सिंडिकेट के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी और कहा जाता है कि सलीम शेरवानी ने तब हड़ताल खत्म कराने के लिए अतीक अहमद की मदद ली और अतीक अहमद ने हर कर्मचारी के घर जाकर अपनी दबंगई से उन्हें मजबूर किया कि वह काम पर आएं, और हड़ताल खत्म हो गयी।
इसके बाद अतीक अहमद इलाहाबाद में दबंग के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब हुए।
मगर उन्होंने तब तक ना किसी से हफ्ता वसूला ना किसी को परेशान किया ना किसी की ज़मीन मकान कब्जा किया ना किसी की बहन बेटी की तरफ गलत नज़र उठाई। और उसी समय क्यों ? उनका अपराधिक जीवन जैसा भी हो पर उन्होंने मरते दम तक कभी किसी की बहन बेटी की तरफ बुरी नज़र नहीं डाली।
सन 1989-90 के उसी दौर में इलाहाबाद नगर महापालिका के पार्षद का चुनाव होने वाला था और तब किसी आरोप में अतीक अहमद जेल में थे और वहीं से वह चकिया से निर्दलीय सभासद के प्रत्याशी बने तो शहर भर में हाथ में बेड़ियों और जेल की सलाखों को पकड़े अतीक अहमद के बड़े बड़े कट आऊट इलाहाबाद की सड़कों पर पट गये।
सभासद के चुनाव में सरायगढ़ी और नखासकोना से निर्दलीय ही खड़े हुए "चांद बाबा" , "चांद बाबा" हाफ़िज़ कुरान थे , 5 फिट 2 इन्च के पतले दुबले और सर पर हर वक्त गोल टोपी पहने उलट खोपड़ी वाले "चांद बाबा" के नाम सरायगढ़ी में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाली औरतों को लगातार बम मार कर मीरगंज भगाने का कारनामा दर्ज हो चुका था।
उसी समय इलाहाबाद में चौक के आसपास ‘चांद बाबा’ नाम का खौफ था. नाम इतना बड़ा की पुलिस भी चांद बाबा से पंगे लेने से कतराती थी। ना सिर्फ पुलिस बल्कि नेता भी चांद बाबा के अपराधिक वर्चस्व से डरते थे।
चांद बाबा उलट दिमाग का शख्स था , बात करते करते आऊट हो जाता था , तुरंत ब्लड प्रेशर हाई, तुरंत गाली गलौज करने लगता और मारपीट शुरू कर देता था। उसका गैंग भी वैसा ही खतरनाक था जिसमें जग्गा और छम्मन जैसे खतरनाक बमबाज शामिल थे।
कहा जाता है कि कि इलाहाबाद की कोतवाली का गेट तक चांद बाबा के डर से उस समय बंद हो गया था जो कभी भी बंद नहीं हुआ करता था ना फिर कभी बंद हुआ।
इस चुनाव में अतीक अहमद ने जेल से ही जीत दर्ज की और चांद बाबा ने भी जीत दर्ज की और शहर में चांद बाबा के सामने अतीक अहमद आ खड़े हुए।
कहा जाता है कि चांद बाबा से आजिज़ पुलिस और स्थानीय नेताओं विशेष कर इलाहाबाद उत्तरी से कांग्रेस के तत्कालीन विधायक ने चांद बाबा के बराबर अतीक अहमद को खड़ा करने में खूब मदद किया।
क्रमशः कल इसी समय
डिस्क्लेमर:- सभी तथ्य और बातें अतीक अहमद के विधानसभा क्षेत्र में पब्लिक डोमेन से लेकर संकलित किए गए हैं।
FBP/59/2023
अतीक अहमद:- आरंभ से अंत तक
पार्ट-2
पोस्ट में अतीक अहमद पर आने से पहले समझिए कि "चांद बाबा" क्या था ? तब पोस्ट सही से समझ में आएगी।
दरअसल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से उथल पुथल शहर के हम्माम गली में रहने वाला "शौक ए इलाही उर्फ चांद हड्डी" हार्डकोर क्रिमिनल था , उसके जुर्म का इतिहास सराए गढ़ी के हमाम गली में झाड़ फूंक करने वाले एक बाबा की हत्या से शुरू हुआ, चांद हड्डी को शक था कि उसके बड़े भाई रहमत की मौत बाबा के झाड़ फूंक की वजह से हुई है।
इस घटना से चांद हड्डी, चांद बाबा बन गया , चांद बाबा के खिलाफ शाहगंज थाने में एफआईआर दर्ज हुई और चांद बाबा को गिरफ्तार करके नैनी जेल भेज दिया गया।
जेल से जमानत पर छूटते ही चांद बाबा अपने बड़े भाई रहमत के करीबी दोस्त को गोलियों से भून दिया। क्योंकि चांद बाबा को शक था कि यह खास दोस्त भी रहमत की मौत का ज़िम्मेदार है।
यहां से शुरू होता है चांद बाबा के जुर्म का दौर और चांद बाबा ने तीसरी हत्या अपने वकील की ही कर दी जब वकील की उसके साथ किसी बात पर बहस हो गई। वकील का सीना पहले चांद बाबा ने गोलियों से छलनी किया फिर बम मार कर उसके शव को चिथड़े चिथड़े कर दिया।
चांद बाबा के खिलाफ मुकदमों की फेहरिस्त लंबी होती चली गई और चांद बाबा ने सरेंडर कर दिया।
चांद बाबा को नैनी सेंट्रल जेल भेज दिया गया, नैनी सेंट्रल जेल में चांद बाबा की एक मांग ना मांगे जाने पर चांद बाबा ने जेल में रहते हुए अपने साथी जग्गा के साथ नैनी सेंट्रल जेल के जेलर पर बमों से हमला करवा दिया।
कुछ दिनों के बाद चांद बाबा ज़मानत पर बाहर आ चुका था , चांद बाबा अपने गैंग का विस्तार करने लगा और कुछ ही समय में उसके गैंग में 100 से 150 शातिर अपराधी और बमबाज शामिल हो गए और यह इलाहाबाद के तमाम मुहल्ले तक फैल गये।
उसी समय गढ़ी सराय में चकलाघर चलते थे , इसके संचालक थे "अच्छे" और उसका भाई "लड्डन"। यह छोटे मोटे बदमाश थे जो वैश्यावृत्ति की दलाली किया करते थे।
मुहल्ले वालों के निवेदन पर चांद बाबा ने मोर्चा संभाला और अच्छे ऐंड ब्रदर्स के साथ भयंकर बमबाजी हुई। और अंत में चांद बाबा ने इस इलाके से वैश्याओं के घरों पर बम मार मार कर मीरगंज तक भगा दिया और सरायगढ़ी क्षेत्र खाली हो गया। और इससे चांद बाबा का प्रभाव शहर में और बढ़ गया।
चांद बाबा का नाम शहर की हर अपराधिक घटना में आने लगा और पुलिस तथा प्रशासन की नाक में चांद बाबा ने दम कर दिया।
पुलिस ने चांद बाबा को पकड़ने का प्रयास शुरू किया , उस समय शहर के कोतवाल आए नवरंग सिंह ने जून 1986 के एक दिन सारे थानों की पुलिस बुलाकर चांद बाबा की घेराबंदी शुरू कर दी। मगर चांद बाबा और उसके गैंग के सभी लोग बमबाजी करते हुए पुलिस को चकमा देकर भाग निकले।
इससे गुस्से में आया चांद बाबा अगले ही दिन अपने गैंग के साथ शहर कोतवाली पर ही धावा बोल दिया और कोतवाली पर इतने बम बरसाए कि बमों की मार से शहर कोतवाली दहल गयी। पुलिस ने किसी तरह कोतवाली का गेट बंद करके अपनी जान बचाई।
कोतवाली पर आक्रमण से गुस्से में आई पुलिस और चांद बाबा के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू हो गया और पुलिस ने चांद बाबा के घर के पास हम्माम गली में ही एक पुलिस चौकी स्थापित की जिसे कुछ ही दिनों में चांद बाबा और उसके गैंग ने बमों से उड़ा दिया।
पुलिस पर दोहरे आक्रमण से पुलिस ने अब चांद बाबा के खिलाफ कार्रवाई को अपने मान सम्मान से जोड़ लिया और ताबड़तोड़ छापेमारी करने लगी।
तब शहर उत्तरी के तत्कालीन कांग्रेस विधायक ने चांद बाबा को अपने पास बुलाया और उन्हें सरेंडर करने की सलाह दी और 1988 में चांद बाबा सरेंडर करके जेल चला गया।
जेल से ही 1989 के सभासद के चुनाव में चांद बाबा ने नामांकन कर दिया और जीत दर्ज की और कुछ ही दिनों बाद चांद बाबा को सशर्त जमानत मिल गई और नैनी जेल से चांद बाबा को लेने शहर से भारी हुजूम उमड़ पड़ा।
अतीक अहमद खुद खुली जिप्सी में चांद बाबा को नैनी जेल से पूरे जुलूस के साथ लेकर शहर आए।
1989 के शुरुआती दिनों तक ज़िले के दो दबंग अपराध के आरोप लिए और कानून को चुनौती देते अतीक अहमद और चांद बाबा इलाहाबाद में चर्चित हो चुके थे , और तब तक इलाहाबाद दंगों का इतिहास समेटे हुए चल रहा था।
जो लोग इलाहाबाद को जानते हैं वह इलाहाबाद की भौगोलिक स्थिति को भी जानते होंगे, इलाहाबाद जंक्शन सिटी साईड के सामने मुख्य सड़क लीडर रोड आगे बढ़ती हुई जानसेनगंज तक जाती है और फिर हिवेट रोड से होती हुई यह रामबाग तक पहुंचती है , इलाहाबाद से गुज़रने वाली यह दूसरी जीटी रोड है। पहली जीटी रोड चौक नखास कोहना, खुल्दाबाद,हिम्मत गंज और चकिया होकर निकलती है।
यह सड़क इलाहाबाद को दो हिस्सों में बांटती है , इसके दाहिनी तरफ मुसलमान बहुल इलाके आते हैं और दूसरी तरफ हिन्दू बहुल इलाके आते हैं।
इन मुहल्लों में अक्सर दंगे हो जाते थे जो बहुत बड़े तो नहीं पर शहर को अस्थिर करने के लिए काफ़ी थे।
शौक ए इलाही उर्फ चांद बाबा घनघोर धार्मिक व्यक्ति था , इलाहाबाद में हुए अक्सर दंगों में वह शामिल रहता था।
इलाहाबाद रेलवे स्टेशन और चौक से 2 किमी और दूर ही मुस्लिम बहुल इलाके में उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद की कालोनी है , "करैली" अर्थात गुरु तेग बहादुर नगर।
1979 में बनी शहर के सबसे करीब यह कालोनी अपने निर्माण से ही हिंदू और सिख बहुल थी। इसी कालोनी के बीच में वक्फ़ बोर्ड का एक बहुत पुराना कब्रिस्तान है जिसमें मौजूद मस्जिद के इक्सटेंशन को लेकर अक्सर शहर का माहौल खराब होता था।
सरकार का कहना था कि आवास विकास परिषद की कालोनी में कानूनन सार्वजनिक धार्मिक स्थल प्रतिबंधित है तो मुस्लिम लोगों का दावा था कि चुंकि यह ज़मीन और कब्रिस्तान वक्फ़ बोर्ड की है इसलिए हम इसपर कुछ भी निर्माण कर सकते हैं।
चुंकि यह कालोनी मुस्लिम क्षेत्र में थी और 99% मुस्लिम मुहल्लों के बीच थी तो धीरे धीरे हिंदू और सिख भाई लोग अपना मकान बेच बेच कर यहां से जाने लगे।
फिर 1984 के सिख विरोधी दंगों ने सिख भाइयों को यहां से घर बेचकर जाने को मजबूर कर दिया।
फिर संभवतः 1985 या 1986 के एक दिन शौक ए इलाही उर्फ चांद बाबा ने ऐलान किया कि शहर से करैली को जोड़ने वाली नूरुल्लाह रोड को ब्लाक करके 24 घंटे के अंदर मस्जिद के निर्माण को पूरा किया जाएगा , जो भी इसके बीच में आएगा बम से मारा जाएगा।
पूरे शहर में भारी सांप्रदायिक तनाव और डर फैल गया था और चांद बाबा और उसके गैंग के लोगों ने वैसा ही किया और नूरूल्लाह रोड को 24 घंटे के लिए ब्लॉक कर दिया और लगातार बम बरसाते रहे तथा उस मस्जिद में 24 घंटे के अंदर कुछ नवनिर्माण करा दिए गए , 24 घंटे के बाद भारी पुलिस बल के साथ आवास विकास परिषद के लोगों ने मस्जिद का कुछ नवनिर्मित हिस्सा हटा भी दिया।
मगर इस घटना से करैली से गैरमुस्लिमों का पलायन शुरू होने लगा, यह सभी लोग मुसलमानों को औने पौने दामों में अपने मकान और जमीन बेचकर जाने लगे।
1988 तक चांद बाबा के सभासद बनने के बाद शांतिप्रिय लोगों को शहर में सांप्रदायिक झड़प और दंगों का डर सताने लगा।
उलट खोपड़ी और सनकी "चांद बाबा" क्या ऐलान कर दे यह उस दौर में हर एक को डराने लगा और गैर मुस्लिम लोग करैली छोड़ कर जाने लगे।
डरते डरते शहर के सामने आ गया 1989 का विधान सभा चुनाव, और अतीक अहमद ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन कर दिया।
अतीक अहमद को नामांकन करता देख आगबबूला "चांद बाबा" ने भी ऐलान कर दिया कि वह भी विधायक का निर्दलीय उम्मीदवार होगा और अगले दिन ही उसने भी नामांकन कर दिया।
अतीक अहमद ने चांद बाबा को समझाने की कोशिश की , कि मुस्लिम वोट बंट जाएंगे , तो चांद बाबा गालियां देते हुए कहता कि "ठीक है चलो तुम नामांकन वापस लेलो , विधायक मैं बनूंगा। तुम जाहिल अनपढ़ विधायक बन कर क्या करोगे ?"
और इसी से अतीक अहमद और चांद बाबा के संबंध खराब हो गये और दोनों दबंग लठैत विधानसभा के चुनाव में आमने सामने थे।
चुनाव प्रचार शुरू हो चुका था, अतीक अहमद इस चुनाव में नियंत्रित रहते तो चांद बाबा बेहद आक्रामक।
शहर पश्चिमी विधानसभा चुनाव के प्रचार में शहर के अटाला , बुड्ढा ताज़िया , अकबरपुर, करैली में स्टेज से ही चांद बाबा अतीक अहमद को गालियां देता , अनपढ़ गंवार कह कर मज़ाक उड़ाता और इसी सबके बीच दोनों की दुश्मनी बढ़ती गयी।
अतीक अहमद के समर्थन में चांद बाबा से पीड़ित लोग आने लगे, प्रशासन और नेता अतीक अहमद के पक्ष में आने लगे जिसमें शहर उत्तरी से विधायक का चुनाव लड़ रहे उस समय शहर की एक बड़ी हस्ती भी थे जिनकी प्रशासन पर तगड़ी पकड़ थी।
अपनी कमज़ोर होती स्थिति देखकर चांद बाबा बौखलाने लगा और स्टेज से गालियां बढ़ती चली गयीं। और फिर आ गया मतदान का दिन अर्थात 22 नवंबर 1989
उस दिन "चांद बाबा" पर सनक सवार थी , हर पोलिंग बूथ पर चांद बाबा जाकर गाली गलौज करता और दोपहर बाद वह पहुंच गया शहर पश्चिमी विधानसभा की सबसे बड़े पोलिंग स्टेशन "अटाला" के मजीदिया इस्लामिया इंटर कालेज।
उसे किसी ने बताया कि यहां पर अतीक अहमद के समर्थन में फर्जी वोटिंग हो रही है , और उसने वहां सबसे पहले मौजूद पुलिस के आला अधिकारियों के साथ बत्तमीज़ी और गाली गलौज की , कुछ लोगों का कहना था कि उसने पुलिस के एक आला अधिकारी की कालर पकड़ कर चुनाव बाद वर्दी उतार लेने की धमकी दी।
तभी उसकी नज़र घोड़े पर बैठे अतीक अहमद के पिता फिरोज़ अहमद पर पड़ी। चांद बाबा पहले तो उनके पास जाकर फ़र्ज़ी मतदान का आरोप लगाकर उन्हें और अतीक अहमद को गंदी गंदी गालियां दीं और फिर उन्हें घोड़े से नीचे उतार कर उनकी दाढ़ी नोच ली और उनके ऊपर थूक दिया।
अब यह अति हो गया था और यह खबर फैलते ही शहर पश्चिमी में एक सनसनी फैल गई कि पुलिस और प्रशासन अवश्य चांद बाबा को गिरफ्तार करेगा, लोगों में डर और संभावित दंगे होने का डर सताने लगा।
मतदान संपन्न होने तक पुलिस और प्रशासन सहनशीलता और ज़िम्मेदारी का परिचय देता रहा और शाम के 6 बजते बजते विधानसभा चुनाव का मतदान सकुशल संपन्न हो गया।
22 नवंबर 1989 रात करीब 8.30 से 9 बजे के बीच, स्थान - रोशन बाग ढाल स्थित कवाब पराठे की एक मशहूर दुकान "जब्बार होटल"।
मतदान संपन्न होने के बाद चांद बाबा को आरिफ नाम के एक शख्स ने खबर दी कि जब्बार होटल पर अतीक अहमद बैठे हुए खाना खा रहे हैं।
अपने गैंग के लोगों के साथ चांद बाबा अतीक अहमद को मारने जब्बार होटल पहुंचा ही था कि अचानक इस पूरे क्षेत्र की बिजली चली गई और चारों ओर धुप अंधेरा।
उस क्षेत्र के पुराने लोग कहते हैं कि रोशन बाग के उस रेस्टोरेंट से लगी सभी सड़कें ब्लाक कर दी गयीं और आवागमन ठप हो गया।
कुछ लोगों का कहना है कि यह प्रशासन ने किया, कुछ लोग अतीक अहमद के लोगों का काम बता रहे थे।
चांद बाबा घिर गया था , उसके गैंग के लोग मामले को समझ कर भाग खड़े हुए और अकेले चांद बाबा बम पटकते रहे। भाग खड़े होने वालों में उसके सबसे विश्वसनीय जग्गा और छम्मन भी थे।
उस रेस्टोरेंट के आसपास लगातार बमबाजी होने लगी और फिर रात करीब 10 बजे खबर आई कि चांद बाबा की हत्या हो गयी।
वहां के पुराने लोगों का कहना है कि रात के अंधेरे में घिर गए चांद बाबा ने भागने की कोशिश नहीं की और अतीक अहमद को गालियां देता रहा और तभी अतीक अहमद वहां पहुंच गए।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चांद बाबा के शव में सीक कवाब की गरमागरम नुकीली राड से 12 सुराख होने की बात कही गई।
एक आम धारणा आज भी है कि यह अतीक अहमद ने अपने हाथों से किया मगर यह भी सच है कि अतीक अहमद पर चांद बाबा की हत्या का कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ,और प्रशासन द्वारा अज्ञात लोगों द्वारा की गई हत्या दिखा कर मामले को रफा दफा कर दिया गया।
चांद बाबा की ऐसी विभत्स हत्या के बाद पूरे इलाहाबाद में अतीक अहमद का खौफ और दबंगई उरूज़ पर आ गयी। उनकी कहीं भी मौजूदगी सनसनी पैदा करने लगी। चांद बाबा से पीड़ित हिन्दू भाई भी अतीक अहमद के प्रति विश्वास करने लगे।
उस समय यह एक जनमानस था कि चांद बाबा की हत्या अतीक अहमद, प्रशासन और शहर उत्तरी के एक विधायक का मिला जुला परिणाम थी।
हकीकत क्या थी पता नहीं पर एफआईआर अज्ञात लोगों पर हुई जिसे रात के अंधेरे में पहचाना नहीं गया।
अगले ही दिन विधानसभा चुनाव का परिणाम आया और अतीक अहमद निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर 25906 अर्थात 33.54% वोट पाकर विजयी घोषित हुए। मृतक चांद बाबा 9281 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गोपाल दास यादव 17804 वोट पाकर दूसरे तो तीरथ राम कोहली निर्दलीय के तौर पर 12237 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
इलाहाबाद पश्चिमी को एक नये विधायक मिले अतीक अहमद जिनका असर उस समय के युवाओं पर तेज़ी से पड़ रहा था।
विधायक बनने के कुछ समय बाद ही करैली मस्जिद में निर्माण का कार्य पुनः शुरू करने का प्रयास हुआ, विधायक अतीक अहमद वहां आ खड़े हुए और मस्जिद के ज़िम्मेदारान को बुला कर ऐसा डांटा कि यह मामला सदैव के लिए शांत हो गया और आज तक शांत है। करैली से इसके बाद पलायन रुक गया।
अतीक अहमद ने अपराध किए होंगे, मामले न्यायालय के समक्ष थे और हैं मगर अतीक अहमद ने इलाहाबाद शहर को दंगा मुक्त बना दिया।
जहां सांप्रदायिक तनाव की खबर सुनते बीच में आकर खड़े हो जाते, दंगाईयों को घूर देते तो लोग पीछे हट जाते। अतीक अहमद ने शहर में बमबाजी बंद करा दी।
ऐसी ही एक घटना मुस्लिम बहुल बख्शी बाज़ार की है जहां से कुछ मुस्लिम लड़के सटे हुए हिन्दू इलाके महाजनी टोला में पत्थरबाजी कर रहे थे।
यह चित्र उस समय समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपा था कि अतीक अहमद अकेले ही उन लड़कों को बख्शी बाज़ार की तंग गलियों में दौड़ा लिए और कुछ एक को पकड़ कर वहीं पीटने लगे।
ऐसा जहां सांप्रदायिक तनाव होता अतीक अहमद बीच में खड़े मिलते और इलाहाबाद को आजतक दंगा मुक्त कर दिया।
नुपुर शर्मा के हालिया विवादास्पद बयान के बाद इलाहाबाद में पिछले साल पुलिस पर पथराव और भड़की हिंसा भी यदि अतीक अहमद बाहर होते तो नहीं होती।
खैर इसके बाद अतीक अहमद को क्षेत्र के हिंदू और सिख भाइयों का समर्थन मिलता चला गया और अतीक अहमद आगे बढ़ते चले गए।
राजनीति और अपराध को साथ साथ समेटे हुए।
विधानसभा चुनाव में जनता दल को 208 सीटें मिलीं और मुलायम सिंह यादव भाजपा के 57 विधायक के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस ने मुलायम सिंह यादव को बाहर से समर्थन दिया।
क्रमशः- कल इसी समय
FBP/60/2023
अतीक अहमद:- प्रारंभ से अंत तक
पार्ट -3
नवंबर 1989 में अतीक अहमद पहली बार इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर विधायक बने तो उनके दामन में चांद बाबा की खौफनाक हत्या के ऐसे आरोप थे जो जनता के मनमस्तिष्क में घर गये मगर प्रशासन ने कभी उन्हें इसके लिए आरोपित नहीं किया।
विधायक बनते ही अतीक अहमद ने अपने पिता को तांगा चलाने से मना किया और चकिया तिराहे पर ही अपने आफिस के सामने लकड़ी चीरने का एक कारखाना खरीद कर दे दिया जहां उनके पिता बैठने लगे।
अतीक अहमद का विधायक के तौर पर यह पहला कार्यकाल मात्र दो साल का ही रहा और इन दो सालों में खूंखार अतीक अहमद ने अपनी छवि तोड़ कर इलाहाबाद के तमाम बड़े और इज्ज़तदार लोगों से अपने व्यक्तिगत रिश्ते बनाए दोस्ती की जिसमें इलाहाबाद के एक सबसे बड़े होटल व्यवसाई सरदार जी थे तो एक भगवा राष्ट्रवादी पार्टी के उस समय के सबसे बड़े नेताओं में से एक नेता भी थे जो बाद में विधानसभा अध्यक्ष और कई राज्यों के राज्यपाल बने। अतीक अहमद उन्हें चाचा तो वह अतीक अहमद को बेटा मानते थे।
जनता के बीच अपनी खौफनाक छवि तोड़ने के लिए उन्होंने मंसूर पार्क में कैनवास क्रिकेट टूर्नामेंट करवाए और मंहगे मंहगे प्राइज़ मनी देकर युवाओं को खुद से जोड़ लिया।
अतीक अहमद ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल जब धन कमाने के लिए शूरू किया तब उन्होंने ज़मीन या बालू खनन में हाथ ना डालकर रेलवे के स्क्रेप को खरीदने का टेंडर डालना शुरू किया। करवरिया बंधुओं से एक सामंजस्य बना और करवरिया बंधू अतीक अहमद और अतीक अहमद करवरिया बंधुओं के रास्ते में नहीं आते थे।
रेलवे के इस काम में उन्होंने अकूत दौलत कमाई, ऐसा पब्लिक परसेप्शन है कि रेलवे के स्क्रेप में सोल्डरिंग के लिए प्रयोग में आने वाले चांदी और कापर वगैरह भी भारी मात्रा में स्क्रेप के साथ आ जाते थे। अतीक अहमद की ट्रकें दिन रात स्क्रेप ढोती रहतीं थीं।
देश और प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन शुरू हो चुका था और इसी दौर में शहर के सभी फैसले लेने वाले कांग्रेस के शहर उत्तरी विधायक का सितारा गिरने लगा तथा भगवा राष्ट्रवादी पार्टी के नेताओं का सितारा बुलंद होने लगा।
राष्ट्रीय स्तर पर मार्गदर्शक मंडल में गये इलाहाबाद के एक और नेता का अतीक अहमद के साथ बेहद करीबी संबंध था , बाकी चाचा और बेटे का रिश्ता तो प्रगाढ़ होता चला गया , इतना कि अतीक अहमद इन्हें मौके मौके पर मंहगे मंहगे तोहफे देते रहते जो इलाहाबाद में समाचार पत्रों की सुर्खियां बटोरतीं।
इनकी बेटी की शादी में अतीक अहमद ने अपने समय की सबसे महंगी कार गिफ्ट की थी।
इन्हें इलाहाबाद में अतीक अहमद का गाडफादर कहा जाता था जिनके रहते अतीक अहमद सदैव सुरक्षित रहे।
खैर , दो सालों में अतीक अहमद ने अपने नेटवर्क को खड़ा किया और हर मुहल्ले और गांव कस्बे के असरदार लोगों को अपने साथ किया जो शहर पश्चिमी विधानसभा के विभिन्न क्षेत्रों में उनका चुनाव संचालन और मतदान तक की जिम्मेदारी उठाने लगे।
ऐसे लोग अतीक अहमद के करीबी बन कर चुनाव के बाद ज़मीन वगैरह का छोटा बड़ा कारोबार करते और अतीक अहमद रेलवे के स्क्रेप का खरीद करते और भेजते।
इस तरह अतीक अहमद का पूरा साम्राज्य धीरे धीरे खड़ा और बड़ा होने लगा जिसमें सबकी कमाई होने लगी और लोग अतीक अहमद की छत्रछाया में आने लगे।
सबका काम धाम चलता रहा, अतीक अहमद के पास जब पैसे आ गये तो उन्होंने उसे ग़रीब लोगों में लुटाना शुरू कर दिया।
कोई भी गरीब उनके घर या आफिस से खाली नहीं गया , क्या हिन्दू क्या मुसलमान, क्या मंदिर क्या मस्जिद, क्या मोहर्रम क्या दशहरा, क्या दुर्गा पूजा के पंडाल, अतीक अहमद ने दिल खोलकर पैसे बांटे।
इलाहाबाद में 5 राम लीला कमेटी है , पजावा , पथरचट्टी, कटरा , सिविल लाइंस और चौक।
उस जमाने में 1989 से अगले 15-18 सालों तक अतीक अहमद के दिए चंदे से ही राम लीला कमेटी दशहरे का आयोजन करती थी। रामलीला के मंचन पर अतीक अहमद के नाम के जयकारे लगाते, जो जुलूस निकालता उसमें पहले रथ पर अतीक अहमद के बड़े बड़े कट आऊट खड़ा कराकर ऐलान कराया जाता कि हमेशा की तरह इस बार भी रामलीला का मंचन और रथयात्रा अतीक भाई के सौजन्य से हो रही है। दुर्गा पूजा के पंडाल अतीक अहमद के पैसे से सजने लगे और इसके दानकर्ताओं में अतीक अहमद का नाम प्रमुखता से लिखा जाता था।
शहर में जिसे चंदा चाहिए अतीक अहमद के पास पहुंच जाता था , कोई बिमार है तो मदद के लिए अतीक अहमद के पास पहुंच जाता, कोई गरीब है तो अतीक अहमद के पास पहुंच जाता, गरीब की बेटी की शादी है लोग अतीक अहमद के यहां मदद के लिए पहुंच जाते थे, कार्ड लेकर अतीक अहमद रख लेते और अपने लोगों से इस परिवार की आर्थिक स्थिति का पता लगवाते, यदि वाकई ज़रूरत मंद है तो पूरी शादी का खर्च कर देते।
इलाहाबाद के एक मशहूर टीवी फ्रिज के दुकानदार से शादी का पूरा इलेक्ट्रॉनिक सामान ऐसे गरीब बेटियों की शादी में भेजवाते रहते जिसमें टीवी फ्रिज रेफ्रिजरेटर इत्यादि सामान होते थे, कभी दिन में दो सेट तो कभी 5 सेट और उस दुकानदार को बुलाकर पाई पाई का पेमेंट करते।
क्या इलाहाबाद विश्वविद्यालय और क्या डिग्री कालेज के चुनाव, हर उम्मीदवार अतीक अहमद से चंदा मांगने पहुंच जाता, अतीक अहमद हिन्दू मुस्लिम नहीं देखते।
आज अतीक अहमद को राक्षस बनाने में जुटा मीडिया उस दौर में उन्हें मसीहा बना कर फ्रंटपेज का विज्ञापन बटोरता था , अतीक अहमद की प्रशंसा में कई कई पेज भरे रहते।
अतीक अहमद के घर का दरवाज़ा सबके लिए हमेशा खुला रहता था , अगर फरियादी हिंदू है तो अतीक अहमद की तत्परता देखते बनती।
अतीक अहमद के सबसे विश्वसनीय लोगों में हिंदू विशेषकर ब्राह्मण लोग ही थे , उनके वकील दया शंकर मिश्र और विजय मिश्र से लेकर उनका वित्तीय और कारोबारी साम्राज्य संभालने वाले एक मिश्रा जी ही थे। मुसलमान लोग तो बस रायफल उठाए उनके काफिले में पीछे पीछे चलते थे।
उनकी हत्या के बाद उनके घर के हिंदू पड़ोसियों का उनके बारे में क्या कहना है आप सुन सकते हैं।
https://m.youtube.com/watch?v=z4i1siahVUU&feature=youtu.be
अतीक अहमद का पहला कार्यकाल मात्र 2 साल का ही था और जनता दल के टूटने के बाद ही मुलायम सिंह यादव की सरकार गिर गई और मुलायम सिंह यादव ने "समाजवादी पार्टी" की स्थापना की।
1991 में प्रचंड राम मंदिर आंदोलन की लहर में विधानसभा चुनाव हुआ और अतीक अहमद इस बार भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पहले से अधिक वोटों से जीत दर्ज की और 36424 वोट पाकर बीजेपी उम्मीदवार रामचंद्र जायसवाल को 15743 वोटों से हरा दिया।
तो समझिए कि राम मंदिर आंदोलन और लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा से उपजे सांप्रदायिक वातावरण में भी अतीक अहमद इलाहाबाद शहर पश्चिमी से दूसरी बार निर्दलीय निर्वाचित हुए तो वह केवल मुसलमानों का वोट पाकर तो विजयी नहीं हुए होंगे जबकि कुल पड़े मतों में से अतीक अहमद ने 51.26 प्रतिशत वोट प्राप्त कर सफलता हासिल की थी।
इसी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 415 में से 221 सीट जीत कर कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई और कल्याण सिंह सरकार में इलाहाबाद पुलिस ने 1992 में अतीक अहमद के आरोपों की सूची घोषित की और बताया कि अतीक अहमद के खिलाफ उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कौशाम्बी, चित्रकूट, इलाहाबाद ही नहीं बल्कि बिहार राज्य में भी हत्या, अपहरण, जबरन वसूली आदि के मामले दर्ज हैं। हालांकि अतीक अहमद के खिलाफ सबसे ज्यादा मामले इलाहाबाद जिले में ही दर्ज हुए।
चाचा-भतीजा की जुगलबंदी के कारण अतीक अहमद पर पुलिस कार्रवाई नहीं हो सकी और अतीक अहमद का साम्राज्य और हनक बढ़ता गया और राष्ट्रवादी पार्टी के ही वरिष्ठ नेताओं की छत्रछाया में अतीक अहमद शहर में अपनी पकड़ बनाते चले गए।
6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त हो गयी और विधानसभा भंग कर दी गई।
पूरे देश और प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव फैल गया मगर इलाहाबाद इससे अछूता रहा क्योंकि तब अतीक अहमद खुली जीप में अकेले पूरे शहर का दौरा करके लोगों को शांत बनाए रखने में सफल हुए। क्या हिन्दू मोहल्ले क्या मुस्लिम मोहल्ले अतीक अहमद बेधड़क सबके बीच खुली जीप से जाकर विश्वास बहाल करने में सफल हुए।
1993 में फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ और अतीक अहमद फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जनता के सामने थे और बाबरी मस्जिद की शहादत और राम मंदिर और सांप्रदायिकता से भरे राजनैतिक वातावरण में अतीक अहमद ने निर्दलीय के रूप में जीत का क्रम जारी रखा और इस बार कुल 49.85 प्रतिशत वोट प्राप्त कर बीजेपी के प्रत्याशी तीरथराम कोहली को शिकस्त दी।
इन तीनों बैक टू बैक जीत के बाद अतीक अहमद इलाहाबाद के बेताज बादशाह बन चुके थे । राज्य में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के "मिले मुलायम कांशीराम" गठबंधन के बावजूद उत्तर प्रदेश विधानसभा त्रिशंकु चुनी गई, इसमें भाजपा को 177 , समाजवादी पार्टी को 109 बहुजन समाज पार्टी को 67 सीटें प्राप्त हुईं , अर्थात कुल 176 सीट ही प्राप्त हुई।
और इसी कारण निर्दलीय अतीक अहमद महत्वपूर्ण हो गये , बसपा तथा निर्दलीयों के समर्थन से 04 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
अब सत्ता और ताकत अतीक अहमद के इर्दगिर्द घूमने लगी , मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से सीधे संबंध के कारण इलाहाबाद और प्रदेश का पुलिस प्रशासन उस दौर में अतीक अहमद
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